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बेबाक बोल: ऐसे कैसे चलेगा!

2019 के बाद फिर से विधानसभा चुनाव हैं और इस बार सेमीफाइनल तो छोड़िए कांग्रेस की हालत देख उसे क्वालिफाइंग के लायक भी नहीं माना जा रहा है।

Author Updated: September 14, 2019 4:55 AM
Express Photo

2014 के आम चुनावों के बाद सबसे ज्यादा बहस विकल्प पर हुई थी। खासकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से उम्मीद की गई थी कि वह अपने सामंती ढांचे से निकल खुद को फिर से खड़ा करेगी। लेकिन कांग्रेस में महापरिवर्तन की उम्मीदों की बयार तभी थम सी गई जब लोकसभा चुनावों में राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद एक कदम पीछे जाकर उनकी माता को पार्टी की कमान सौंपी गई। हरियाणा जैसे राज्य में जब भाजपा के नेता अबकी बार पचहत्तर पार का नारा लगा रहे थे तो हुड्डा की हुंकार आई कि मैं नहीं तो पार्टी नहीं और उनके सामने समर्पण करते हुए गुलाम नबी आजाद कहते हैं कि आपकी सेवानिवृत्ति के बाद आपके पुत्र का समय आएगा। भाजपा की नई राजनीति की परिभाषा लिखने के दौर में कांग्रेस अपने सामंती मलबे के ढेर से उठना ही नहीं चाहती है। विकल्प से लेकर विकल्पहीनता तक पहुंची इस बहस पर बेबाक बोल।

पहले युवाओं को तरजीह देने, सब कुछ बदल देने की बात करते हैं फिर अशोक गहलोत, कमलनाथ और भूपेंद्र सिंह हुड्डा के आगे समर्पण कर देते हैं। जब राहुल गांधी को कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाना था तो युवा-युवा की राष्ट्रीय धुन बजाई गई थी, मानो देश में सब कुछ युवाओं को सौंप दिया जाएगा। वहीं जब राज्यसभा में सदस्य भेजने की बात आई तो उन्हीं मनमोहन सिंह को चुना गया जिनकी उदारवादी आर्थिक नीतियों को लेकर जनता अनुदार हो गई। जिन आर्थिक नीतियों के खिलाफ राहुल गांधी लोकसभा चुनाव के मैदान में गरज रहे थे उसी के अगुआ को उस समय कांग्रेस का प्रतिनिधि बनाया गया जब भारतीय जनता पार्टी ने भारतीय राजनीति की परिभाषा बदल डाली है। लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद राहुल गांधी ने अपने परिवार के इतर कांग्रेस अध्यक्ष ढूंढ़ने की शर्त लगा पद छोड़ दिया। लेकिन लंबी कवायद के बाद एक कदम पीछे जाकर पुत्र की जगह माता को पार्टी की कमान दे दी गई। तो ऐसे कैसे चलेगा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस!

विरोधाभासों पर व्यंग्य कसने के लिए सोशल मीडिया पर ‘ऐसे कैसे चलेगा’ का जो संक्रमण फैला था, उसे अगर कांग्रेस पर लागू किया जाए तो व्यंग्य की कड़ियां खत्म होने का नाम ही नहीं लेंगी। इसी स्तंभ में एक बार हमने लिखा था कि कांग्रेस उन सभी राजनीतिक टिप्पणीकारों को शर्मिंदा होने पर मजबूर कर देती है जो कांग्रेस के फिर से जी उठने की उम्मीदें जगाते हैं। जो कहते हैं कि भारतीय लोकतंत्र के लिए देश की 134 साल पुरानी कांग्रेस पार्टी का उठ खड़ा होना जरूरी है। 2019 के लोकसभा चुनावों के बाद जिन राज्यों में अहम चुनाव हैं वहां कांग्रेस नेतृत्व की कमजोरी देख यकीन हो गया है कि सामंती मलबे के ढेर पर खड़ी यह पार्टी नई बुनियाद रखना ही नहीं चाह रही है।

2019 के चुनावों के पहले भी हिंदी प्रदेश के तीन राज्यों के चुनाव को सेमीफाइनल माना गया था। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को उम्मीद की तरह देखा गया था कि इन राज्यों में जीत के बाद पार्टी भाजपा के सामने कड़ी चुनौती पेश करेगी। लेकिन इन राज्यों में जीत के बाद कांग्रेस गहलोत और कमलनाथ के सामंती चेहरों से आगे बढ़ ही नहीं पाई। राजस्थान में चुनाव जीतने में पार्टी ने जितनी मेहनत नहीं की थी उससे ज्यादा मेहनत वहां के मुख्यमंत्री को चुनने में लगी और उसके बाद एक बगल गहलोत, एक बगल पायलट और बीच में राहुल वाली कांग्रेस की जो सवारी निकली उसे देख कर ही लग गया था कि पार्टी ने कोई सबक नहीं सीखा है। जिस मध्य प्रदेश में जनांदोलनों की वजह से भाजपा सत्ता से बेदखल हुई थी वहां कमलनाथ जैसे दिल्ली से पैराशूट से उतरे हुए हुए चेहरे को चुना गया। राहुल गांधी ने बेबसी में बताया कि मुख्यमंत्री अपने बेटों को जिताने में लगे रहे और बुजुर्ग मुख्यमंत्री कानों में रुई डाल कर कहते रहे कि राहुल तुम अध्यक्ष बने रहो, हम तुम्हारे साथ हैं।

