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बेबाक बोल: बदलना हो तो…(पाठ 11)

जब देश की अर्थव्यवस्था बहुत चमकती सी नहीं है, बेरोजगारी के आंकड़े बेचैन कर रहे हैं, सीमाई खतरे बढ़े हुए हैं उस समय भी हमें चुनावों पर साढ़े तीन खरब रुपए से ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है। क्या इस खर्च को एक फीसद भी कम करने की कोशिश की गई?

Author Updated: March 16, 2019 4:41 AM
चुनाव आचार संहिता लागू होते ही कई तरह के अंकुश उम्मीदवारों, राजनीतिक दल और सरकार पर लग जाते हैं. (फोटो सोर्स: एक्सप्रेस आर्काइव)

पांच साल बाद जब अगले पांच साल के लिए चुनावी प्रक्रिया का एलान सात चरणों में हुआ तो बरबस रॉबर्ट फ्रास्ट की वो पंक्तियां याद आती हैं जिनमें वे अपनी राह चुनने के फैसले को याद करते हैं। कवि के मुताबिक, जंगल में उन्हें दो रास्ते दिखे थे और आगे बढ़ने के लिए उन्होंने कम चला गया रास्ता चुना था। लंबी उम्र बीतने पर कवि अपने आज में उसी निर्णय का नतीजा देखते हैं। एक शायर भी कुछ ऐसा ही भाव प्रकट कर गए थे कि उम्र-ए-दराज मांग कर लाए थे चार दिन/दो आरजू में कट गए, दो इंतजार में। तो क्या संस्थागत ढांचे में जरा सा सुधार को देखने के लिए हमारी औसत उम्र कम पड़ने लगी है?

विकास, सुधार, डिजिटलीकरण के नारों के बीच सात चरणों में ढाई महीने में पसरा चुनाव। खास कर उस समय जब राष्ट्र अपनी सीमाई सुरक्षा को लेकर सतर्क है। अभी-अभी हमारे 40 जवानों ने शहादत दी और उसके बाद भी शहीदों की चिताओं पर आंखें नम होने का सिलसिला जारी है। हर तरफ जहां युद्ध-युद्ध और बदला-बदला की आवाज गूंज रही थी, वहां हमारा नेता कैसा हो, फलां के जैसा हो के जयकारे लगने लगे। चुनावी पोस्टर पर नेताजी के साथ विंग कमांडर अभिनंदन छा गए। आखिर देश का एक सैनिक चुनावी पोस्टर ब्यॉय कैसे बन सकता है। ऐसा हुआ और इस पर चुनाव आयोग ने आपत्ति भी उठाई। लेकिन आपत्ति उठाने में इतनी देर कैसे हो गई। अभिनंदन के नाम पर देशद्रोही और देशप्रेमी का प्रमाणपत्र बांटने वालों को इतना लंबा वक्त क्यों दिया गया। इसके लिए आचार संहिता लागू होने का इंतजार क्यों?

इस बार बहुत से लोग कह रहे हैं कि पांच साल कैसे बीत गए पता ही नहीं चला। पूरे पांच साल देश में यहां चुनाव तो वहां सरकार बनाने का समीकरण चलता रहा। हालिया समय में चुनाव सुधारों पर जितनी बहस हुई उससे एक उम्मीद जगी थी कि इस बार हम थोड़ा बेहतर होंगे। लेकिन तमिलनाडु से लेकर बिहार तक के चुनावी चरणों की बड़ी खाई बता रही है कि प्रशासनिक स्तर पर देश को एक तार से जोड़ने में हम कितने पीछे हैं। बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों को इतना लंबा इंतजार क्यों करना चाहिए यह समझ से परे है। तर्क तैयार है कि तमिलनाडु और बिहार की भौगोलिक स्थिति में अंतर है। लेकिन तकनीक के सहारे हम इस अंतर को भी नहीं पाट पाए तो क्या तकनीक सिर्फ भद्दे चुटकुलों को अग्रेषित करने भर के लिए है?

पिछले पांच सालों का सबसे बड़ा फैसला नोटबंदी थी। देश के आम नागरिकों ने इसे खुशी-खुशी झेला क्योंकि इसके दो बड़े तर्क दिए गए थे कालाधन और डिजिटलीकरण। मध्यमवर्ग ने इस कालेधन को अपना दुश्मन मान इसे भ्रष्टाचार की धुरी घोषित किया था। इसलिए जब कालेधन के खात्मे की बात आई तो देश की जनता नोटबंदी के कष्टों को झेलने के लिए सहर्ष तैयार हो गई। खैर, सरकारी पक्ष ही बाद में कहने लगा कि नोटबंदी का मुख्य उद्देश्य कालाधन नहीं था। और, आज जब इतनी लंबी चुनाव प्रक्रिया हमारे सामने है तो सवाल है कि इसका कालेधन पर क्या असर होगा।

