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बेबाक बोल: दर्द-ए-दिल्ली

मतदातागण कृपया ध्यान दें, आप 2019 में हैं। लेकिन हम बात की शुरुआत गालिब की जुबानी कर हैं। याद करें 2014 का वह समय जब सत्ता का विकल्प देने की बात होने लगी थी। उत्तर-दक्षिण, पूरब-पश्चिम बस चुनाव ही चुनाव था।

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बाजीचा-ए-अतफाल है दुनिया मेरे आगे
होता है शब-ओ-रोज तमाशा मेरे आगे

मिर्जा गालिब की बेगम कह रही थीं कि दिल्लीवाले उन्हें दिल्ली में मकबूल नहीं होने देंगे और उन्हें आगरे लौट जाना चाहिए। जवाब में गालिब कहते हैं, हिंदू-मुसलमान और शिया व सुन्नी का झगड़ा कम था क्या जो ये आगरा, लखनऊ और दिल्ली की दीवारें खड़ी कर दीं। सोच-समझ के संकीर्ण दायरे को लेकर वे कहते हैं कि ये दुनिया उन्हें बहुत छोटी लगती है। उन्हें यह दुनिया छोटे बच्चों के खेल का मैदान लगती है। दिल्ली के हाल पर गालिब की आह शेर बनकर निकल रही थी। मिर्जा गालिब ही कह गए थे, आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक…। आज सदियां बीतने के बाद 2019 में दिल्ली के सियासी हाल पर आह ही निकल सकती है।

मतदातागण कृपया ध्यान दें, आप 2019 में हैं। लेकिन हम बात की शुरुआत गालिब की जुबानी कर हैं। याद करें 2014 का वह समय जब सत्ता का विकल्प देने की बात होने लगी थी। उत्तर-दक्षिण, पूरब-पश्चिम बस चुनाव ही चुनाव था। इन पांच सालों में भारत में राजनीतिक तापमान जितना ऊंचा रहा वह अलहदा ही था। विकल्प देने के लिए सब एकजुट होने की बात कर रहे थे। लेकिन जब बात दिल्ली की आई तो लगा ही नहीं कि देश की राजधानी का मैदान इतना छोटा होगा कि राजनीति बच्चों का खेल लगने लगे।

दिल्ली का मतलब क्या है? क्या सिर्फ सात संसदीय सीट? इन सात सीटों से हार-जीत के तो मानक तय नहीं होने थे। लेकिन दिल्ली वह है जिसने आगरा की मंडी को बेदखल कर अपना बाजार बनाया। दिल्ली प्रतीक है हुकूमत की। दिल्ली झंडाबरदार है हिंदुस्तान की। लेकिन दिल्ली को लेकर इतनी दिल्लगी क्यों?
दिल्ली के पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष अजय माकन एक मंच पर कहकर जाते हैं कि अगर आम आदमी पार्टी और कांग्रेस में गठबंधन नहीं होगा तो सातों सीट भाजपा की झोली में जाएंगी। उनकी यह चेतावनी गंभीर थी। वे दिल्ली के दिग्गजों में हैं। उनकी इस चेतावनी के बाद और उसके पहले भी गठबंधन के नाम पर चूहे-बिल्ली या आधुनिक शब्दों में कहें कि टॉम एंड जेरी वाला लुका-छिपी का खेल चलता रहा। आज कांग्रेस का नेता कोई बयान देता तो दूसरे दिन आम आदमी पार्टी का नेता उसके खिलाफ। तीसरे दिन दोनों एक-दूसरे की बातों पर कहते कि ऐसा हो सकता है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी गठबंधन पर ट्वीट करते हैं तो ट्वीट बम गिराते रहने वाले मुख्यमंत्री महोदय कहते हैं कि ये बातें क्या ट्वीट से कही जाती हैं।

गठबंधन के नाटक के चरम पर पहुंचने के बाद दोनों दलों ने सातों सीटों पर अपने-अपने उम्मीदवार खड़े कर दिए हैं। सबसे मजेदार है अजय माकन का खुद चुनाव के मैदान में उतरना जो गठबंधन के बिना सातों सीट भाजपा को दे रहे थे। उन्हें टिकट मिल गया तो फिर किस बात का विरोध और किस बात का बंधन। तो इन 14 उम्मीदवारों को मैदान में देख कर दिल्ली का बच्चा भी समझ जाएगा कि इन्हें देश की कितनी फिक्र है। सातों सीट पर काबिज सत्ता पक्ष के सांसद ने टिकट के लिए ट्विटर पर जो खेल खेला उससे तो कोई भी असमंजस में पड़ जाए।

