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बेबाक बोल: कहां हो कृष्ण

कृष्ण के युद्धनायक वाले शासकीय और राजकीय रूप को आधुनिक सरकारों ने जितना भी भुनाने की कोशिश की हो लेकिन आज भी लोक के लिए कृष्ण का मतलब जुड़वां शहर मथुरा और वृंदावन ही हैं। भगवान की बाल लीलाओं और राधा के प्रेम से जुड़े मंदिरों में भक्तों की टोली संभालना उत्तर प्रदेश सरकार के लिए चुनौती बनी रहती है। बांके बिहारी जी का मंदिर, गरुड़ गोविंद, राधावल्लभ लाल, श्री राधारमण, राधा दामोदर, राधा श्याम सुंदर, गोपीनाथ, गोकुलेश, कृष्ण बलराम मंदिर, पागलबाबा का मंदिर, रंगनाथ जी का मंदिर, प्रेम मंदिर, श्री कृष्ण प्रणामी मंदिर ही कृष्ण भक्ति की विरासत हैं जहां कृष्ण ने लोकमंगलकारी बांसुरी बजाई।

श्रीकृष्ण की पहचान मथुरा-वृंदावन से है, लेकिन उनकी पहचान को लेकर अलग-अलग तर्क गढ़े जा रहे हैं।

सीमेंट से बना जगमगाता चौकूचा राजमार्ग आपको उस कुरुक्षेत्र में ले जाएगा जो कृष्ण के युद्धनायक बनने का प्रतीक है। हरियाणा सरकार करोड़ों रुपए खर्च कर भी कृष्ण भक्तों का कारवां सत्ता की इस सड़क पर नहीं ला सकी है। यहां की भव्यता सरकारी प्रयोजन भर सिद्ध होती है जिसमें लोक का उमंग नहीं है। दुनिया भर से विदेशी जब कृष्ण की छवि से आकर्षित होकर आते हैं तो इस सुनहरे राजमार्ग से दूर मथुरा और वृंदावन की तंग गलियों के लोकमार्ग पर ही चलना चाहते हैं। उन्हें अपने भगवान यमुना के उसी पनघट पर मिलते हैं जहां वे राधा के मनोहर श्याम के रूप में बांसुरी बजाते हैं, गोकुल की गलियों में यशोदा मैया को खिझाते हैं। सरकार खजाना खोल कर भी ‘गीता महोत्सव’ को ब्रज की उस होली सा लोकप्रिय नहीं बना पाई है, जहां गोपियां अपने कान्हा को लट्ठ मार प्रेम का खजाना लूटती हैं। कृष्ण के लोक रूप की परंपरा पर बेबाक बोल।

मन्नै ले ले रे, सपेरे तू मन्नै ले ले रे/ म्हारा जोड़ा जच ग्या ए/ किरसन की बचा ली ज्यान, ठोसा ले ले रे, ठोसा ले ले रे/
म्हारे किरसन की बच गी ज्यान। राधा तू बड़ी छलिहारी रे/
धोक्खे तै काट गई कान।

यह हरियाणवी लोकगीत उस कृष्ण के बारे में है जो महाभारत के नायक हैं, जिन्होंने कुरुक्षेत्र के मैदान में गीता का उपदेश दिया। महाभारत का आध्यात्मिक हासिल गीता को माना जाता है। पर गीता का ज्ञान देने वाले कृष्ण लोक में किस रूप में देखे जाते हैं? ऊपर के गीत में दुनिया चलाने वाले की जान बचाने के लिए सखी राधा सपेरे को छलती है। कृष्ण को सांप ने काटा है और उन्हें सपेरा ही बचा सकता है। राधा उससे कहती है कि कृष्ण की जान बचा लो तो मैं तेरी हो जाऊंगी। सपेरा लालच में कृष्ण को ठीक करता है और उनके होश में आते ही राधा उसे अंगूठा दिखा अपने कृष्ण के साथ चली जाती है।

ऐतिहासिक संदर्भों में हरियाणा के जिस कुरुक्षेत्र के मैदान में गीता का उपदेश दिया गया है वहां कृष्ण दही बिलोती, माखन निकालती यशोदा मैया और हंसी-ठिठोली, छेड़खानी करती राधा के गीत के रूप में हैं। आधुनिक कुरुक्षेत्र की सड़कों पर सरकार ने तो कृष्ण का युद्ध का संदेश देती आसमान छूती प्रतिमाएं लगवा दी हैं, लेकिन वहां के आम घरों में घुटने के बल चलते लड्डू गोपाल ही पूजे जाते हैं। देश के लगभग नब्बे फीसद मंदिरों के गर्भ गृह में कृष्ण की वही मूर्ति पूजी जाती है जहां वे राधा के साथ बांसुरी बजा रहे हैं। महाभारत ने कृष्ण दिया तो लोक ने उनके प्रेम में अपनी राधा गढ़ी।

