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राजकाज: बर्बरीक बोध

हारने वाले के साथ खड़े रहने की नैतिकता हासिल करने के लिए किसी वरदान की जरूरत नहीं होती। लेकिन नैतिकता तभी ताकत बन पाती है जब उसे एक रणनीति मिले जो पक्ष और विपक्ष, हारने वाला-जीतने वाला जैसी तात्कालिक चीज नहीं धर्म स्थापना जैसे अमर लक्ष्य की ओर चले। बिना नीति और रणनीति के धर्म की जीत नहीं हो सकती है। धर्म की स्थापना के लिए दोनों एक साथ जरूरी है।

Rajkaj, Jansatta special storyनीति और नैतिकता का रहस्य समझ पाना कठिन है, लेकिन हारने वाले के साथ खड़े होना साहस का काम है।

महाभारत में नायकत्व के कई केंद्र हैं जिनमें बल और विवेक को लेकर टकराहट चलती है। मनुष्यता की कहानी में बल की ऊर्जा का सांस्कृतिक और आध्यात्मिक आख्यान तो है ही वैज्ञानिक तथ्य भी है। लेकिन बल एक सभ्यतागत मूल्य तभी बन सकता है जब उसका सारथी विवेक हो। महाभारत के नायक से लेकर खलनायक तक प्रतिज्ञाबद्ध हैं। अपनी जड़ प्रतिज्ञा के कारण ये भविष्य की गतिशीलता के बाधक बन जाते हैं। एक खास कोने में ली गई प्रतिज्ञा दूसरे कोने में जाकर असत्य के प्रति आग्रही भी बना सकती है। बर्बरीक हारने वालों के पक्ष में लड़ने की प्रतिज्ञा के साथ कुरुक्षेत्र के मैदान की ओर बढ़ते हैं तो उन्हें रोकने के लिए खुद हरि को आना पड़ता है। युद्धभूमि से अलग होकर ही बर्बरीक को ब्रह्म का बोध होता है और वे यह समझ पाते हैं कि हारने वालों के साथ भी हरि हैं। ‘हारे को हरिनाम’ में छुपे इसी अक्षरी ज्ञान पर बर्बरीक को आज के समय में तौलता बेबाक बोल

‘हारे को हरिनाम’
रामधारी सिंह दिनकर का यह काव्य संग्रह मनुष्यता की उस विराटता की बात करता है जहां सच को स्वीकार करना भी ओजस्विता के खाते में जाता है। ‘हारे को हरिनाम’ एक मुहावरा बन गया है विजयी पक्ष के खिलाफ उठी आवाज को प्रभु का आश्रयी बनाने का। लेकिन जब हम दिनकर के इस काव्य संग्रह को पढ़ेंगे तो हार और जीत के बीच की उस परम सत्ता को भी महसूस करेंगे जो युद्ध के मैदान में दोनों तरफ है। हारे हुए पक्ष का समर्पण किस तरफ हुआ है? दिनकर हारे हुए मन में मनुष्य की विराटता खोजते हैं।

दिनकर सवाल करते हैं, ‘किंतु पराजित मनुष्य और किसका नाम ले?’ ओजस्वी अक्षरों के सर्जक हारे हुए पक्ष को ब्रह्म के साथ जोड़ते हैं। महाभारत का संग्राम भी कुछ ऐसा ही था, जहां हार और जीत कोई स्पष्ट दिखने वाले मूल्य नहीं थे। हार के पक्ष को भी हरि से जोड़ने वाला किरदार है बर्बरीक। पूरे युद्ध को अपनी तरफ मोड़ने की ताकत रखने पर भी वे कृष्ण के प्रति सहज और सरल कैसे हो जाते हैं?

