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बेबाक बोल: 2019 : पाठ चार

2014 में हुआ लोकसभा चुनाव छवि बोध की जंग भी था। छवि की ब्रांडिंग में जो आगे होगा, मैदान वही मारेगा। सपा-बसपा गठबंधन के बाद उत्तर प्रदेश के मैदान में कांग्रेस को मूर्छित ही माना जा रहा था, लेकिन ब्रांडिंग वाला बाजार इसी क्लाइमेक्स वाले समय को अहम मानता है। तुरुप का पत्ता भी इसी ब्रांडिंग का हिस्सा है। भारतीय राजनीति में इंदिरा गांधी को एक ब्रांड बना दिया गया है। 2019 के करो या मरो वाले हालात में इंदिरा जैसी छवि को औपचारिक तौर से उतारने का वक्त आ गया था। आज जब कांग्रेस की ओर से डंका बजा कर प्रियंका को उतारा गया है तो वे गांधी के साथ वाड्रा के भ्रष्टाचार के आरोपों के घेरेवाले कुलनाम को भी ढो रही हैं। 2019 के बाजार में हर दल की चाल को मास्टर स्ट्रोक ही बताया जा रहा है तो आमद का जयकारा थमने के बाद उन्हें बताना ही होगा कि उनकी ओर से जनता के लिए नया क्या है। कभी-कभी तुरुप का पत्ता जोकर से भी मात खा जाता है, खेल के इस विडंबना की याद दिलाता बेबाक बोल।

Author January 26, 2019 7:53 AM
प्रियंका गांधी और रॉबर्ट वाड्रा की फाइल फोटो। (Express Archive photo by Prem nath Pandey)

हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला जो शिक्षक भर्ती घोटाले के आरोप में इन दिनों जेल में हैं, ने कहा था कि राजनीति में कभी संभावनाओं का अंत नहीं होता। उनका यह बयान इस सवाल पर था कि आज उनकी पार्टी इंडियन नेशनल लोकदल जो भाजपा के साथ कभी न मिलने की कसमें खा रही है, क्या यह आगे भी बना रहेगा। चौटाला ने जिस संभावना की बात की थी वह पिछले डेढ़ दशक में कभी पूरी होने की नौबत नहीं आई। हां, भारतीय राजनीति के मैदान में उस संभावना को सच्चाई बना दिया गया है जिसका ढोल पिछले कई सालों से बजाया जा रहा था। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रियंका गांधी को इस बार औपचारिक पते के साथ पूर्वी उत्तर प्रदेश का कार्यभार सौंपा है। यह औपचारिक पता है, दिल्ली में 24 अकबर रोड पर कांग्रेस मुख्यालय का। राजनीति के मैदान पर प्रियंका नई नहीं हैं और न ही नया है उनके कुलनाम से करिश्मे की उम्मीद। हां, इस बार वे दो कुलनामों के साथ हैं। आज जब वे प्रियंका गांधी वाड्रा की पहचान के साथ हैं तो पति के उपनाम पर भ्रष्टाचार के आरोपों की परछाई भी साथ लेकर चल रही हैं।

सक्रिय और औपचारिक राजनीति में बहन की आमद के साथ ही भाई के चेहरे पर दबाव भी बढ़ जाना तय है। हालांकि, राजनीति में चुनाव के पहले और बाद के यथार्थ को बदलते देर नहीं लगती। जो जीता वही सिकंदर होता है और वही कबूल और नाकबूल करवाना तय करता है। इसलिए पहली चुनौती है उतनी सीटें लाना कि भाई परिदृश्य से बाहर न हो।

आज 47 साल की उम्र में जिन्हें औपचारिक पदभार दिया गया है उन्हें राजनीति में आने के लिए किसी कागज के टुकड़े पर पदनाम की जरूरत थी भी नहीं। वह 16 साल की उम्र थी जब प्रियंका गांधी ने सार्वजनिक मंच को संबोधित किया था और आम जनता ने उनमें इंदिरा गांधी की छवि देखी थी। इसके बाद था 1999 का समय, 27 साल की प्रियंका गांधी वाड्रा और रायबरेली के मैदान में खड़े सतीश शर्मा। कांग्रेस उम्मीदवार सतीश शर्मा के खिलाफ खड़े थे भाजपा खेमे में गए अरुण नेहरू। अरुण नेहरू राजीव गांधी के ममेरे भाई थे। उस समय के चुनावी जानकार, खटास के बाद कांग्रेस के खिलाफ खड़े अरुण नेहरू का पलड़ा भारी बता रहे थे। तभी रायबरेली की जनता से प्रियंका की अपील गूंजी, ‘मुझे आपसे एक शिकायत है, मेरे पिता के साथ जिसने गद्दारी की, पीठ में छुरा भोंका, जवाब दीजिए ऐसे आदमी को आपने यहां घुसने कैसे दिया? उनकी यहां आने की हिम्मत कैसे हुई’। इस भावुक अपील का असर था कि चुनावी नतीजों में अरुण नेहरु चौथे पायदान पर पहुंच गए थे।

