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बेबाक बोल: सेना पर सियासत

अभिनंदन आज देश के नायक इसलिए हैं कि उन्होंने बस अपना काम ईमानदारी और सहजता से किया। बस खास-खास की मांग होने वाले समय में अभिनंदन यही बताते हैं कि नायक होने के लिए आपका आम होना कितना जरूरी है।

भाजपा के पोस्टर में विंग कमांडर अभिनंदन की तस्वीर। (Photo: Twitter@reachsk7)

‘आइ एम नॉट सपोज्ड टु टेल यू दिस’… यह किसी हालीवुड या बालीवुड के नायक का संवाद नहीं, न ही कितने आदमी थे रे वाले किसी खलनायक का तकिया कलाम। यह भारतीय वायुसेना के एक विंग कमांडर का दुश्मन फौज के कब्जे में दिया गया बयान है। यह बयान देते वक्त अभिनंदन बहुत जख्मी थे, आंखों पर पट्टी बंधी थी और उन्हें कुछ अंदाजा नहीं था कि आगे उनके साथ क्या किया जा सकता है। आंखों पर पट्टी जरूर बंधी थी मगर उनकी रीढ़ की हड्डी सीधी थी और जुबान एकदम सहज।

आइ एम नॉट सपोज्ड टु टेल यू दिस…कहने वाले अभिनंदन 27 फरवरी के पहले खामोशी से वायुसेना में नौकरी कर रहे थे। पाकिस्तान में बालाकोट पर भारतीय वायुसेना के हमले के बाद सीमाई क्षेत्र में तैनात थे। मिग विमान से दुश्मन देश के आधुनिक विमान को पुरजोर टक्कर दी और विमान के क्षतिग्रस्त होने से पहले पैराशूट की मदद से निकलते वक्त यह नहीं मालूम था कि सरहद के किस पार गिरेंगे। यह पता चलते ही कि वे अब पाकिस्तान की सीमा में हैं, जल्दी से संवेदनशील दस्तावेजों को निगला और कुछ को पास के तालाब में नष्ट करने की कोशिश की। उनके पास पिस्तौल थी लेकिन हमलावर हुए पाकिस्तानी नागरिकों पर गोली नहीं चलाई। पाकिस्तानी सेना के कब्जे में आए और अंतरराष्टÑीय नियमों के तहत जरूरी जानकारी देकर, आगे के सवाल पर वही कहा जो आज देश का बच्चा-बच्चा दोहरा रहा है।

आइ एम नॉट सपोज्ड टु टेल यू दिस…कह अभिनंदन तो इतिहास में अपना नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज करवा गए लेकिन अपनी-अपनी राजनीति के तहत उनका अभिनंदन करने वाले क्या कह रहे हैं? वो जो कह रहे हैं क्या उनसे इस तरह की बातों की उम्मीद थी। जो सरकार में हैं वो अपनी चुनावी रैलियों में अभिनंदन की तस्वीर के पोस्टर लगा रहे हैं। अभिनंदन की ईमानदारी और बहादुरी को अपने नाम कर रहे हैं। प्रचार के वाहनों पर अभिनंदन के पोस्टर हैं। दिल्ली में भाजपा नेता अभिनंदन की शान में मोटरसाइकिल रैली निकालते हैं तो सेना के रंग और छापे वाली वर्दी पहन कर। आम तौर पर सेना की आचार संहिता यही कहती है कि उसकी वर्दी का इस्तेमाल किसी निजी आयोजन के लिए न किया जाए। लेकिन विपरीत हालात में भी अभिनंदन जैसे निडर जांबाज के वीडियो देख कर भी हम उनसे कुछ सीख नहीं पाए। अभिनंदन आज देश के नायक इसलिए हैं कि उन्होंने बस अपना काम ईमानदारी और सहजता से किया। बस खास-खास की मांग होने वाले समय में अभिनंदन यही बताते हैं कि नायक होने के लिए आपका आम होना कितना जरूरी है।

अब विपक्ष के वरिष्ठ नेता का बयान देखते हैं। कांग्रेस के नेता सलमान खुर्शीद अपने ट्वीट में कहते हैं, ‘विंग कमांडर अभिनंदन, जो अब भारत के जवाबी हमले का चेहरा बन चुके हैं, का बहुत-बहुत अभिनंदन। कष्ट के क्षणों में स्थिरता और आत्मविश्वास। हमें गर्व है कि वे 2004 में वायुसेना में नियुक्त हुए और यूपीए के कार्यकाल में एक परिपक्व फाइटर पायलट बने।’ अभिनंदन की तैनाती को अपने शासनकाल से जोड़ कर देखने की यह भावना किस श्रेणी में आएगी। दोनों पक्ष कह रहे कि शहीद और सेना के मामलों में राजनीति न करें लेकिन दोनों पक्षों की राजनीति पुरजोर है।

