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बेबाक बोलः राजकाज- गुजरात की बात

अगर चुनावी सर्वेक्षण गुजरात के जनादेश में तब्दील होते हैं तो विपक्षी दलों को यह सोचना होगा कि विकल्प के अभाव में संकल्प होता है। कांग्रेस भी भगवा भरोसे मंदिर मार्ग पर जनेऊ और ब्राह्मण का राग अलापती नजर आई। इस एक राज्य को जीतने की जंग में हर कोई बेनकाब हो गया। कल तक स्कूल के किसी बच्चे, कॉलेज के किसी छात्र, ट्रेन से जा रहे किसी यात्री, किसी अभिनेता को पाकिस्तान परस्त बता उसे देशद्रोही घोषित कर दिया जा रहा था। लेकिन एक संभावित हार से बचने के लिए देश के प्रधानमंत्री अपने पूर्ववर्ती पर ऐसे बेबुनियाद आरोप लगा जाते हैं। प्रधानमंत्री एक पद नहीं संस्था है और इस बार पद की गरिमा पर सवाल उठे। बाकी चुनाव आयोग जैसी सांवैधानिक संस्थाओं ने जिस तरह निष्पक्षता के बोझिल मुखौटे को उतार फेंका उसे जल्द से लोक विमर्श का मुद्दा बनाना चाहिए। गुजरात देश के विकास के विमर्श का केंद्र रहा है। यहां विकास पागल हुआ या नहीं यह तो बाद की बात है लेकिन लोकतंत्र जरूर लहूलुहान हुआ। गुजरात से निकली बात पर इस बार का बेबाक बोल।

बराक ओबामा जब भारत के हालिया दौरे पर आए तो उनके आगे पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति का तमगा लग चुका था। अमेरिकी राष्ट्रपति रहने के दौरान जब वे दिल्ली आए थे तो मीडिया मोदी के साथ उनके याराना का तराना गा रहा था। नवजात शब्द ‘ब्रोमांस’ (भाईयापा जैसा कुछ) भी किलकारियां ले रहा था। इस बार पूर्व राष्ट्रपति  के रूप में भारतीय पत्रकार ने उनसे पूछा कि मोदी जी तो आपको मित्र कहते हैं लेकिन आपका मनमोहन सिंह के बारे में क्या कहना है। ओबामा के जवाब का लब्बोलुआब यही था कि नरेंद्र मोदी जो कर रहे हैं उसकी बुनियाद तो मनमोहन सिंह ने रखी थी। खैर, इसके तुरंत बाद ओबामा पत्रकार से यह बोल कर कि मुझे फंसा रहे हो मोदी-मनमोहन के सवाल से कन्नी काट गए।
इसी के थोड़े समय बाद गुजरात में दूसरे चरण के मतदान के पहले और गुजरात से दूर कर्नाटक के पूर्व उपमुख्यमंत्री केएस ईश्वरप्पा भाजपा कार्यकर्ताओं को सलाह दे रहे थे कि वे चुनाव प्रचार के दौरान झूठ बोलने से नहीं हिचकें। वे जनता से यह बोलें कि जब वाजपेयी प्रधानमंत्री थे तब पाकिस्तान ने कभी भी भारत पर हमला करने की कोशिश नहीं की। लेकिन जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने, तब भारतीय जवानों पर पाकिस्तानी सेना ने हमला किया और हमारे जवानों की जान ली।

ईश्वरप्पा जो सलाह कार्यकर्ताओं को दे रहे थे, उनकी पार्टी के अगुआ गुजरात के बांसकांठा में बोल रहे थे। पूर्व प्रधानमंत्री पर आरोप लगा रहे थे कि वे पाकिस्तानी नुमाइंदों के साथ मिलकर साजिश रच रहे थे कि गुजरात में अहमद पटेल की सरकार बन जाए। एक राज्य के चुनाव के लिए पहली बार कोई प्रधानमंत्री अपने पूर्ववर्ती पर इस तरह के आरोप लगा रहे थे। इस बेसिरपैर के आरोप के लिए कई अखबारी लेखों में प्रधानमंत्री की आलोचना के लिए जो शब्द इस्तेमाल किए गए वे भी अभूतपूर्व थे। खास है कि अब बात नरेंद्र दामोदरदास मोदी की नहीं, गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री की नहीं, प्रधानमंत्री बने किसी ‘चायवाला’ की नहीं बल्कि प्रधानमंत्री नाम की संस्था की थी। एक प्रधानमंत्री अपने गृह प्रदेश के चुनाव के लिए इस तरह की भाषा पर उतर जाएंगे यह ऐतिहासिक अनुभव भी भारतीय लोकतंत्र ने कर ही लिया।

गुजरात चुनाव के ऐन पहले पिछले हफ्ते जब प्रधानमंत्री की भाषा पर इस स्तंभ में हम लिख रहे थे तो अंदाजा नहीं था कि दूसरे चरण के मतदान तक वह इस ऐतिहासिक स्तर पर नीचे आएगी कि हम यह खौफ खाने लगें कि गुजरात के लिए इतना तो फिर 2019 के लिए कितना? लेकिन यहां फिर वही सवाल उठता है कि इस भाषा का मकसद क्या है? एक सर्वमान्य पहलू तो ध्रुवीकरण है ही। दूसरा कह सकते हैं कि गुजरात में अपने कमजोर होते जनाधार के कारण निराशा में ऐसी भाषा बोली जा रही है। किसी भी तरह से हारना नहीं है तो फिर पाकिस्तान के ब्रह्मास्त्र का निशाना मनमोहन सिंह को ही क्यों न बना दिया जाए। तीसरा सबसे अहम बिंदु है मुद्दे को विकास के मॉडल (गुजरात मॉडल)से हटा कर व्यक्ति केंद्रित बनाना। गुजरात मॉडल के मिथ को कभी भी बहस का हिस्सा नहीं बनने देना।