2019 के बाद फिर से विधानसभा चुनाव हैं और इस बार सेमीफाइनल तो छोड़िए कांग्रेस की हालत देख उसे क्वालिफाइंग के लायक भी नहीं माना जा रहा है। जिस हरियाणा में विपक्ष को पूरी तरह से सरकार के खिलाफ हल्ला बोल करना था वहां कांग्रेसियों ने एक-दूसरे की जड़ें खोदने का कीर्तिमान कायम कर लिया। नब्बे विधानसभा सीटों वाले राज्य में भाजपा कह रही है, अबकी बार पचहत्तर पार। यह नारा लगाते वक्त भाजपा ने कुछ नरमी बरती थी कि कम से कम पंद्रह सीटें तो विपक्ष को जीतनी ही चाहिए। लेकिन भाजपा को क्या पता था कि विपक्ष कहेगा कि अबकी बार 72 पार, सीट को लेकर नहीं भूपेंद्र सिंह हुड्डा की अगुआई को लेकर।

हरियाणा के रोहतक में हुड्डा की रैली ने पूरे देश को संदेश दिया कि यह कांग्रेस नेतृत्व पर दबाव बनाने के लिए है और नेतृत्व ने बुजुर्ग नेता की सभी शर्त मान कर संदेश दे दिया कि देश की सबसे पुरानी पार्टी नया कुछ सीखने को तैयार नहीं है। अशोक तंवर को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाने की उनकी मांग के साथ ही हुड्डा को मुख्यमंत्री पद के चेहरे के तौर पर भी पेश कर दिया गया।

रोहतक रैली में हुड्डा ने अनुच्छेद 370 पर केंद्र सरकार का पक्ष लेते हुए कहा, ‘अब कांग्रेस पहले जैसी नहीं रही’। लेकिन इस रैली के बाद पार्टी जिस तरह से उनके सामने दंडवत हुई उसे देख कर तो यही लगता है कि कांग्रेस बिल्कुल पहले जैसी है। सोनिया गांधी की कमान में हुड्डा का तुष्टीकरण कर उनके संदेशवाहक गुलाम नबी आजाद ने चंडीगढ़ में कहा, ‘अगली बार मैं और भूपेंद्र सिंह हुड्डा संभवत: राजनीति से रिटायर हो जाएंगे। अगला समय दीपेंद्र हुड्डा और कुमारी सैलजा का होगा…।’ वंशवाद पर इतनी लानत-मलानत के बाद भी गुलाम नबी आजाद हुड्डा के वंशज से आगे नहीं बढ़ पाए। अगली बार यानी पांच साल बाद या ताजा चुनावों में ही कांग्रेस पार्टी की क्या हालत होगी यह सोचा होता तो आजाद साहब अभी से ही हुड्डा के पुत्र की ताजपोशी नहीं कर बैठते।

हरियाणा में हुड्डा के दबाव में कांग्रेस ‘परिवर्तन रैली’ निकाल चुकी तो महाराष्ट्र में उर्मिला मातोंडकर और कृपाशंकर सिंह ने इस्तीफा देकर बता दिया कि किस तरह से कांग्रेस नेताओं की पूरी फौज की भाजपा या अन्य पार्टियों में जाने की महारैली निकली है। झारखंड और पश्चिम बंगाल में पार्टी सांगठिक स्तर पर चरमराई हुई है। दिल्ली में इतने घमासान के बाद भी शीला दीक्षित का विकल्प नहीं खोजा जा सका है।

हम राजनीतिक टिप्पणीकार पिछले पांच सालों से लगातार लिखते आ रहे हैं कि कांग्रेस का मुकाबला भाजपा से है। लेकिन लोकसभा चुनावों के बाद यह साबित हो गया कि फिलहाल कांग्रेस का मुकाबला खुद से ही है। पिछले चुनावों में 52 सीटों पर सिमटी पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी कह रहे थे कि मुख्यमंत्री अपने बेटों की जीत तय करने में जुटे रहे, प्रियंका गांधी ने सरेआम आरोप लगाया कि रफाल से लेकर अन्य मुद्दों पर मेरा भाई अकेले लड़ता रहा, सबने उसे अकेला छोड़ दिया था। इस बार तो चुनावों के पहले ही दिख गया कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता खुद और अपनी संतानों के सिवाय कुछ सोच ही नहीं सकते हैं। जिस पार्टी के युवा अध्यक्ष ने हार की जिम्मेदारी लेते हुए पद छोड़ दिया उस पार्टी के वरिष्ठ नेता संभावित पद के लिए पार्टी को छोड़ने और तोड़ने के लिए तैयार बैठे हैं। इस समय हम प्रियंका गांधी की पीड़ा महसूस कर सकते हैं कि लोकसभा चुनाव में राहुल कितने अकेले थे।

आज हम हरियाणा के संदर्भ में देखें तो भाजपा ने विकल्पहीनता की स्थिति पैदा कर दी है। जाट आधारित राजनीति से शुरू कर वंश की धुरी पर घूमने वाले कांग्रेस सहित अन्य राजनीतिक दलों का जनता से पूरी तरह संपर्क टूट चुका है। एक खानदान जेल में, दूसरा खानदान आधे इधर, आधे उधर, बाकी मेरे साथ वाली स्थिति में तो एक खानदान जनता नहीं पार्टी को ही अपनी शक्ति दिखा रहा है। हरियाणा के मैदान से कांग्रेस ने राजनीतिक चिंतकों को संदेश दिया है कि आगामी चुनावों में विकल्प नहीं विकल्पहीनता पर बात होगी।

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