अरुण नेहरु को परास्त करने के पहले और बाद भी मां और भाई की मदद के लिए प्रियंका खास कर उत्तर प्रदेश के मोर्चे पर डटी रही हैं। 56 इंच वाले सीने का जवाब भी पहली बार प्रियंका की तरफ से ही बड़े दिल के रूप में आया था। साथ ही अक्षरों का विस्तार कर नाम लेने की लोकप्रिय शैली को एबीसीडी पढ़ाना बता कर टक्कर देती ही रही हैं। उत्तर प्रदेश में पिता की पीठ में छुरा घोंपने वाले को जनता से सजा देने की मांग कर तो दक्षिण में पिता के हत्यारों को अपनी तरफ से माफ करने वाली प्रियंका आज औपचारिक पद के साथ उतारी गई हैं तो फिर हंगामा है क्यों बरपा।

हंगामा इस सर्वमान्य तथ्य पर है कि कांग्रेस ने अपना तुरुप का पत्ता चल दिया है। लेकिन यहां यह भी ध्यान रखने की बात है कि सियासत के मैदान में कभी-कभी तुरुप का पत्ता नाकाम भी हो जाता है। यहां पत्ते इस तरह फेटे जाते हैं कि कई बार जोकर भी बादशाह को परास्त कर देता है। भारतीय राजनीति के इतिहास में इंदिरा गांधी की वो ऐतिहासिक हार भी दर्ज है जो उनके हाथों मिली थी जिन्हें सियासी जोकर का ही दर्जा हासिल हुआ था। हाल ही में बीता चुनाव भी उनके सिर जीत का ताज दे गया जिसे जोकरनुमा ‘पप्पू’ का खिताब दिया गया था। तीन राज्यों के नतीजों के बाद ‘पप्पू’ को औपचारिक रूप से श्रद्धांजलि देकर चुनाव नतीजों के बाद हुए पहले ही प्रेस कॉन्फ्रेंस में ‘श्री’ लगाना पड़ा।

तो इस बार तुरुप का पत्ता और औपचारिक मोहर के साथ नया है उम्मीदों का वह पहाड़ जो ‘बजेगा डंका जब आएगी बेटी प्रियंका’ की मांग पूरी होने के बाद खड़ा हुआ है। एक औपचारिक एलान के बाद वे ये-वो से लेकर पता नहीं क्या-क्या कर देंगी वाला भाव उत्तर प्रदेश की जमीन पर तैराया जा रहा है। साथ ही खास बात यह है कि राहुल गांधी के विपरीत उन्हें प्रशिक्षु की तरह नहीं अनुभवी चेहरे के तौर पर उतारा गया है। राहुल गांधी ने खुद ही एलान किया है कि हम बैक फुट पर नहीं फ्रंट फुट पर खेलेंगे।

इस बार प्रियंका को फ्रंट फुट दिया गया है पूर्वी उत्तर प्रदेश में। पूर्वी उत्तर प्रदेश जो सपा और बसपा का गढ़ रहा था। आज अगर भाजपा आलाकमान की राजनीतिक पदोन्नति हुई या उन्हें चाणक्य का दर्जा हासिल है तो उसमें अहम भूमिका थी उत्तर प्रदेश के नतीजों की। खासकर पूर्वी उत्तर प्रदेश में भाजपा का पताका लहराना ऐतिहासिक था। पूर्वी उत्तर प्रदेश में 2009 में कांग्रेस को 13 से ज्यादा सीटें मिली थीं। कांग्रेस को उम्मीद है कि प्रियंका का चेहरा उन खोए मतदाताओं को वापस लाने में मददगार होगा। हालांकि उनके प्रचार के बाद 2014 की ऐतिहासिक हार भी थी जब पार्टी के खाते में महज दो ही सीटें थीं। आम चुनाव के बाद 543 में से 44 सीटें हासिल करने वाली कांग्रेस औपचारिक रूप से विपक्ष का दर्जा भी खो चुकी थी।

इस पूर्वी उत्तर प्रदेश में दो कद्दावर चेहरे हैं, एक राज्य के और दूसरे केंद्र के। उन दोनों कद्दावर चेहरों के करिश्मे के आगे नया जादू बिखेरना आसान नहीं होगा। यही उत्तर प्रदेश है जहां मायावती भी अपने विकल्प बनने का दावा कर रही हैं, और जिसे खारिज भी नहीं किया जा सकता है। यहां मुलायम और अखिलेश भी हैं जो केंद्र नहीं तो सूबे की राजनीति में खुद को स्थापित करने की पूरी कोशिश में जुटे हैं।

आर्थिक आधार पर दस फीसद आरक्षण देकर भाजपा और गठबंधन कर सपा और बसपा भी अपने तुरुप के पत्ते चल चुकी है। इनमें कांग्रेस का पत्ता अहम इसलिए है कि इसके बाद पार्टी का करिश्मा या तुरुप का पत्ता वाला खाता पंद्रह से बीस सालों के लिए खाली हो जाएगा। प्रियंका नेहरु-गांधी परिवार की नई सदस्य हैं जो औपचारिक राजनीति में शामिल हुई हैं। अब कांग्रेसी खेमे के अगले करिश्मे के लिए देश को लंबा इंतजार करना होगा। कभी इंदिरा लाओ देश बचाओ वाला नारा आज प्रियंका लाओ कांग्रेस बचाओ तक सिमट गया है। इस सिमटे हुए भाव में इस बार यह करिश्मा चलेगा या नहीं यह तो वक्त बताएगा। लेकिन अहम है कि उत्तर प्रदेश में चारों दलों ने कथित तुरुप का पत्ता या मास्टरी चाल ही चलने का दावा किया है। अब देखना है कि जनता इन पत्तों को कैसे फेटती है।

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