राष्टÑीय राज्य की अवधारणा के बाद लोकतांत्रिक देशों में सेना का अपना महत्त्व है। यह वैसी अवधारणा है, जहां सेना तब तक बैरक में रहती है जब तक देश के लोगों को उनकी जरूरत नहीं पड़ती। हर लोकतांत्रिक और सही सोच-समझ वाला देश कोशिश यही करता है कि सेना को अपने शिविरों से न निकलना पड़े, देश के लोगों को उनकी जरूरत न पड़े। जिनकी जरूरत न पड़ने की दुआएं की जाती हैं उनकी जरूरत देश और उसके लोगों के लिए कितनी अहम होगी इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। इसलिए सेना जैसी संस्थाओं को देश के लिए ही रहने देना चाहिए, उन्हें देश की राजनीति से दूर रखना चाहिए।

इस बार का चुनावी पाठ यही है कि अगर सेना का राजनीतिकरण किया जाएगा तो आपकी आवाज वैसे पड़ोसी देशों के टीवी चैनलों पर गूंजेगी जो पड़ोसी होकर भी दोस्त नहीं बने रहना चाहता। दुश्मन का दुश्मन दोस्त की तर्ज पर आपके बयान अगर उनके टीवी चैनलों पर दिखाए जाते हैं तो आपको सोचना चाहिए कि आपसे कहां गलती हो रही है। चुनावी समय और सेना के पराक्रम का एक साथ आमना-सामना होने पर आपको क्या कहना है इसका अनुशासन आपको अभिनंदन जैसे फौजी से सीख लेना चाहिए। सेना का दूसरा नाम अनुशासन भी है। क्या, कैसे, कब और कहां करने का अनुशासन। अगर आप इस अनुशासन का पालन नहीं करते हैं तो सेना के जयकारे लगाने का कोई मतलब नहीं है। राजनेताओं से लेकर मीडिया के कई माध्यमों की यही दिक्कत है कि सेना के मामले में वे मेरी कमीज, तेरी कमीज से सफेद है वाली भाषा पर उतर जाते हैं।

एक राजनेता दूसरे से कहने लगता है कि तुमने देश का, सैनिक का, शहीदों का अपमान किया है। एक सैनिक का जीवन कितना कठिन होता है उसकी ताजा मिसाल अभिनंदन हैं और युद्ध कितना खतरनाक होता है उसके लिए हम भारत-पाक से थोड़ा आगे बढ़ जापान को देख लें। जब अमेरिका ने हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराया था तो सिर्फ सैनिक शहीद नहीं हुए बल्कि एक पूरी सभ्यता और संस्कृति का विनाश हुआ। एक भूभाग पर हुए इस हमले ने युद्ध और मानवता को लेकर पूरा विमर्श बदल दिया था। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद आई आर्थिक मंदी पर तो काबू पा लिया गया था, लेकिन मानवीय मूल्यों में आई मंदी से हम आज तक उबर नहीं आए पाए हैं। शायद इसलिए आज जापान युद्ध नहीं बुद्ध के पूजक देश के रूप में जाना जाता है।

सीमा पर जब मुश्किल समय आता है तो देश के अंदर देशभक्ति दिखाने की जंग शुरू हो जाती है। लेकिन लोग भूल जाते हैं कि देशभक्ति का असली केंद्र उन आम किसानों, निम्न और मध्यमवर्गीय परिवारों में है जो अपने बेटे को सेना में भेजते हैं। देशभक्ति उन लोगों में है जो ईमानदारी से मरीजों का आॅपरेशन करते हैं, कक्षाओं में बच्चों को पढ़ाते हैं, पुल और ऊंची इमारतें बनाते हैं, खेतों में फसल उगाते हैं, ऊंची इमारतों का निर्माण करते हैं। यह सब काम अगर ईमानदारी से कर लिए जाएं तो अलग से देशभक्ति के प्रदर्शन की जरूरत नहीं। अभिनंदन के वायरल वीडियो की सीख यही है कि अपने तय किए काम को बिना मिलावट के करो।

अब जब कोई नेता चुनावी प्रचार की जीप के बोनट पर अभिनंदन के पोस्टर को बांध लेता है, कोई कहता है कि इस लहर से हम अपने राज्य की सभी सीटें जीत जाएंगे और कोई यह कि यह जवान हमारी सरकार के समय में नियुक्त हुआ था तो लगता है कि सेना के प्रदर्शन पर अपनी राय रखने में अभी हम बहुत अपरिपक्व हैं। पक्ष से लेकर विपक्ष तक सेना की सियासत कर रहे नेताओं को सुनाने के लिए ही शायद एक कलमकार ने लिखा है कि हम अपनी सरकार से प्यार किए बिना भी अपने देश से प्यार कर सकते हैं।

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