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राजकाज: अर्थशाप

जिस कोरोना को वुहान की देन समझ हम चीन को कोस रहे थे, वित्त मंत्री ने उसे भगवान की देन बता दिया। उस भगवान को जो खुद ही देशबंदी के कारण भक्तों से दूर सरकारी संरक्षण में चले गए थे। अब भी सभी भगवान पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाए हैं। कहीं भक्तों की सीमित संख्या का प्रबंध है तो कहीं सिर्फ ऑनलाइन दर्शन।

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण।

जान बची तो लाखों पाए…इक्कीसवीं सदी की सबसे बड़ी विपदा के समय सरकार ने इसी मुहावरे को ढाल बना कर चलने का फैसला किया कि जब स्वास्थ्य ढांचा चरमराया हुआ है तो देशबंदी के अलावा कोई विकल्प नहीं। लेकिन अर्थव्यवस्था मुहावरे से नहीं चलती। यहां जान बचाने के लिए जो लाखों गंवाए, उसके कारण जितने लोगों की खुदकुशी के कारण जान जा रही है वह हमें ठिठकने पर मजबूर कर रहा है। जान तो जा ही रही है वहीं माल का ऋणात्मक 23 फीसद में जाना पूरी व्यवस्था के नाकाम होने का प्रमाणपत्र है। स्वास्थ्य और शिक्षा अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं और इन्हें रसातल में भेजने के लिए देश के सभी पक्षों ने पिछले तीन दशकों में खूब मेहनत की। जान बचाने के नाम पर मालखाना खाली है और राज्य पूछ रहे हैं कि हम अपना काम कैसे चलाएं। वित्त मंत्री इसे आसमानी ताकत बता जिस तरह दरकी हुई जमीन को नजरअंदाज कर गईं उस पर नजर गड़ाता बेबाक बोल

4 दिसंबर 1952 और एलिजाबेथ द्वितीय का शासन। कई देशों पर राज करने वाला और कभी सूरज नहीं डूबने का दावा करने वाले उस समय ब्रिटेन की राजधानी लंदन के आसमान पर अंधेरा छा गया था। बकिंघम पैलेस परिसर से लेकर संकरी गलियों तक में एक कदम उठाने के बाद दूसरा कदम किधर रखना है, यह नहीं सूझ रहा था। अपुष्ट स्रोतों के आधार पर कहा गया कि 9 दिसंबर तक पांच दिनों के अंदर लगभग 12 हजार लोगों की मौत इस धुंध के कारण हो गई। तब के ब्रितानी प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल से पूछा गया कि धुंध के कारण हजारों लोगों की मौत का जिम्मेदार कौन है? चर्चिल का जवाब था-‘एक्ट आफ गॉड’। हालांकि भगवान पर जिम्मेदारी डालने के बाद भी चर्चिल की चमक पर धुंध का साया पड़ा और उनकी कुर्सी डोल गई।

4 दिसंबर 1952 को लंदन को धुंध ने अपनी चपेट में लिया। इसे ‘ग्रेट स्मॉग ऑफ लंदन’ के नाम से जाना जाता है। धुंध लंदन के लिए कोई नई चीज नहीं थी लेकिन यह काफी घनी और जहरीली थी। यह लोगों के घरों के अंदर तक घुस गई थी। सार्वजनिक परिवहन और एंबुलेंस सेवाओं तक ने काम करना बंद कर दिया था। मरने वाले लोगों में उनकी संख्या ज्यादा थी जिन्हें पहले से सांस की समस्या थी।

इतिहास का यह हिस्सा थोड़ी रचनात्मकता के साथ नवंबर 2016 से इंटरनेट के मंच पर ‘द क्राउन’ के नाम से उपलब्ध है। 2020 में पूरी दुनिया के साथ भारत भी इक्कीसवीं सदी की सबसे बड़ी आपदा कोरोना से जूझ रहा था तो यहां की सत्ता के मंच से भी वही शब्द दोहराया गया जो चर्चिल ने धुंध से उपजी आपदा पर कहा था। हमारे यहां राज्यों के अर्थ की रीढ़ जीएसटी का हिस्सा न मिलने और सकल घरेलू विकास दर के ऋणात्मक 23 फीसद तक नीचे जाने का ठीकरा कोरोना पर फोड़ा गया। और कोरोना के कारण पर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन ‘द क्राउन’ का संवाद दुहराती हैं-‘एक्ट ऑफ गॉड’।

