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बेबाक बोल: 2019 : पाठ पांच

गरीबों को न्यूनतम आय की गारंटी का चुनावी वादा कांग्रेस की ओर से उछालने के साथ ही केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दे दी कि अयोध्या में गैर विवादित जमीन रामजन्मभूमि न्यास को दी जाए। पहले वाले वादे पर जनता सोच रही कि इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया था। गरीबी हटाओ का मतलब यही था कि सबकी जेब में कुछ हो, कोई भूखे पेट न सोए। ऐसी स्थिति तो नहीं आई, अलबत्ता अब उस नारे को गरीबों के लिए न्यूनमत आय का नाम देकर फिर से 2019 के मैदान में उतारा गया है। वहीं दूसरे पक्ष से पूछा जा रहा कि आस्था तो उसी विवाद पर थी, गैर विवादित वाले ‘कांग्रेसी मंदिर’ का हम क्या करें। भाजपा के घोषणापत्र में भटकते राम मंदिर पर कांग्रेसी नेता ने दावा ठोक दिया कि ताला हमने खोला था तो मंदिर भी हम ही बनवाएंगे। गैर विवादित भूमि वाले ‘रामबाण’ का असर 2019 के मैदान में क्या होने वाला है, इसी का विश्लेषण करता बेबाक बोल।

नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी, फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली का इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र। यहां चल रहे महोत्सव में कुछ खास तरह के लोग बैठे थे जिनके पूरे शरीर पर राम नाम का गोदना गुदा था। गाल, नाक से लेकर कान तक पर राम और सिर्फ राम। यह छत्तीसगढ़ का एक समुदाय था। इस समुदाय के बारे में अक्सर बातें होती रही हैं। एक बार और सही। एक सदी पहले इन्होंने ऐसा आंदोलन छेड़ा कि शरीर को ही मंदिर बना डाला। कथित छोटी जाति के होने के कारण इन्हें मंदिर में प्रवेश की इजाजत नहीं थी। इस अपमान के कारण इन्होंने मंदिर में कभी प्रवेश नहीं किया पर राम नाम गुदवा कर अपने पूरे शरीर को ही मंदिर बना डाला। समुदाय के एक सदस्य से राम मंदिर विवाद पर सवाल कर ही डाला। एक का जवाब था कि जिन राजा राम ने ‘रघुकुल रीत सदा चली आई, प्राण जाई पर वचन न जाई’ की तर्ज पर बस पिता की कसम की मर्यादा रखने के लिए राजपाट छोड़ डाला क्या उन्हें इस बात की चिंता होगी कि उनका मंदिर बनेगा या कहां बनेगा।

तुरुप के पत्तों और मास्टरी चाल की होड़ में ‘रामबाण’ चलाते हुए सुप्रीम कोर्ट में सरकार की अर्जी पहुंच गई। अयोध्या के लिए चलाए गए इस ‘रामबाण’ का क्या असर होगा? क्या यह चुनावी मैदान में कूदने जा रही सरकार का ब्रह्मास्त्र था। तो इस ब्रह्मास्त्र के असर को परखने के लिए कुंभ की प्रयोगशाला से बेहतर कौन सी जगह हो सकती है। पिछले चुनावों में अमेठी में मारे गए तंज ‘हू इज शी’ वाली डुबकी ले चुकी हैं और ट्वीट भी हो चुकी हैं। वो कौन बोलने वालीं के नए सियासी अवतार के साथ डुबकी लेने के दावे किए जा रहे हैं। बुआ से गठबंधन के बाद बबुआ भी अपनी डुबकी का पोज मीडिया को दे चुके हैं। इन सबके जवाब में सूबे के मुखिया सहित पूरा मंत्रिमंडल डुबकी लगा आया और कुंभ में पहली कैबिनेट बैठक का तमगा भी लहराया। इसके साथ ही जवाहरलाल नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी तक के कुंभ में आस्था जगाने की तस्वीरें सोशल मीडिया पर तैरने लगीं। इसी कुंभ में सरकार की अर्जी को लेकर कोई हंगामा नहीं बरपा।

कुंभ की नगरी में किसी ने इसे मजबूरी का नाम गैर विवादित मंदिर बताया तो किसी ने कहा कि यह तो मंदिर का कांग्रेसी फार्मूला है, हम इस मंदिर का क्या करेंगे। एक का कहना था कि मंदिर सोने की अट्टालिकाओं और वादों के कंगूरों का नहीं, आस्था के गर्भगृह का चाहिए था। तंबू में विराजे रामलला को गर्भगृह में पहुंचाना था। साधु-संतों को यह आस्था के गुबंद का विध्वंस सरीखा ही लगा। संसद में कानून क्यों नहीं, जैसे सवाल के आगे ‘रामबाण’ को एक भी मरीज ऐसा नहीं दिखा जिसके मर्ज का इलाज उसके पास हो।

जहां कुंभ में इस ‘कांग्रेसी मंदिर’ को खारिज किया जा रहा है तो अयोध्या में निर्मोही अखाड़ा भी इसमें मंदिर को लेकर मोह नहीं राजनीति ही देख रहा है। अब जब सरकार का कार्यकाल खत्म होने को है और सहायक शाखाएं पूछ रही हैं कि मंदिर का क्या हुआ और मातृ संस्था भी इस मामले में कड़ाई से रिपोर्ट कार्ड तलब कर रही है तो सुप्रीम कोर्ट की शरण सिर्फ राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश भर ही दिखाई दे रही है।

