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बेबाक बोलः पट्टीव्रता

गांधार प्रदेश की राजकुमारी गांधारी को स्वयंवर का विकल्प नहीं मिलता है। उसके लिए जिस नेत्रहीन राजकुमार से विवाह का प्रस्ताव आता है उसे ही अपने जीवन का संकल्प मान वह आंखों पर पट्टी बांध आगे के जीवन को अंधेरे में रखने की प्रतिज्ञा कर लेती है। सामंती समाज उसकी पीड़ा से आंखें मूंद उसे सती का दर्जा दे देता है। गांधारी एक जटिल चरित्र है और उसकी आंखों पर बंधी पट्टी प्रतिरोध का प्रतीक है। गांधारी अगुआई करती है उस स्त्री समुदाय का जो शुरू में प्रतिरोध न कर प्रतिशोध की अग्नि में दहकती है। लेकिन जब वो अपने सतीत्व की संचित ऊर्जा से अपने आखिरी जीवित पुत्र के शरीर को वज्र का बनाना चाहती है तो कृष्ण उसके साथ छल करते हैं। इस मोड़ पर आकर गांधारी सर्वशक्तिमान से टकराती है और दुनिया बनाने वाले को दुनिया से जाने का फरमान सुना देती है। पति और पट्टी के बीच इस व्रती के द्वंद्व पर बेबाक बोल।

गांधारी युद्ध में अपने निन्यानवे पुत्र की हत्या तक निष्पक्ष खड़ी रहती है। वो दोनों पक्षों के पुत्रों को बराबर का आशीर्वाद देती है।

महाभारत में स्त्री किरदार अपने प्रतिरोधी सुर के कारण विमर्श के कई द्वार खोलती हैं। इसमें स्त्री चरित्रों के साथ जो प्रयोग हो रहे थे वे आगे पितृसत्तात्मक समाज की नींव रख रहे थे। इन्हीं में से एक प्रयोगधर्मी चरित्र है गांधारी का। महाभारत के अंत तक कृष्ण सबके लिए अजेय थे। दुर्योधन जैसा चरित्र भी उनकी आग्नेय ऊर्जा के सामने नेत्र बंद कर लेता था। लेकिन महागाथा के उपसंहार में वो स्त्री कृष्ण से टकराती है जिसकी आंखों पर पट्टी बंधी थी। वो पूरे गीता ज्ञान को नकारते हुए कृष्ण को युद्ध का दोषी मानती है और उन्हें शाप देती है कि जिस तरह से तुमने मेरे कुल का नाश करवाया उसी तरह तुम्हारा यदुकुल समूल नष्ट हो जाए। कृष्ण उसकी आंखों को अपने विराट रूप से चौंधिया नहीं पाते हैं। सिर झुका कर इस प्रतिरोध को स्वीकारते हैं। समुद्र में डूबी द्वारिका नगरी गांधारी के प्रतिरोध का प्रतीक है।

महाभारत की शुरुआत होती है भीष्म प्रतिज्ञा से। महाराज शांतनु अपनी पसंद का विवाह कर सकें इसलिए युवराज देवव्रत आजीवन अविवाहित रहने का प्रण लेते हैं। उनकी इस प्रतिज्ञा को भीष्म मान कर देवता उन पर फूल बरसाते हैं। इस प्रतिज्ञा के कारण वो ब्रह्मांड में विशिष्ट और पूजनीय होते हैं। इसके बाद महाभारत में एक और प्रतिज्ञा होती है, जिसका कारण है भीष्म का लाया हुआ विवाह प्रस्ताव। इस बार प्रतिज्ञा एक स्त्री करती है। गांधार प्रदेश की राजकुमारी के लिए ऐसे राजकुमार का प्रस्ताव आता है जो नेत्रहीन है। भीष्म अपने लिए तो आजीवन विवाह नहीं करने का विकल्प चुनते हैं लेकिन भारतवर्ष की राजकुमारियों को उनके लाए विवाह प्रस्तावों को संकल्प की तरह स्वीकार करना पड़ता है। जिस अंबा ने अपना विकल्प चुनना चाहा उसकी हालत यह हुई कि उसे इस जन्म को त्याग कर अगले जन्म में भीष्म के विनाश का संकल्प लेना पड़ा।