जिस कोरोना को वुहान की देन समझ हम चीन को कोस रहे थे, वित्त मंत्री ने उसे भगवान की देन बता दिया। उस भगवान को जो खुद ही देशबंदी के कारण भक्तों से दूर सरकारी संरक्षण में चले गए थे। अब भी सभी भगवान पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाए हैं। कहीं भक्तों की सीमित संख्या का प्रबंध है तो कहीं सिर्फ ऑनलाइन दर्शन। देश में नौकरियों पर संकट है। गांव-कस्बों, शहरों से लेकर फिल्म उद्योग के गढ़ तक में खुदकुशी के कारण मौतों के बेतहाशा मामलों के बीच जब राज्य पूछते हैं कि हमारी कमाई कैसे होगी तो वित्त मंत्री उन्हें भगवान भरोसे छोड़ देती हैं। ये वही वित्त मंत्री हैं जो प्याज के दाम आसमान पर पहुंचने के बाद संसद में बड़ी हिकारत से कहती हैं कि मैं उस परिवार से आती हूं जो प्याज नहीं खाता।

ये वही हैं जिन्होंने बजट पेश करने के लिए दस्तावेजों को लाल कपड़े में लपेटने का कीर्तिमान बनाया। इसे बही-खाता का नाम दिया गया। मीडिया के एक बड़े हिस्से ने बजट की खबरों में मध्य वर्ग के खोया-पाया के बीच कलात्मक प्रस्तुति देते हुए उन्हें देवी लक्ष्मी का अवतार दिखाया। उनके बहुभुजा रूप में विभिन्न हाथों से अर्थव्यवस्था के लिए वरदान निकल रहा था। लगता है, वित्त मंत्री उस देवी वाले चरित्र से निकल नहीं पाई हैं। इसलिए सब कुछ देवत्व के दायरे में देख रही हैं।

अब जबकि देश के सभी हिस्से तालाबंदी से मुक्त हो रहे हैं और कोरोना के मामले में हम दुनिया की ‘अगुआई’ कर रहे हैं तो हमारी सरकारों के लिए सबसे बड़ा मुद्दा कंगना और रिया हो जाती हैं। एक सरकार उन्हें वाई श्रेणी की सुरक्षा देती है तो दूसरी को उनका अवैध दफ्तर गिराने की हड़बड़ी रहती है। एक के पास सीबीआइ और एनसीबी है तो दूसरी कहती है कि हमारी बीएमसी किसी से कम है क्या? मानो वित्त मंत्री ने कोरोना को ईश्वरीय देन बता दिया है तो हम इंसानों के पास करने के लिए अपनी-अपनी ध्रुवीकरण की राजनीति ही है। लेकिन दंगल की धूल खत्म होने के बाद रोजी-रोटी के सवाल पर तो आना ही होगा। रोजगार के क्षेत्र में पड़े अकाल की जिम्मेदारी किसकी होगी?

विकास दर में कमी वैश्विक है। लेकिन भारत में यह उच्च अवस्था में है। इस संकट का सामना कैसे किया जाए? यथार्थ बोध को सही परिप्रेक्ष्य में समझ लें तो निदान की ओर जाया जा सकता है। अगर जांच ही सही नहीं तो इलाज कैसे होगा? सभी राजनीतिक दलों में एक आम समझ बनी थी कि कर वसूली के लिए जीएसटी का ढांचा फायदेमंद होगा। इस समझ पर हर कोई मिले सुर मेरा-तुम्हारा का राग अलाप रहा था। कोई भी राजनीतिक दल इस मुद्दे पर विपक्षी नहीं बना। कांग्रेस लगातार बोलती रही कि जीएसटी हमारा गढ़ा हुआ ढांचा है और जब इसके नकारात्मक परिणाम आने लगे तो उसने इसे गब्बर सिंह टैक्स का नाम दे दिया।