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि लंबी चुनाव प्रक्रिया का फायदा धनबली और बाहुबली उठाते हैं। फिर कालेधन को अपना साम्राज्य स्थापित करने के लिए इतना लंबा मैदान क्यों दिया गया। चुनाव सुधारों में सबसे अहम है धनबल पर रोक। लेकिन अब साफ दिख रहा है कि संस्थागत सुधार लाने में हम बहुत पीछे हैं। जब चुनावी प्रक्रिया के समय ही कालेधन पर काबू पाने की कोशिश नहीं की जाएगी तो फिर हम आगे क्या उम्मीद कर सकते हैं। अगर चुनावों में धनबल का प्रयोग होगा तो उसका असर चुनाव के बाद की प्रशासनिक व्यवस्था पर पड़ेगा ही और पड़ता रहा है। इस बार इसके खिलाफ जो कड़े कदम उठने की उम्मीद थी, वह भी अगली बार के लिए मुल्तवी कर दी गई।

चुनावी तारीखों के एलान के साथ ही आयोग आचार संहिता का एलान करता है। लेकिन ऐन तारीखों के पहले कोई नियम-कानून लागू करवाने की पहल नहीं हुई। अमुक तारीख को इतने बजे तारीखों का एलान होना है तो आयोग के प्रेस कॉन्फ्रेंस के पहले दनादन राजनीतिक दलों की प्रेस कॉन्फ्रेंस शुरू हो जाती हैं कि हमने इस परियोजना की बुनियाद रख दी तो हमने अपने राज्य में इस वर्ग को इतना फीसद आरक्षण प्रदान कर दिया। क्या इन दलों से यह हिसाब मांगा जाता है कि इससे पहले आप क्या कर रहे थे। पांच साल के आखिरी दिनों में ही आधे-अधूरे निर्माणों के लाल फीते क्यों कटने लगते हैं। इसका असल मकसद है बुनियाद या उद्घाटन के पत्थरों पर अपना नाम खुदवाना। क्या इसका कोई हिसाब होगा कि अंतिम समय में आप किस तरह की परियोजनाओं की बुनियाद रख सकते हैं।

आजादी के बाद से ही सारी जनकल्याणकारी परियोजनाओं से लेकर हर फैसले को सत्ता पक्ष द्वारा हड़पने की हड़बड़ी देखी जाती रही है। राजकाज चलाने के लिए जनता राजनीतिक दल के जनप्रतिनिधि को भेजती है। लेकिन सत्ता में जाने के बाद ये प्रतिनिधि कहते हैं कि जनता के लिए हमने ये किया। आपका काम ही यही करना था। चाहे कांग्रेस हो या भाजपा या अन्य राजनीतिक दल कोई भी जनता के मंच को हड़पने में पीछे नहीं है। यह जनता की, जनता जनता के लिए और जनता के द्वारा बनाई सरकार है। फिर इन चीजों में नेताओं का निजी नायकत्व क्यों हावी हो जाता है। जनता के कर का पैसा जनता पर खर्च कर उसका तमगा अपनी राजनीतिक वर्दी पर क्यों चिपका लिया जाता है, क्या चुनाव आयोग ने कभी मुखर होकर यह सवाल पूछा है। अवाम सत्तर साल बाद भी यह जानना चाहता है कि उसे मामूली राहत देने वाली कोई योजना राजनीतिक दलों के लिए महाफायदे का सबब कैसे बन जाती है।

जब देश की अर्थव्यवस्था बहुत चमकती सी नहीं है, बेरोजगारी के आंकड़े बेचैन कर रहे हैं, सीमाई खतरे बढ़े हुए हैं उस समय भी हमें चुनावों पर साढ़े तीन खरब रुपए से ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है। क्या इस खर्च को एक फीसद भी कम करने की कोशिश की गई? इन सारे सवालों पर आगे बात होने की उम्मीद रखें, या यह मान लें कि चुनाव आयोग भी सवालों से नफरत करता है। अगले पांच साल की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। चुनावी सुधारों का ‘स’ भी नहीं खोज पाने के बाद लग रहा है कि रॉबर्ट फ्रास्ट की तरह कम चली गई सड़क को चुनने का जोखिम कौन उठाएगा भला। लेकिन अब तक का चुनावी पाठ यही बताता है कि उम्मीद की किरण भी यहीं से निकलनी है। ऐसे जोखिम भरे समय में भी वो खास और आम चेहरे दिखेंगे जो अपनी अलग राह चुनने के लिए जाने जाएंगे, चाहे वह कोई खास नेता हो, आम आदमी या पत्रकार। यह हम सब पर निर्भर है कि इस परीक्षा के समय में हम अपनी कौन सी भूमिका चुनते हैं। राज, समाज और संस्थाओं को मजबूत करने वाले चेहरे पहचाने जाएंगे और अपने पाठ का इतिहास भी बनाएंगे।

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