आम तौर पर बच्चों के लिए सबसे मुश्किल सवाल होता है कि तुम्हें ज्यादा प्यार मम्मी करती हैं या पापा। बच्चा अब क्या जवाब दे। हर बच्चे के अलग-अलग समीकरण होते हैं। कहीं मम्मी टॉफी दिलाती हैं तो कहीं पापा। तो बच्चा भी कभी मम्मी तो कभी पापा की ओर अंगुली कर देता है। बच्चे की बार-बार पसंद बदलने पर मम्मी-पापा के साथ बच्चा भी खिलखिला कर हंसता है। भाजपा के सांसद उदित राज भी किसी बच्चे की तरह कभी अपने नाम के साथ चौकीदार हटाकर डॉक्टर बन जाते तो फिर चौकीदारी की कमान संभाल लेते। लेकिन जितनी जल्दी से उन्होंने कांग्रेस का हाथ थामा वंचित तबकों के लिए आवाज उठाने के नाम पर वह दिल्ली की राजनीति के प्रहसन में नया अध्याय लिख गया।

दिल्ली में तीनों दलों में से किसी को भी खुद पर भरोसा नहीं था, इसलिए एक-दूसरे के उम्मीदवारों के पत्ते खुलने के बाद ही कुछ करना चाहते थे। इसके बाद भी दिल्ली के मैदान में कुछ उम्मीदवार जो लोकप्रियता की सीढ़ी से उतारे गए उनका यहां की जनता क्या करे। इतनी देर से उम्मीदवारी के एलान का हासिल-ए-दिल्ली क्या था। भाजपा ने पूर्वी दिल्ली से क्रिकेट खिलाड़ी गौतम गंभीर को तो कांग्रेस ने दक्षिणी दिल्ली से उतारा मुक्केबाज विजेंदर सिंह को।
दिल्ली के दंगल में दोनों दलों को वो चेहरे क्यों उतारने पड़े जो पहले से लोकप्रिय हैं। हां भई, उसने बहुत रन बनाया, हां भई उसने घूंसा चलाया और पदक कमाया। हंसराज हंस की गायकी तो सूफियाना कही जा रही है। लेकिन दिल्ली की जनता पूछ रही है कि राजनीति के मैदान में इनका क्या काम है ये तो पहले से ही नामदार हैं, वो कहां गए जो काम नहीं करने के लिए बदनाम हैं। जनता काम ढूंढती रह जाएगी और वे नाम लेकर आ जाएंगे।

लोकतंत्र एक व्यापक अवधारणा है जिसका सबसे लोकप्रिय कथन है-जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा। कई विद्वानों ने बिना शिक्षा, अधिकार और सतर्क नागरिक के इस ढांचे पर ही सवाल उठाए हैं। आजादी के बाद आज 2019 का चुनाव देख कर लग रहा है कि अभी हम लोकतंत्र की बुनियाद पर ही टिके हैं। मतलब कि पांच साल में एक बार चुनाव हो गया और हमारा लोकतंत्र बच गया। लेकिन पांच साल के बाद जो चुनाव का ढांचा तैयार कर दिया जा रहा है उसमें जनता कहां है। वह क्या वोट डालकर और आज के समय में स्याही वाली अंगुली की सेल्फी लेकर संतुष्ट हो जाए?

पिछले कुछ समय से चुनावों का जो अराजनीतिकरण कर उसे एक के निज बनाम दूसरे का निज बनाया जा रहा है, वह भारत के लोकतंत्र को और पीछे की तरफ धकेल रहा है। कुछ बयान उछालो और पत्रकार से लेकर बुद्धिजीवी तक को उसके पीछे हांक डालो। चुनाव एक सार्वजनिक अवधारणा है लेकिन नेता उसे निजत्व तक लाने में कामयाब हो रहे हैं। लोकतंत्र में सर्वजन को खत्म कर एक जन को लाने की ही परिपाटी है कि नेताओं को पछाड़ कर अभिनेता कामयाब हो जाते हैं।

कल तक विकल्प का राग अलापने वाले आम आदमी पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक और वर्तमान में ‘स्वराज इंडिया’ के अगुआ योगेंद्र यादव आज लोगों से नोटा को चुनने की वकालत कर रहे हैं। क्या लोकतंत्र नोटा से मजबूत हो सकता है? पांच साल तक विकल्प का सामूहिक गान गाने के बाद आज आमने-सामने 14 लोग खड़े हैं और वे विकल्प में नोटा को ला रहे हैं। पिछले पांच साल से एक खास तरह का नारा देने वालों ने दिल्ली में जो चुनावी पाठ तैयार किया है, वह 2014-2019 का उपसंहार है। राजनीति के इतिहास में दर्ज होगा कि लोकतंत्र में लोक को भूल निजी हितों का उत्सव बना दिया गया। क्या हम आज यह सोच कर दुखी हो लें कि कल हमारे बच्चे सत्रहवीं लोकसभा का कैसा पाठ पढ़ेंगे।

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