कोरोना फैलने की शुरुआत में ही पूरी दुनिया में डरावना माहौल बन गया। भारत में पूर्ण देशबंदी की गई और उसे चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया गया। सवाल है कि इसका मकसद क्या था? विभिन्न राज्यों में स्वास्थ्य सुविधाएं चरमराने का जो मुद्दा है वह क्या सिर्फ इन्हीं छह सालों में हुआ? पिछले तीन दशकों में नीतिगत बदलाव की वजह से सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था ढह चुकी है। इस ढहे हुए ढांचे में महामारी जैसे संकट का मुकाबला करना संभव नहीं था और हमारे पास वैकल्पिक व्यवस्था भी नहीं थी।

सार्वजनिक स्वास्थ्य की पुरानी व्यवस्था भी तोड़ दी गई थी। ऐसे हालात में बीमा आधारित ‘आयुष्मान भारत’ जैसी स्वास्थ्य योजना के साथ महामारी का मुकाबला नहीं किया जा सकता था। सरकार के सामने चुनौती थी कि जान या माल में से किसे बचाया जाए और जमीनी हकीकत को देख जान बचाने के लिए माल का मोह छोड़ दिया गया।

शुरुआती विकल्प था जान बचाने का लेकिन उसके बाद माल के सवाल पर भी तो आना था। पता चला कि जान बचाने के लिए जो आर्थिक नुकसान है वह कहीं ज्यादा व्यापक है। बेरोजगारी बीमारी से ज्यादा जान ले रही है। लेकिन यह समझने में बहुत देर हो चुकी थी और हारे के लिए हरि नाम ही बचा था। इस नुकसान के बाद यह तो समझ जाना चाहिए कि स्वास्थ्य जैसे क्षेत्र का लोक कल्याणकारी पक्ष से विकास करना होगा। इसके नुकसान का असर पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। शिक्षा और स्वास्थ्य अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। आज चर्चिल के वारिस यूके के प्रधानमंत्री का कथन है कि मैं कम्युनिस्ट नहीं हूं पर इसके बावजूद कह रहा हूं कि सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा को मजबूत करना ही पड़ेगा। आज की तारीख में वे भगवान को जिम्मेदार नहीं ठहरा रहे हैं।

आपूर्ति ज्यादा और मांग कम की स्थिति को मंदी कहते हैं। यह स्थिति पूरी दुनिया की है जिसका असर बहुगुणक के तौर पर होता है। लोगों की खरीद क्षमता घटेगी तो माल नहीं बनेगा जिससे बेरोजगारी होगी। आमदनी और कम होगी तो खरीद क्षमता घटेगी ही। ऐसी स्थिति में वैश्विक समझ यही है कि जब तक लोगों की खरीद क्षमता नहीं बढ़ाई जाएगी तब तक सब कुछ भगवान भरोसे ही रहेगा।

वित्त मंत्री तो अपनी जिम्मेदारी नकार कर हालात को भगवान भरोसे छोड़ चुकी हैं। बीमारी और बेरोजगारी की मार से हम सब रो रहे हैं। कारखानों की ठंडी चिमनी पेट की आग नहीं बुझा पा रही है। गांव लौटे कामगार उम्मीद भरी नजरों से शहर की ओर जाती सड़क को फिर से देख रहे हैं। नौकरी खो चुका मध्यवर्गीय तबका समझ नहीं पा रहा है कि वह अपनी बदहाली का जिम्मेदार किसे ठहराए।

जब तक हमारी इंद्रियां सजग हैं तब तक वित्त मंत्री की बात हमारे कानों में गूंजती रहेगी कि यह सब भगवान का किया है। जब सामने दरकती हुई अर्थव्यवस्था का पूरा रेगिस्तान दिख रहा है तो वित्त मंत्री की सलाह को मान हम ईश्वर से यही प्रार्थना कर सकते हैं कि वह रेत को दरिया सा दिखा दे या हमारी आंखों को हर तरह की पहचान से बेजान कर दे।
‘ऐ खुदा रेत के सहरा को समंदर कर दे
या छलकती हुई आंखों को भी पत्थर कर दे’!

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