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बेबाक बोल: विषम विवाद

पर्यावरण बचाने का हल्ला मचा कर नवंबर में दिल्ली में सम-विषम योजना का आगाज होगा।

Author Published on: September 21, 2019 3:16 AM
जब चुनाव सामने है तो आप ऐसी सीमित नजरिए की परियोजना लेकर आ जाते हैं जिसमें आपको किसी नीतिगत फैसलों के खिलाफ भी न जाना पड़े और पर्यावरण-पर्यावरण का राग भी छिड़ जाए।

राष्ट्रमंडल खेलों की मेजबानी ने राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली को उपरिगामी पुलों का जाल तो दे दिया लेकिन उस पर दौड़ने के लिए सार्वजनिक बसों की संख्या में इजाफा नहीं किया गया। सरकारी योजनाओं में विकास के नाम पर सड़कों पर वाहनों की गति बढ़ाना ही लक्ष्य बनता रहा है। पर्यावरण और प्रदूषण के नजरिए से विकास का वैकल्पिक मॉडल देने के बजाए विकल्प की उम्मीदों वाली आम आदमी पार्टी की सरकार भी सम-विषम जैसी योजनाओं से हंगामा खड़ा करना भर ही चाह रही है। दिल्ली की आबोहवा जब यहां के लोगों को जानलेवा बीमारियां दे रही है, गर्भ में भू्रण पर प्रदूषण का असर दिख रहा है तब नीतिगत फैसलों पर विमर्श किए बिना सम-विषम लागू करने का एलान करना चुनावी मौसम में हंगामा अपने पक्ष में करने की कवायद ही दिख रही है। पर्यावरण जैसे अहम मसले पर लोकलुभावन कदमों तक ही सीमित रहने पर बेबाक बोल।

‘हंगामा-ए-हयात से लेना तो कुछ नहीं
हां देखते चलो कि तमाशा है राह का’

पर्यावरण पर बड़ी बहसों के बीच दिल्ली में आम आदमी पार्टी के अगुआ और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने सम-विषम योजना फिर से लाने का एलान किया है। आम आदमी पार्टी विकल्प की जिस उम्मीद का सपना लेकर आई थी वह शासन से लेकर प्रशासन और विकास के मॉडल तक लोकलुभावन ही रहा। आज जब अदालतें दिल्ली की आबोहवा पर चेतावनी दे रही हैं, अपने बच्चों की सेहत की खातिर लोग दिल्ली छोड़ कर जा रहे हैं, मां के गर्भ में ही भ्रूण पर प्रदूषण की मार पड़ रही है, प्रदूषण जनित मरीजों की संख्या बढ़ रही है तब फिर एक बार सम-विषम के जरिए महज हंगामा खड़ा करना ही मकसद दिख रहा है।

पिछले दिनों बाघों की संख्या पर पूरे देश में बहस छिड़ गई थी। पारिस्थितिकी के हिसाब से धरती पर बाघों का महत्व है। आधुनिक पर्यावरणविदों का आकलन है कि जंगलों में बाघों की संख्या ही तय करेगी कि इंसानी बस्तियों का क्या भविष्य होगा। दुनिया भर में बाघों की संख्या पर सबसे ज्यादा शोध होते हैं ताकि इंसानों के बारे में बात हो सके। जिस तरह बाघों की संख्या पर्यावरण के हालात का सूचक है उसी तरह दिल्ली में पर्यावरण को लेकर उठाए हुए कदमों पर बात कर पूरे देश के हालात का जायजा लिया जा सकता है कि अभी हम पर्यावरण विमर्श को लेकर कितने अगंभीर और पिछड़े हुए हैं।

जब दिल्ली को लेकर बहस हुई तो पर्यावरण की बड़ी चुनौतियों ग्लोबल वार्मिंग से लेकर पर्यावरण असंतुलन के खतरों को लेकर कदम उठाने चाहिए थे। लेकिन आम आदमी पार्टी के पूरे कार्यकाल में इतने बड़े विषय को सिर्फ सम-विषम पर केंद्रित कर दिया गया। विकास का जो ढांचा है, उसमें शहरीकरण और केंद्रीकरण की प्रक्रिया, प्राकृतिक साधनों के दोहन जैसे नीतिगत मसलों पर चुप्पी साध ली जाती है। जब चुनाव सामने है तो आप ऐसी सीमित नजरिए की परियोजना लेकर आ जाते हैं जिसमें आपको किसी नीतिगत फैसलों के खिलाफ भी न जाना पड़े और पर्यावरण-पर्यावरण का राग भी छिड़ जाए।

बात राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की ही करते हैं। यहां यातायात प्रबंधन में सबसे बड़ा संकट पैदल चलने वालों का ही है। पैदल यात्रियों के चलने की जगहों पर अतिक्रमण को लेकर सरकार आंखें मूंदे रहती है इसलिए उन्हें अपनी पीठ पर भी आंखों की जरूरत महसूस होने लगती है कि पता नहीं कब कौन सी गाड़ी आकर उन्हें ठोकर मार दे। सार्वजनिक परिवहन में सबसे अहम है बसों की संख्या। बसों और मेट्रो जैसे साधनों का विकास किए बिना सार्वजनिक परिवहन दुरुस्त नहीं हो सकता है। जब दिल्ली को राष्टÑमंडल खेलों की मेजबानी मिली थी तो उम्मीद जताई गई थी कि यहां सार्वजनिक परिवहन दुरुस्त होगा। लेकिन उस समय की बसें अब यात्रियों का साथ छोड़ रही हैं, और कहीं भी खड़ी हो जाती हैं। पिछले साल अक्तूबर में सबसे ज्यादा बसें खराब हुईं। सूचना के अधिकार से मिली जानकारी के आधार पर हाल में जारी रिपोर्ट दावा करती है कि दिल्ली परिवहन निगम की बसों में लगातार कमी आ रही है।