भ्रष्टाचार और महंगाई के मुद्दे पर केंद्र से कांग्रेस की बेदखली के बाद से ही पूरी राजनीति को व्यक्ति केंद्रित बना दिया गया। फेंकू बनाम पप्पू जैसी भाषा में जनता को उलझाए रखा गया। और, ऐसा करने की वजह बराक ओबामा बता ही चुके हैं कि मोदी जिस हाईवे पर अपने आर्थिक विकास की गाड़ी दौड़ा रहे हैं उसके मील का पत्थर तो मनमोहन सिंह ने ही रखा था। इसलिए ये चाहते हैं कि हम नीति को भूल नीयत और 56 इंच जैसी कूबत पर ही बात करते रहें। भाजपा और कांग्रेस के अलावा किसी और विकल्प को खड़ा न होने दिया जाए। लेकिन जैसे-जैसे इनकी नीति खारिज होती जा रही है वैसे-वैसे मुद्दे को व्यक्तिगत बना दिया जाता है। गुजरात से पहले भी नीति के बरक्स नाम का हथियार चलाया जाता रहा है। जेम्स माइकल लिंग्दोह का उच्चारण जिस तरह से गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री करते थे और आज जिस तरह से अहमद पटेल के आगे खास उपसर्ग लगा कर भारत के प्रधानमंत्री बोलते हैं। मुख्यमंत्री का मॉडल अब प्रधानमंत्री का मॉडल बन गया है। आज गुजरात को पूरे भारत का पर्याय बना दिया गया है लेकिन चुप्पी भी गुजरात पर ही साधी गई है।

गुजरात के नतीजों के पहले एक बार गुजरात पर बात हो जाए। आजादी के बाद गुजरात का दो चेहरा रहा है। पहले चरण में कांग्रेस का एकछत्र राज्य रहा और दूसरे चरण में भाजपा का। अब तक हम कह सकते हैं कि आधे से ज्यादा कांग्रेस का और उसके बाद भाजपा का शासन रहा। इन दोनों दलों को भौगोलिक रूप से अहम इस राज्य में पर्याप्त अवसर मिला। प्राचीन काल से ही भारत की अर्थव्यवस्था में गुजरात का अहम स्थान रहा है। भौगोलिक कारणों ने इसे हमेशा विकास का केंद्र बना कर रखा। सुरक्षित अर्थव्यवस्था के दौर में भी गुजरात विकास की राह में अपनी अलग कहानी लिख रहा था। ज्यादातर उद्योग-धंधों के केंद्र में गुजरात था। खुले बाजार के दौर में यह तटीय राज्य मील का पत्थर बना। इस राज्य का केंद्र की सरकार से हमेशा तालमेल रहा है।
2009 के बाद वैश्विक बाजार के लड़खड़ाने का असर गुजरात में भी पड़ा। खासकर, पिछले 22 सालों के शासन में बड़े कारोबारी घरानों को ही तरजीह दी गई। नोटबंदी से लेकर जीएसटी तक के फैसलों में बड़े तो और बड़े हो गए लेकिन छोटों का अस्तित्व ही खत्म हो गया। बड़े कारोबारी घरानों के इशारों पर चल रही विश्व अर्थव्यवस्था से गुजरात कैसे अछूता रहता।

दूसरा बड़ा क्षेत्र है खेती। कपास, मूंगफली हो या जीरा, गुजरात व्यावसायिक खेती का गढ़ रहा है। यहां बड़े क्षेत्रफल वाले खेत नहीं हैं। छोटे खेत पर कारोबारी फसलों के कारण मुनाफा ज्यादा होता था। लेकिन वैश्विक मंदी का असर यहां की खेती पर भी पड़ा। और, इसके विकल्प में लाया गया विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसईजेड)। एसईजेड की गतिविधि शुरू होने के बाद पहले तो जमीनों के अधिग्रहण के कारण लोगों को बड़ा फायदा दिखा। लेकिन जमीन मुआवजे के बाद रोजगार-धंधे का विकल्प नहीं खुल पाया। खेती और कारोबार की तंगी के बाद एक ही उम्मीद बाकी थी सरकारी नौकरी की जिसके लिए शुरू हुई आरक्षण की मांग। हार्दिक, अल्पेश और जिग्नेश ये तीन युवा बेरोजगार युवाओं के लिए आरक्षण की मांग लेकर ही नायक बने। जो गुजरात पूरे भारत को रोजगार दे रहा था जहां सरकारी नौकरियों को सबसे ज्यादा उपेक्षित किया गया था वहां सरकार से नौकरी देने की मांग उठी।

कारोबार और कारोबारी खेती वाले गुजरात को बदली नीतियों से बचाने के लिए कुछ नहीं किया गया। कारोबार और खेती को संकट से निकालने का कोई एजंडा बनाया ही नहीं गया है। जिस गुजरात मॉडल को पूरे देश में लाना था वह अपनी ही कोख में मिथ बन गया। सरकारी नौकरी मांगते गुजरातियों की बहस पूरे देश में छिड़ जाती तो विकास पुरुष के पास जवाब क्या होता। गुजरात की बात पूरे देश में न फैले इसलिए मंदिर-मस्जिद, मणिशंकर, नीच से लेकर चरम पाकिस्तान पर पहुंचाया गया। बात गुजरात की थी और अगर वह बोल जाता तो विकास का गुब्बारा फूट जाता। हमने पिछले हफ्ते भी लिखा था कि 2017 का गुजरात 2014 का देश है। अब अगली बात 18 दिसंबर को गुजरात की सुनने के बाद।

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