राधा मूल रूप में महाभारत का हिस्सा नहीं हैं। वह लोक से उपजती हैं और प्रेममार्ग में संवरती हैं। डॉक्टर ग्रियर्सन राधा और कृष्ण के प्रेम को जीवात्मा और परमात्मा के मिलन के रूप में देखते हैं।

ऐतिहासिक संदर्भ में देखें तो महाभारत उस दौर का है जब सामंती संरचना मजबूत हो रही थी। पितृसत्ता और जाति व्यवस्था ये दो सामंती सामाजिक रचना की बुनियाद हैं। इन्हें मजबूत करने के लिए श्रीमद्भगवदगीता की दार्शनिक पृष्ठभूमि तैयार होती है। महाभारत के जरिए ऐसे शास्त्र को गढ़ा गया है जो मात्र धर्म का नहीं है। यह राजनीति और समाज का शास्त्र है। रामायण की कथावस्तु में शंबूक का वध है तो महाभारत में एकलव्य और कर्ण हैं। वर्ण धर्म के अनुसार श्रम विभाजन और पितृसत्ता के लिए दार्शनिक आधार तैयार होता है। आत्मा-परमात्मा का संबंध यानी पुनर्जन्म, मोक्ष की अवधारणा के बिना सामंती व्यवस्था टिक नहीं सकती है। उसके लिए जो दार्शनिक पृष्ठभूमि को आधार बनाने की बात है, महाभारत के कृष्ण उस रूप में हैं।

वहीं लोक की बात करें तो कृष्ण बहुरूप में परंपरा हैं। भक्ति आंदोलन के पहले गीत गोविंद की परंपरा है जो उसी लोक परंपरा से आती हुई दिखाई देती है। उसी परंपरा में सूरदास तो मिथिला में विद्यापति भी हैं। रीति काल में भी राधा और कृष्ण दिखाई देते हैं।
कृष्ण के इन सभी रूपों में समय और काल का अंतर है। जैसे-जैसे सामंती संरचना के अंदर लोक का तंत्र बनने लगता है तो इसके संदर्भ भी बदलते हैं। भारत में इस्लाम के आने के बाद यहां की सामाजिक और आर्थिक संरचना में परिवर्तन आया। इससे लौकिक तबके में अध्यात्म को लेकर नया संदर्भ उभरा जिसे हम भक्ति कहते हैं।

इसमें कर्मकांड से खुद को मुक्त कर भगवान से भावनात्मक रिश्ता सा बनता है। बिहार के मिथिला क्षेत्र में कृष्ण को परिवार के सदस्य की तरह देखा गया है। विद्यापति के कृष्ण किसान के बेटे जैसे हैं। अन्य जगहों पर भी लोक में कृष्ण को पनघट के साथ जोड़ा गया है। लोक रंग में पनघट को प्रेम के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है जहां स्त्री और पुरुष का प्रेम सार्वजनिकता में स्वीकार्य है। कृष्ण पनघट पर इंतजार कर रहे हैं लेकिन राधा आ नहीं रही है, अपने महल में बैठी है। वे उसे आने के लिए संदेश भेजते हैं। राधा भी मान दिखाती है। ऐसा नहीं है कि कृष्ण ने मुरली बजाई और वो भागी आई। राधा और कृष्ण का प्रेम सामान्य मनुष्य सा है।

सूरदास से लेकर मीरा तक के यहां हम कृष्ण के दूसरे रूप को देखते हैं। सूरदास ‘भ्रमरगीत’ में उद्धव और गोपियों के जरिए ज्ञानमार्गियों पर ताना मारते हैं। ब्रज की साधारण गोपियां ज्ञानी उद्धव को उस कृष्ण का महत्व बताती हैं जो ब्रह्म नहीं उनका ही हिस्सा है। ब्रज और मथुरा के बरक्स गांव और नगर की तुलना की गई है। गोपियों को गांव के कृष्ण ही चाहिए मथुरा वाले ज्ञानी नहीं। वहीं मीरा के कृष्ण आध्यात्मिक लीला करते हैं। मीरा उनसे आत्मिक रिश्ता जोड़ती है।

