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राजकाज: बेबाक बोल-भीमासुर

मानव जीवन के संघर्ष के हर पहलू को उजागर करने के कारण आधुनिक रंगमंच की दुनिया में भी महाभारत के पात्र पहली पसंद रहे हैं। इससे दुनिया भर के नाटककार प्रभावित रहे हैं। जापान के हिरोशी कोइके के द्वारा निर्देशित महाभारत बहुप्रशंसित है। इस नाटक को चार अध्यायों में पूरा किया गया है जो महाभारत के विभिन्न वृत्तांतों की व्याख्या करते हैं। कंबोडिया से शुरू कर भारत, जापान और मलेशिया में भी इस नाटक का मंचन हुआ।

Rajkaj, bebak bol, mahabharat kathaबल का प्रयोग बुद्धि ही करती है। द्रौपदी के पांच पतियों में से एक भीम उसकी हर बात को मानने के लिए तैयार रहते हैं।

बल बड़ा या बुद्धि यह सनातन प्रश्न रहा है। क्या बिना विवेक के बल सकारात्मक हो सकता है? महाभारत में धर्म के खेमे में खड़े भीम को दस हजार हाथियों के बल के बराबर रखा गया है। अकेले उनके ही खाते में सौ कौरवों की हत्या है। इतिहास गवाह है कि बल का प्रयोग बुद्धि ही करती है। द्रौपदी के पांच पतियों में से एक भीम उसकी हर बात को मानने के लिए तैयार रहते हैं। द्रौपदी आंख के बदले आंख और जान के बदले जान वाले तुरंता न्याय में यकीन रखती है। द्रौपदी के जीवन का उद्देश्य प्रतिशोध पूरा करना बन जाता है तो भीम उसके प्रतिशोध की पूर्ति के औजार भर बन जाते हैं। इन दोनों को धर्म के खेमे में इसलिए जगह मिली क्योंकि यह पूर्वनियोजित था। भीम को जिस तरह आसुरी शक्तियों से लैस किया गया है और अधर्म को अधर्म से ही खत्म करने की स्थापना, उन्हें एक नायक की चमक नहीं ओढ़ने देती। बजरिए भीम बुद्धि बनाम बल पर बेबाक बोल।

महाभारत की कथा चरित्रों का कुरुक्षेत्र भी है। इसके चरित्र किसी समय यंत्र में सवार से लगते हैं जो किसी भी काल और संदर्भ के साथ मुठभेड़ कर सकते हैं। महाभारत के चरित्रों को सबसे ज्यादा रंगमंचीय अभिव्यक्ति मिली है। रंगमंच के पात्रों की विशेषता होती है उनका एक में अनेक होना। चरित्रों की इसी चकाचौंध में हमें खड़े मिलते हैं भीम। जिनमें दस हजार हाथियों का बल है। पांच पांडवों में अकेले भीम सौ कौरवों की हत्या करते हैं। श्रीकृष्ण की खींची गई धर्म और अधर्म की लकीर के अनुसार भीम हैं तो धर्म वाले मैदान में लेकिन उनके अंदर आसुरी शक्तियों को रख उनके चरित्र को जटिल बना दिया गया है। एक ऐसा बलवान शरीर जिसमें विवेक और धैर्य के लिए कोई जगह नहीं हो।

भीम के चरित्र के बारे में सोचते हुए याद आता है गिरीश कर्नाड का चरित्र ‘हयवदन’। कन्नड़ भाषा में लिखा यह नाटक जर्मन रचनाकार थॉमस मान के ‘ट्रांसपोज्ड हेड्स’ पर आधारित है। हय का शाब्दिक अर्थ घोड़ा होता है। मंच पर नाटक की शुरुआत हयवदन से होती है जिसका शरीर इंसान का और सिर घोड़े का है। हयवदन के जन्म की कहानी यूं है कि एक राजकुमारी स्वयंवर में एक राजकुमार के घोड़े को अपना पति चुन लेती है। विवाह के बाद घोड़ा एक आकाशीय प्राणी का रूप ले लेता है तो राजकुमारी उसे अस्वीकार कर देती है। घोड़ा उसे शाप देकर घोड़ी बना देता है। उसी राजकुमारी से हयवदन का जन्म होता है। हयवदन अपने इस रूप से मुक्ति चाहता है तो उसे काली मां के मंदिर जाने के लिए कहा जाता है।