भाजपा और कांग्रेस के एक-दूसरे की मास्टरी चाल के बाद जब हम साथ-साथ हैं, दिखने लगते हैं तो कांग्रेसी मंत्री दावा ठोक बैठते हैं कि ताला हमने खुलवाया तो मंदिर हम ही बनवाएंगे। भाजपा के घोषणापत्र में कहीं दुबका हुआ मंदिर वाला वादा कांग्रेसी वादों की फेहरिस्त में शामिल हो बैठता है। कांग्रेस की भी रणनीति है कि इस मंदिर गाथा में उसे खलनायक नहीं बनना है। उनके प्रवक्ता याचिका और अर्जी के बीच का भेद बताकर भाजपा की इस पूरी कवायद को फर्जी बता रहे हैं।

2019 के चुनावी मैदान में प्रियंका गांधी को औपचारिक सियासत का चोला पहना और कांग्रेस दफ्तर की आधिकारिक मुहर लगा कांग्रेस ने अपना तरकश तो अगले दस से पंद्रह सालों के लिए खाली कर ही दिया। अब भाजपा ने अपनी सुप्रीम अर्जी से अरज कर दी कि इस बार इतना ही, बाकी आगे देखेंगे। अब तक जो विवाद चुनावी प्रचार का मुख्य अध्याय था उसे गैर विवादित के रूप में बस क्षेपक बना डाला है। जिसपर पहले ही ठप्पा गैर विवाद का लगा दिया उसका चुनावी मैदान में क्या काम। इसका सीधा संदेश है कि इस कार्यकाल में तंबू वाले रामलला के मंदिर का आख्यान नहीं रचा जाएगा।

नब्बे के दशक में दीवारों पर ‘जिस हिंदू का खून न खौले, खून नहीं वो पानी है’ लिखने वाले उत्साही जवान आज प्रौढ़ावस्था को पार कर घट-घट में राम वाली बुजुर्गियत में पहुंच चुके हैं। पत्थरों को तराशने वाले, खंभे तैयार करने वाले कई हाथ अब इस दुनिया में नहीं हैं। वह दानपात्र अब भी मौजूद है और अयोध्या जंक्शन पर उतरने वाले श्रद्धालु अब भी उसमें अपनी आस्था का दान कर रहे हैं। सरयू के तट पर श्रीराम की विशालकाय मूर्ति लगाने का वादा है। अयोध्या को लोकप्रिय पर्यटन स्थल बनाने की कवायद शुरू हो चुकी है। सब कुछ आगे बढ़ा लेकिन लोग अब यह भी पूछ रहे हैं कि कहीं यह वादा पीछे की ओर तो नहीं लौट रहा कि मंदिर वहीं बनाएंगे।

मुश्किल यह है कि ‘रामबाण’ का वैसा हंगामा भी नहीं बरपा। लोग ज्यादा पूछ भी नहीं रहे हैं। क्योंकि मंदिर आस्था का ही सवाल है। शहरों से लेकर कस्बों तक में र्इंट-गारों से आधुनिक शैली में बनाए मंदिर पर ‘प्राचीन’ लिखा मिल जाना आम बात है। जिन लोगों ने आधुनिक मंदिरों की बुनियाद डलते देखी है वे भी कंगूरे के पास लिखा ‘प्राचीन’ देख आंखें मूंद लेते हैं। यही ‘प्राचीन’ है जो आस्था भी तैयार करती है। उस आम जनता के लिए यह प्राचीन की आस्था अहम है जो राहुल गांधी के ताजे वादे ‘सबको न्यूनतम आय’ का मतलब ही नहीं समझ पाई है। वह पूछ रही है कि आपका यह वादा दादी के वादे ‘गरीबी हटाओ’ से किस तरह अलग है। सत्तर सालों तक गरीबी नहीं हटी तो अपने अभाव को आस्था के भाव से ही तो पीछे धकेला। अब यह ‘गरीबी हटाओ’ सबको न्यूनतम आय वाले नए वादे के साथ ले आया गया है। कम जनसंख्या वाले यूरोपीय देशों में लागू हो सकने वाली इस व्यवस्था का वादा अगर किया जा रहा है तो क्या बुराई है।

अगर आपकी सरकार आई और इस गरीबी हटाओ की बुनियादी राह ही बनाने में कामयाब हो पाई तब तक के लिए भी आस्था के सिवा और क्या सहारा है। आस्था तो उस गर्भगृह में थी जहां से प्राचीन होने का अहसास है। भारत जैसे देश में आस्था के रंग निर्गुणी धारा में भी बह जाते हैं। मक्का में थके-हारे गुुरु नानक सो गए। उन्हें इस तरह सोते देख कुछ लोगों ने पूछा कि तू कौन काफिर है जो अल्लाह के घर की तरफ पैर कर सो रहा। नानक ने कहा कि मेरा पैर उस तरफ कर दो जिधर अल्लाह का घर न हो। नानक का पैर घुमाने वाले को पता चला कि जिधर वह पैर करता उधर ही काबा दिखता। गुरु नानक की यही आस्था मन चंगा तो कठौती में गंगा वाले भाव के साथ बह रही है। कुंभ के बिना भी स्नान है और मंदिर गए बिना भी पूजा है। बाकी जो बचा, वह राजनीति है।
2019 के चुनावी बाजार में मंदिर से लेकर इंदिरा गांधी द्वितीय तक का वार चल दिया गया है। बाकी जन तो देख ही रहा है कि उसके लिए कोई धन आएगा कि नहीं। अब तो ‘राम रतन धन पायो’ की आस्था भी उदास हो चुकी है।

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