गांधारी ने इस विवाह प्रस्ताव के बाद प्रतिज्ञा की पट्टी बांध ली। समाज ने उसके इस समर्पण को सतीत्व की संज्ञा दी। लेकिन गांधारी का चरित्र जिस तरह से उभरता है वहां इसे प्रतिरोध के रूप में ही देखा जा सकता है। इंसान जब अपने अंदर की सारी ऊर्जा को दबा कर बैठता है तो वह एक बिंदु पर तीव्र गति से फूटता है। इसी समाहित ऊर्जा से एक स्त्री की नजर अपने बेटे के शरीर को वज्र बना देती है, तो दुनिया बनाने वाले को दुनिया से जाने का फरमान सुना देती है।

गांधारी अपने पति की तरह जन्म से नेत्रहीन नहीं थी। उसने अपनी इच्छा से जानबूझकर पट्टी बांधी थी। आंखों पर पट्टी बांध गांधारी स्व के विस्तार की संभावना को खत्म कर देती है। हम स्व को रोक कर अपने नजरिए के विस्तार को रोक देते हैं। गांधारी की पट्टी की ज्यादातर व्याख्या इस रूप में हुई है कि पति दुनिया नहीं देख सकता है तो पत्नी भी नहीं देखे। लेकिन यह इतने तक सीमित नहीं है। भीष्म के लाए गए विवाह प्रस्ताव से गांधारी के स्व को कुचला गया। इसे बेमेल और जबरन विवाह के प्रमाण के रूप में भी देखा जाता है। गांधारी को कुंती और द्रौपदी की तरह स्वयंवर का मौका नहीं मिलता है। भीष्म के प्रस्ताव को गांधार नरेश सहर्ष स्वीकारते हैं और अपने बेटे शकुनि के विरोध की भी परवाह नहीं करते हैं। गांधारी के लिए ऐसे राजकुमार का प्रस्ताव आया है जिसके बारे में पता है कि वो हस्तिनापुर का महाराज नहीं बन सकता है। जब गांधारी की आंखों में देखने के लिए सपने ही नहीं हैं तो फिर उसके पास रह भी क्या जाता है। उसके पास एक उम्मीद उसकी कोख ही थी, लेकिन वहां भी वह कुंती से पिछड़ जाती है। पांडव पुत्रों को ही हस्तिनापुर के वारिस के तौर पर देखा जाता है। सामंती समाज में स्त्री के स्वप्न का विस्तार पति और पुत्र में ही होता है। पति के बाद उसके पुत्र में भी राजगद्दी का हकदार होने की उम्मीद खत्म हो जाती है।

महाभारत में दो स्त्रियां प्रतिशोध की अग्नि में दहक रही हैं। पांडवों के शिविर में एक दहकती आग द्रौपदी है जिसका सामंती मर्दवादी समाज ने भरी सभा में अपमान किया। द्रौपदी की पीड़ा और प्रतिशोध मुखर है जो सभी को दिख रहा है। वहीं, कौरवों के शिविर में भी एक स्त्री ही दहक रही है। जुए के एक दांव के कारण द्रौपदी को मिला रिसता हुआ घाव खुला था। द्रौपदी के पति ने एक बार जुआ खेला और उसके सम्मान को हार गया। गांधारी के पिता और भाई शकुनि को जुए के व्यसनी के तौर पर देखा गया है। गांधारी जैसी सर्वगुण संपन्न कन्या के हिस्से में स्वयंवर क्यों नहीं आया? आखिर उसे एक बेमेल प्रस्ताव को ही महादेव का प्रसाद क्यों मान लेना पड़ा? गांधारी की बेबसी की इमारत जुए की बुनियाद पर खड़ी थी। महाभारत में गांधारी और शकुनि का पदार्पण एक साथ होता है। शकुनि गांधारी के साथ हस्तिनापुर आता है तो यह भारतीय संस्कृति में स्त्री पक्ष के हित में ही देखा जाता है। सारे लोकगीतों में ससुराल में स्त्री के होठों पर भाई को लेकर भरोसे और उम्मीद के बोल फूटते हैं। भाई आएगा तो उसकी पीड़ा को समझेगा, विवाह बंधन से हुए जख्मों पर मरहम लगाएगा। लेकिन शकुनि वैसा भाई निकला जिसके कारण मुहावरों में मामा की छवि खलनायक जैसी हो गई। भाई अपने भांजे के बहाने सत्ता पर नियंत्रण चाह रहा था। बहन ने अपने सपनों पर पट्टी बांध ली थी तो शकुनि की आंखों में पूरे हस्तिानापुर पर नियंत्रण का तैरता स्वप्न कोई भी पढ़ सकता था।