यहीं मंच पर कहानी शुरू होती है दो पुरुष और एक स्त्री के बीच प्रेम त्रिकोण की। दो दोस्त हैं देवदत्त और कपिल। देवदत्त बुद्धि का प्रतीक है तो कपिल बल का। देवदत्त शारीरिक शक्ति तो कपिल ज्ञान से दूर है। नाटककार देवदत्त का सिर और कपिल का धड़ मिला कर एक संपूर्ण मनुष्य की कल्पना करते हैं। वे इन्हें कृष्ण-बलराम की जोड़ी की तरह देखते हैं। नायिका पद्मिनी देवदत्त से शादी करती है। लेकिन बाद में उसका आकर्षण कपिल की शारीरिक शक्ति से होता है।

इस ग्लानि में देवदत्त अपना सिर काट कर काली मंदिर में चढ़ा देता है। अपने दोस्त की इस कुर्बानी से व्यथित कपिल भी अपना सिर काट देता है। इन दोनों की मौत का जिम्मेदार खुद को मानते हुए पद्मिनी भी अपनी जान देने की कोशिश करती है। तभी देवी काली प्रकट होकर कहती हैं कि मैं इन दोनों को जीवित कर दूंगी, तुम दोनों के सिर जोड़ दो। पद्मिनी दोनों के सिर को धड़ से जोड़ देती है और दोनों के शरीर में प्राण फूंक कर देवी ओझल हो जाती हैं। तभी पद्मिनी को होश आता है कि उसने कपिल के धड़ पर देवदत्त का सिर और देवदत्त के धड़ पर कपिल का सिर जोड़ दिया है। जीवित होने के बाद दोनों दोस्तों में पद्मिनी पर अधिकार को लेकर झगड़ा होता है। एक मस्तिष्क को तो दूसरा शरीर को अहम बताता है।

एक ऋषि मस्तिष्क को अहम मान कर पद्मिनी पर देवदत्त का अधिकार बताते हैं और वह उसके साथ चली जाती है। उन दोनों को एक पुत्र होता है। समय बीतने के साथ पद्मिनी की रुचि फिर कपिल की शारीरिक शक्ति में होती है। देवदत्त यह बर्दाश्त नहीं कर पाता है। वह कपिल से युद्ध करता है। युद्ध में दोनों मारे जाते हैं और पद्मिनी अकेली रह जाती है।

इस नाटक के सार में सवाल उठता है शरीर अहम है या बुद्धि? या फिर एक ही इंसान में दोनों का होना जरूरी है? यहां भीम के बलवान शरीर की तुलना कपिल से होती है जिसके पास विवेक नहीं बल है। पांचों पांडवों में एक भीम है जिसके खाते में सौ कौरवों और जरासंध, हिडिंब, कीचक का वध है। सबसे ज्यादा हिंसा उसी के हिस्से है।

द्रौपदी और उसके पांच पति के जरिए स्त्री-पुरुष संबंध के कई आयाम निकलते हैं। बुद्धि और विवेक में कमतर होने के बावजूद द्रौपदी भीम को बहुत पसंद करती है। द्रौपदी के चरित्र का मुख्य उद्देश्य प्रतिशोध बन जाता है जिसमें उसे चार पतियों का धैर्य और विवेक बाधा के समान लगता है।

पांचाली धर्मराज के अवतार युधिष्ठिर के धैर्य पर सबसे ज्यादा तंज करती है। वह अपने से जुड़े हर रिश्ते का इस्तेमाल अपने प्रतिशोध के लिए अपनी तरह से करना चाहती है। पर युधिष्ठिर और अर्जुन के चरित्र की स्थिरता उसे ऐसा करने से रोक सही समय और सही तरीके का इंतजार करने के लिए कहती है। सैद्धांतिक रूप से वे दोनों धर्म के खिलाफ नहीं जाना चाहते हैं।