बर्बरीक महाभारत के उन दुर्लभ किरदारों में से हैं जिनकी लोक में पूजा होती है। वे भीम के पुत्र घटोत्कच और मौवती के पुत्र थे। बाल्यकाल में ही अपनी शिवभक्ति और वीरता के लिए विख्यात हुए। भगवान शिव ने उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर वरदान में तीन बाण दिए। एक बाण सारे दुश्मनों को एक साथ चिह्नित कर सकता था, दूसरा उन सभी चिह्नित दुश्मनों का वध कर सकता था और तीसरा बाण सारी सृष्टि का विनाश कर सकता था। युद्ध में सभी वीर भाग ले रहे थे। बर्बरीक ने भी युद्ध में हिस्सा लेने के लिए अपनी मां से इजाजत मांगी। मां ने कहा कि बेटा हमेशा हारने वाले पक्ष के साथ ही खड़े होकर लड़ना।

बर्बरीक हारे हुए का साथ देने की प्रतिज्ञा के साथ चल पड़े। कृष्ण उनकी इस प्रतिज्ञा के बारे में जान कर चिंतित हो उठे क्योंकि इस तरह तो युद्ध कभी खत्म ही नहीं होगा क्योंकि निर्णायक क्षण तभी आ सकता है जब कोई हारेगा। अपने वरदान वाले बाणों के साथ बर्बरीक हारने वाले की तरफ हो जाएगा तो फिर यह अनंत हो जाएगा। इसलिए बर्बरीक को युद्ध लड़ने से रोकना जरूरी था।

कृष्ण ने ब्राह्मण का वेश धर बर्बरीक से कहा कि युद्धभूमि की पूजा के लिए उन्हें किसी महाबलि का शीश चाहिए, इसलिए वह अपना शीश दान कर दे। बर्बरीक ने कृष्ण से वरदान मांगा कि शीशदान के बाद भी वह महाभारत का युद्ध देख सके। कृष्ण ने बर्बरीक के कटे हुए सिर को एक पहाड़ी पर स्थापित कर दिया और वह अंत तक वीरता का हुंकार भरते हुए युद्ध देखता रहा।

युद्ध खत्म होने के बाद पांडव जानना चाहते थे कि इस युद्ध का नायक कौन है? कृष्ण ने कहा कि यह बर्बरीक का शीश ही तय कर सकता है जो निष्पक्ष रूप से युद्ध देख रहा था। बर्बरीक रणभूमि से अलग होकर युद्ध के अध्येता बन चुके थे। वे धर्म का मर्म समझ चुके थे। उन्होंने कृष्ण को युद्ध का नायक घोषित किया क्योंकि पूरे युद्ध को और कोई नहीं, हरि ही दिशा दे रहे थे।

महाभारत में नायकत्व के कई केंद्र हैं। एक वो जिन्हें नायक बनाया जाना था जैसे अर्जुन। दूसरे वे जो नायकत्व के गढ़न में पक्षपात का शिकार हुए और प्रतिनायक बन गए जैसे दुर्योधन, एकलव्य और कर्ण। तीसरा केंद्र बर्बरीक है जिसे न तो नायक और न प्रतिनायक बनने का मौका मिला।

कुरुक्षेत्र में युद्ध को निष्पक्ष रूप से देखने के उस विराट पल ने बर्बरीक को कृष्ण की तरह पूजे जाने की राह बनाई। 18 दिनों तक कुरुक्षेत्र में वही एक किरदार स्थिर होकर देख पा रहा था और कृष्ण को समझ पा रहा था। वह देख पा रहा था कि दोनों पक्षों के बीच वासुदेव का सुदर्शन चक्र घूम रहा है। वहां हर पक्ष कृष्णपक्ष ही है। कृष्ण को समझना खुद कृष्ण हो जाना है। कृष्ण के लिए खुद को खोकर वह कृष्ण बन चुका था।

पहाड़ी पर स्थिर बर्बरीक धर्मचक्र को समझ चुका था। अपने दादा भीम को मल्लयुद्ध में हरा कर पांडवों को भौंचक कर देने वाला बर्बरीक कुरुक्षेत्र में जान चुका था कि महत्त्वपूर्ण यह नहीं है कि किसके पास कितनी ताकत है। यह भी महत्त्वपूर्ण नहीं कि आपको किससे और कैसा वरदान प्राप्त हुआ है।

महत्त्वपूर्ण है नीति और रणनीति। हारने वाले के साथ खड़े रहने की नैतिकता हासिल करने के लिए किसी वरदान की जरूरत नहीं होती। लेकिन नैतिकता तभी ताकत बन पाती है जब उसे एक रणनीति मिले जो पक्ष और विपक्ष, हारने वाला-जीतने वाला जैसी तात्कालिक चीज नहीं धर्म स्थापना जैसे अमर लक्ष्य की ओर चले। बिना नीति और रणनीति के धर्म की जीत नहीं हो सकती है। धर्म की स्थापना के लिए दोनों एक साथ जरूरी है।