कृष्ण भक्ति की लोक परंपरा में सगुण और निर्गुण की बहस है। निर्गुण तो तत्व मीमांसा में है, पर तात्विक विवेचन, विश्लेषण वही कर सकता है जिसमें योग्यता और क्षमता होगी। लेकिन सामान्य मनुष्य भगवान से कैसे रिश्ता जोड़े? वह भावनात्मक स्तर पर ही जोड़ता है। सुदामा के जरिए दरिद्र को भी नारायण का दर्जा दिया जाता है। राधा, सुदामा, मीरा ये सभीे सामान्य स्त्री-पुरुष के भगवान से भावनात्मक रिश्ते के प्रतीक हैं।
ब्राह्मण धर्म के लोक विस्तार का जरिया शास्त्रीय रूप में रामायण, महाभारत हैं। वहीं वैष्णव संप्रदाय ने कृष्ण के लोक रूप के जरिए अलग-अलग रूपों में विस्तार पाया। रीतिकाल में खास कर 17वीं से 18वीं सदी में जहां सामंती संरचना फिर से मजबूत होती दिखाई देती है, वहां कृष्ण और राधा का लोक लीला वाला रूप खत्म हो जाता है। अब आभिजात्य नायक-नायिका का खिलंदड़ रूप उभरता है।
कृष्ण की व्याप्ति शास्त्र और लोक दोनों रूपों में दिखाई देती है।

यह एक पूरी परंपरा और इतिहास है जहां वे अलग-अलग रूपों में दिखते हैं। इसमें समय और काल की भूमिका अहम है और कोई भी तुलनात्मक अध्ययन इसके बिना नहीं हो सकता है। लेकिन आज के लोकतांत्रिक समय में कृष्ण के लौकिक संबंध वाला रूप ही प्रिय है। लौकिकता में, रिश्तों के जरिए जो प्रेम का, भक्ति का सबंध है वह आज भी खोजा जा रहा है। मित्रता के रिश्ते में सुदामा हो या प्रेम के रिश्ते में राधा और गोपियों जैसा सखा भाव वाला खुलापन हो या फिर एक बेटे के रूप में यशोदा मां जैसा रिश्ता हो। कृष्ण परंपरा की वो कड़ी हैं जो समय और काल के परे हैं। वे हर खंड में लोक के प्रिय हो जाते हैं।

कृष्ण के युद्धनायक वाले शासकीय और राजकीय रूप को आधुनिक सरकारों ने जितना भी भुनाने की कोशिश की हो लेकिन आज भी लोक के लिए कृष्ण का मतलब जुड़वां शहर मथुरा और वृंदावन ही हैं। भगवान की बाल लीलाओं और राधा के प्रेम से जुड़े मंदिरों में भक्तों की टोली संभालना उत्तर प्रदेश सरकार के लिए चुनौती बनी रहती है। बांके बिहारी जी का मंदिर, गरुड़ गोविंद, राधावल्लभ लाल, श्री राधारमण, राधा दामोदर, राधा श्याम सुंदर, गोपीनाथ, गोकुलेश, कृष्ण बलराम मंदिर, पागलबाबा का मंदिर, रंगनाथ जी का मंदिर, प्रेम मंदिर, श्री कृष्ण प्रणामी मंदिर ही कृष्ण भक्ति की विरासत हैं जहां कृष्ण ने लोकमंगलकारी बांसुरी बजाई।

दूसरी ओर हरियाणा सरकार कृष्ण के युद्धनायक रूप के प्रचार के लिए ‘गीता महोत्सव’ पर कोरोड़ों रुपए खर्च कर मेला लगाती है। पर लोकप्रिय फिल्मी सितारों से लेकर कई ताम-झाम के बावजूद यह लोक से दूर सरकारी आयोजन ही रह जाता है। यहां लोग खेती के लिए आए नए ट्रैक्टर और जैविक खाद के मंडप घूम आते हैं या पांच लीटर कच्ची घानी सरसों का तेल खरीद लेते हैं। कुरुक्षेत्र और मथुरा का अंतर बताता है कि लोक के मन में कृष्ण का मनोहारी रूप ही है। वहां के हर मंदिर में भक्तों का प्रेम टूटता है। चैतन्य महाप्रभु सहित कई संतों ने कृष्ण की भक्ति में लीन होने के लिए मथुरा-वृंदावन को चुना था। कृष्ण के राजा के रूप वाली द्वारिका हो या युद्ध के नायक के रूप में स्थापित होने वाला कुरुक्षेत्र इसे छोड़ कृष्ण भक्त वहीं दौड़ते हैं जहां यशोदा, नंद, बलराम और राधा के मनोहर श्याम हैं।

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