साल 2011 में बसों की संख्या जहां 6204 थी वहीं जून 2019 में यह संख्या घटकर 3781 रह गई है। जून 2019 तक दिल्ली वालों के लिए महज 3600 डीटीसी बसें हैं जिसमें लगभग 25 लाख यात्री सफर करते हैं। इतनी बड़ी संख्या में यात्रियों के लिए कम से कम बीस हजार बसों की जरूरत बताई जाती है। आम आदमी पार्टी ने नई बसों की योजनाओं को मंजूरी तो दी लेकिन उसे कागजों से निकाल कर जमीन पर उतारने में कामयाब नहीं हो पाई।

आम आदमी पार्टी की सरकार सम-विषम योजना का पहले भी प्रयोग कर चुकी है। इस प्रयोग से चंद दिनों के लिए सड़कों को सुनसान जरूर करा दिया गया। लेकिन इससे हासिल क्या हुआ? इसका फायदा यह देखा गया कि जो सीमित संख्या में कारें सड़क पर निकलीं उनकी गति बहुत ज्यादा थी। वैसी गति जो हर वाहन चालक चाहता है। तो आपका पूरा विकास मॉडल इसी पर केंद्रित हो जाता है कि आपकी गाड़ी की गति कितनी है। राष्टÑमंडल खेलों ने दिल्ली को पुलों का जाल दिया। सड़कों पर निवेश की सारी योजनाएं इसी नजरिए से बनाई गईं कि गाड़ियां कितने फर्राटे से आगे बढ़ सकेंगी। विकास का मतलब निवेश के आधार पर सड़कों पर वाहनों की गति बढ़ाना भर ही रह गया। इन सबमें सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करने की कोई चिंता नहीं दिखाई गई।

आज पर्यावरण के संदर्भ में धूल सबसे बड़ी समस्या है। दिल्ली से लेकर ज्यादातर शहरों में देख लीजिए, हर जगह सड़कों के निर्माण के नाम पर सीमेंट बिछाई जा रही है। यही सीमेंट धूल का सबसे बड़ा कारण बनती है। गर्मी से लेकर सर्दी के मौसम में यह अलग तरह से कहर बनती है। गर्मी में आसमान खुला होता है तो यह धूल हवा के ऊपर उड़ जाती है। लेकिन सर्दी में इसी धूल की वजह से ओस अब जानलेवा धुंध में बदल चुकी है। और, जरा इस धूल के निपटारे के तरीके पर भी बात करें। निगम ने सड़कों पर धूल को सोखने वाली गाड़ियां खरीद लीं, जो कि अब तक का सबसे नाकाम प्रयोग है। ऐसी नाकाम मशीनों से बेहतर था कि पानी से धूल बिठाई जाए। घास लगाई जाई जो धूल को रोके। अगर सड़क बनानी है तो सीमेंट से बेहतर अलकतरा का उपयोग हो सकता है। इन बुनियादी चीजों में ही सरकार की प्रदूषण को लेकर सोच का अंदाजा लगाया जा सकता है।

पर्यावरण बचाने का हल्ला मचा कर नवंबर में दिल्ली में सम-विषम योजना का आगाज होगा। उसके तुरंत बाद विधानसभा चुनाव होने हैं। तो इस नाकाम प्रयोग पर जब विपक्षी पार्टियों से लेकर आम लोग तक सवाल उठाएंगे तो फिर बड़े हल्ले का रास्ता खुल जाएगा कि देखो जी, हमें काम नहीं करने देते हैं। आम आदमी पार्टी ने प्रदूषण के अलग-अलग कारकों पर केंद्रीकृत नजरिया अपनाने की कोशिश नहीं की है। विकास का विकल्प न देकर यह उस विभाजनकारी राजनीति का विकल्प है जिसमें पीड़ित होने का चस्पा लेकर जनता के दरबार में जाया जाए।

बिना कार वाली जनता यह सोच कर खुश हो जाए कि लो जी, कार वाले अपनी गाड़ी नहीं निकाल पाए, लेकिन वह यह सवाल नहीं पूछे कि अब तक हमारे लिए बसों का इंतजाम क्यों नहीं किया। और जो गाड़ी निकाल पाएंगे वो यही सोच कर खुश हो जाएंगे कि वाह क्या फर्राटा है, बाकी बच्चों के साथ कुछ दिनों की छुट्टी लेकर पहाड़ पर या समुद्र किनारे प्रदूषण फैलाने पहुंच जाएंगे। इसके बाद सरकार पर्यटन के क्षेत्र में मंदी मिटाने का दावा भी कर दे तो कोई आश्चर्य नहीं होगा।

आम आदमी पार्टी ने इस बार भी साबित किया कि पर्यावरण और प्रदूषण के नाम पर सम-विषम योजना उसके लिए लोकलुभावन और विभाजनकारी राजनीति का हथियार भर है। हम इस बार भी सरकारों से निवेदन करेंगे कि सड़क और परिवहन की योजनाओं में गति से आगे निकल कर सार्वजनिक परिवहन पर निवेश बढ़ाएं, पैदल चलने वालों के लिए सुरक्षित रास्ता दें और हरियाली बढ़ाएं। इस बार भी सम-विषम एक हंगामा तो जरूर लाएगा, उसके बाद फिर सब भुला दिया जाएगा।

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