यहीं पर भीम ऐसे रूप में सामने आते हैं जो द्रौपदी के कहे को पूरा करने के लिए किसी भी हद से गुजर जाते हैं। अज्ञातवास के दौरान मत्स्य नरेश विराट के सेनापति कीचक सैरंध्री रूपी द्रौपदी का अपमान करता है तो वह युधिष्ठिर से तुरंत इसका बदला चाहती है। वह इस बात की भी परवाह नहीं करती है कि उनका भेद खुल गया और अज्ञातवास टूट गया तो पांडव जीती बाजी हार जाएंगे। द्रौपदी जानती है कि कौन तुरंत बदला ले सकता है और वह भीम के पास जाती है। भीम सब कुछ भुला तुरंत कीचक का वध कर देते हैं।

भीम के चरित्र को सुर और असुर के बीच का रखा जा सकता है। मानो हयवदन के चरित्रों की तरह शरीर के अंग बदल दिए गए हों। दिमाग में सिर्फ घोड़े जैसी ताकत बसती हो। भीम में यह प्रतीक है दस हजार हाथियों का। मुश्किल यह है कि इस तरह की शक्ति का चरित्र हमेशा दूसरों के द्वारा इस्तेमाल ही किया जाता है। इस शक्ति की डोर उनके पास होती है जो विवेक के साथ अपना हित देखते हैं। इनकी शक्ति सिर्फ दूसरों को मारने या मरने तक सीमित हो जाती है।

महाभारत अच्छे और बुरे के बीच की लड़ाई है। दु:शासन का वध करने के बाद जब भीम रक्तपान कर द्रौपदी के पास जाते हैं तो वे एक वीभत्स असुर की तरह दिखते हैं। आंख के बदले आंख और जान के बदले जान लेने वाले वैसे बर्बर बदले के प्रतीक बनते हैं जो विवेक और ज्ञान के चक्षु से खलनायक नजर आने लगता है। वह सुर नहीं बल्कि असुर के खांचे में ही दिखने लग जाते हैं।

नायक और खलनायक की पहचान क्या होती है? विवेकपूर्ण नजरिए के बिना नायकत्व नहीं आ सकता। महाभारत में जहां-जहां भीम का इस्तेमाल विवेक के साथ हुआ, वहां तो वे सकारात्मक रूप में दिखते हैं। नहीं तो फिर उनकी भूमिका प्रतिक्रियावादी और नकारात्मक चरित्र के तौर पर दिखाई देती है। वे एक स्वतंत्र चरित्र के रूप में न तो नकारात्मक हैं और न सकारात्मक।

द्रौपदी भीम को दो कारणों से पसंद करती है। एक तो वे ताकतवर हैं और दूसरा बिना सोचे-समझे उसकी हर बात पूरी करने के लिए तत्पर रहते हैं। द्युत सभा में द्रौपदी ने कहा था कि मैं दु:शासन के रक्त से केश धोने तक उन्हें खुला रखूंगी तो भीम ने तुरंत उसके साथ प्रण किया कि मैं उसका रक्त पिऊंगा। महाभारत के युद्ध में भीम और द्रौपदी को सहजता से अधर्म के खेमे में रखा जा सकता था लेकिन इन दोनों का नायकत्व पूर्वनियोजित था। इसलिए ये आज भी नायकों के नाम के साथ ही लिए जाते हैं।

विवेकहीन ताकत का भीम के लिए हासिल क्या है? सबसे ज्यादा हत्या करने वाला इंसान किसी भी सभ्यता और संस्कृति में नायक की तरह नहीं देखा जाता है। उसकी दशा ऐसे चरित्र अभिनेता की तरह होती है जिसका पैमाना नायक और नायिका अपने इस्तेमाल के हिसाब से तय करते हैं। बल की नियति बुद्धि का औजार बनना भर होती है। इतिहास औजार का इस्तेमाल करने वालों का होता है औजार बन जाने वालों का नहीं।

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