यहां हमें एक चरित्र कुंती भी दिखती है। पांडु के मरने के बाद कुंती भी सती होने की राह चुन सकती थी। लेकिन उसने अपने बच्चों के लिए जीना और लड़ना पसंद किया। वह अपने मायके नहीं लौटी और ससुराल से अपना और बच्चों का हिस्सा मांगा। महाभारत के युद्ध के समय कुंती कौरवों के ही शिविर में थी। हां, जब उसके मातृकुल के कृष्ण ने उसका सकारात्मक साथ दिया तो उसके बेटों का पलड़ा बहुत भारी हो गया। कुंती और गांधारी के संघर्ष का फर्क दिखाता है कि स्त्री का सशक्तीकरण तो मातृकुल से ही शुरू हो जाता है। मायका साथ रहता है तो ससुराल का संघर्ष आसान हो जाता है। द्रौपदी की पीड़ा तो ससुराल से शुरू होती है लेकिन गांधारी की जमीन मातृकुल में ही कमजोर कर दी गई थी।

गांधारी युद्ध में अपने निन्यानवे पुत्र की हत्या तक निष्पक्ष खड़ी रहती है। वो दोनों पक्षों के पुत्रों को बराबर का आशीर्वाद देती है। लेकिन जब देखती है कि कृष्ण के कारण पांडवों का पलड़ा भारी है तो अपने एकमात्र जीवित पुत्र के शरीर को वज्र का बनाना चाहती है। यहां भी उसके सतीत्व की ऊर्जा में कृष्ण का छल बाधा बन जाता है। जिस सतीत्व को उसे अपने बेटे के जीवन को बचाने में खर्चना था उसे प्रतिशोध में कृष्ण की मौत का शाप देने में खर्च किया। सत्ता ने उसे सती का दर्जा तो दिया लेकिन वो अपनी मर्जी से अपने बेटे को सतीत्व का आशीर्वाद भी नहीं दे पाई। समाज में जो जितना सताना मंजूर कर लेती है उसे सतीत्व का उतना ही शानदार शामियाना ओढ़ा दिया जाता है।

गांधारी का पट्टी बांधना और खोलना दोनों को कई तरह के तर्कों के साथ देखा जाता रहा है। उसके जीवन का अंधेरा पूरी स्त्री जाति के दमन को सामने लाता है। आज आधुनिक युग के दांपत्य जीवन में भी ऐसा देखा जाता है। शुरू में दबाई हुई स्त्रियां, उस समय भले नहीं बोल पाती हैं। लेकिन उनके अंदर कुंठा पनप रही होती है। शुरू में सकारात्मक प्रतिरोध नहीं करने के बाद लिया गया प्रतिशोध इतिहास बदलने के काम तो नहीं आता, इतिहास के मोड़ पर सबक के तौर पर देखा जाता है। स्त्री समुदाय के लिए गांधारी की पट्टी इस बात का सबक है कि उसे अपना संबल खुद ही बनना होगा, समय पर बोल कर, आंखें खोल कर।

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