हारे के साथ खड़े होने में नैतिक बल का बोध तो आता है। लेकिन यहां कोई लक्ष्य नहीं रह जाता और रणनीति भी नहीं बन पाती है। नैतिक मूल्यों के साथ सामाजिक मूल्य भी बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। आप जिसके साथ खड़े हैं वह धर्म है या अधर्म, यह तो देखना होगा। सिर्फ हारने वाले के साथ खड़े होना धर्म नहीं होता है। एक समय हारने वाले का ऊपरी आवरण नैतिकता का श्रृंगार कर लेता है। लेकिन यह बनावटी परत तार्किकता और विवेक के छींटे मारते ही धुल जाती है।

नैतिकता, नीति और रणनीति के द्वंद्व को आधुनिक भारत में गांधी की विचारधारा से समझ सकते हैं। गांधी ने अहिंसा को परम मूल्य माना। लेकिन सबके पास सत्य और असत्य को परखने के लिए गांधी जैसा विवेक नहीं होता है और वे गांधी के नाम पर असत्य के प्रति भी आग्रही हो जाते हैं। गांधी की नीति का उपयोग और दुरुपयोग दोनों किया जा सकता है। यह देखना जरूरी होता है कि आपकी ताकत किसे ताकतवर बना रही है।

भारत की आजादी का इतिहास तभी पूरा होता है जब गांधी और भगत सिंह एक-दूसरे के साथ आ जाते हैं। यह दूसरी बात है कि जिस तरह से भारत के संविधान को ‘वकीलों का स्वर्ग’ कहा जाता है, वहीं राजनीतिक दलों के लिए गांधी ‘मोक्ष द्वार’ जैसे हो गए हैं। कोई भी राजनीतिक दल गांधी को आत्मसात नहीं करना चाहता। लेकिन एक हाथ में उनके विचारों की लाठी जरूर पकड़ लेता है, भले बाद में वह उसका हिंसक इस्तेमाल कर ले।

18 दिनों का युद्ध देखने के बाद बर्बरीक वो बलवान बालक नहीं रहा जो हारने वाले के पक्ष में लड़ने की प्रतिज्ञा ले चुका था। वह चीजों को समय के साथ समग्रता में देख रहा है। ऊंची पहाड़ी से वह देख पा रहा है कि युद्ध के सपाट मैदान में हारना अपने आप में कोई मूल्य नहीं हो सकता है। जीत के साथ धर्म शिक्षा और मानवता की खातिर नीति और रणनीति भी है। प्रतिज्ञाबद्ध इंसान अब धर्म और अधर्म की अक्षांशीय दूरी पाट लेने पर ब्रह्म को जान लेता है। जीतने वाले के साथ हरि हैं तो हारने वालों के मस्तक पर भी वह हरिनाम को पढ़ पाता है।

पूरा युद्ध देखने के बाद बर्बरीक के पास सत्य की ताकत के साथ अनुभव भी है। इसी अनुभव से वे उस कृष्ण को नायक घोषित करते हैं जो जीतने वाले पक्ष के साथ खड़े थे। बिना पूरा युद्ध देखे उन्हें यह बोध हो ही नहीं सकता था कि धर्म और अधर्म के इस संग्राम में नायकत्व का केंद्र धर्म की स्थापना है जो प्रतिज्ञा की निजता में नहीं विश्व कल्याण की सार्वजनिकता में है। कृष्ण ब्रह्म हैं तो बर्बरीक उनका बोध। इसी ब्रह्मबोध के कारण बर्बरीक आज भी कृष्णभक्ति के लोक राग में हैं। वे हारे को हरिनाम की याद हमेशा दिलाएंगे।

राजस्थान के कई संप्रदाय प्रकृति पूजक हैं। विश्नोई समाज काले हिरण को भगवान का रूप मानता है और उसके लिए सलमान खान से टक्कर लेता है। काले हिरण को श्याममृग भी कहा जाता है। यहां के शेखावटी में खाटू धाम में बर्बरीक, कृष्ण के अवतार खाटू श्याम के रूप में पूजे जाते हैं। खाटू श्याम के भक्त प्रेमधारा में डूब जाते हैं। कृष्ण भक्ति की ही तरह पूरी दुनिया में खाटू श्याम के भक्त हैं।

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