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बेबाक बोल: 2019 : पाठ छह

2014 का छवि बोध बनाया गया था कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का नतीजा है केंद्रीय सत्ता से यूपीए-2 की बेदखली। यह बेदखली इतनी बुरी थी कि संसद में कांग्रेस विपक्षी दल का दर्जा पाने लायक भी नहीं रही थी। आज पांच साल पूरे होते वक्त प्रियंका गांधी वाड्रा कांग्रेस महासचिव का पदभार ग्रहण करने के पहले अपने लाव-लश्कर के साथ भ्रष्टाचार के आरोपी पति को प्रवर्तन निदेशालय के दफ्तर छोड़ती हैं। वहीं मां, माटी और मानुष का नारा देने वालीं ममता बनर्जी को सारदा घोटाले के पीड़ितों से ज्यादा रॉबर्ट वाड्रा को इंसाफ दिलाने की चिंता होती है। भ्रष्टाचार के आरोपों पर पीड़ा के पत्ते खेल रही कांग्रेस की प्रवक्ता बेधड़क बोलती हैं कि सत्ता में आए तो तीन तलाक को अवैध बनाया गया कानून बदल दिया जाएगा। दिल्ली से लेकर कोलकाता तक लोकतंत्र और संविधान की परिभाषा बदल दी जाती है। वे लोग भी कोलकाता पुलिस अधिकारी से पूछताछ की अदालती इजाजत को नैतिक जीत बता रहे हैं जिनके पाले में सारदा घोटाले के आरोपी हैं। दोनों पक्षों के बदले पाठ पर बेबाक बोल।

ईडी दफ्तर के बाहर गाड़ी में प्रियंका गांधी और उनके पति रॉबर्ट वाड्रा। (फोटो-ANI)

दिल्ली से आई प्रियंका गांधी की आवाज-मैं अपने पति के साथ खड़ी हूं…। कोलकाता से आई ममता बनर्जी की आवाज-हम रॉबर्ट वाड्रा के साथ खड़े हैं। दिल्ली से भाजपा के केंद्रीय मंत्री की आवाज-यह नैतिक जीत है। बिहार से निकली सीमांचल एक्सप्रेस पलट जाती है, छह लोग मर जाते हैं। लेकिन हमारे सारे नेता सिर्फ दिल्ली से लेकर कोलकाता तक की गतिविधियों पर बोल रहे थे। कोई नेता इस बात पर गुस्सा नहीं हो रहा था कि आखिर इन लोगों के मरने की जिम्मेदारी किसकी है। हम अभी तक सुरक्षित रेल यात्रा क्यों नहीं दे पा रहे हैं। इसके पहले दशहरे का मेला देखते लोग ट्रेन के नीचे कट गए। अभी तक की जांच के अनुसार मरने वाले हादसे के कसूरवार हैं। सारदा चिट फंड के पीड़ितों की आपबीती एक बार फिर से मीडिया के सामने है। किसी की जीवन भर की पूंजी डूबने से वह सड़क पर आ गया था तो किसी ने फांसी लगा ली थी। कोई औरत बेवा हुई थी तो किसी बच्चे के सिर से पिता का साया उठ गया था। प्रियंका गांधी और ममता बनर्जी की करिश्माई छवि के महागान के बाद 2019 के चुनावी मैदान में यह पारदर्शिता का नया पाठ है। अगर प्रियंका गांधी वाड्रा से कोई आर्थिक अपराध के आरोपों के बारे में बात करता है तो उनका जवाब होता है, ‘पूरी दुनिया को पता है कि क्या हो रहा है’। जब आप चुनाव के मैदान में हैं, जब आपकी छवि जीवन से बड़ी बना दी गई है तो आप अपने पति के लिए आकर खड़ी हो जाती हैं। जिन्हें इंदिरा गांधी द्वितीय कहा जा रहा है, अब वे सिर्फ एक पत्नी हो जाती हैं।

कांग्रेस महासचिव की आधिकारिक मुहर लगने के बाद स्वदेश की धरती पर पांव रखते ही, आधिकारिक रूप से 24 अकबर रोड पर पदभार ग्रहण करने के पहले आपने एक पत्नी के रूप में ही दिखना क्यों चुना? वो एसपीजी सुरक्षा जिसे देखकर मीडिया से लेकर आम लोग तक मुग्ध हो जाते हैं, और जिसकी वजह से इंसान क्या, कोई परिंदा भी आपकी इजाजत के बिना आपके पास पर नहीं मार सकता वो आपके लिए है, न कि आपके पति के लिए। आरोप यह है कि चुनाव नजदीक देख केंद्र सरकार सारदा से लेकर वाड्रा तक की फाइल खुलवा रही है। लेकिन फाइल तभी खुली है जब आरोप है। और, कहीं इन्हीं आरोपों से डरकर तो आपको ऐन चुनाव के पहले नए अवतार में चुनावी मैदान में उतारा तो नहीं गया? वाड्रा की छवि चुनावी समर में उतरी पत्नी के पति के रूप में ही दिखाई जा रही है। वही आरोप कि प्रियंका को परेशान करने के लिए वाड्रा से पूछताछ हो रही है।

इंदिरा गांधी द्वितीय को राजनीतिक पद मिलते ही भ्रष्टाचार के आरोपी पति के बचाव में आना पड़ा। वे चाहतीं तो प्रवर्तन निदेशालय के दफ्तर से दूरी बरत सकती थीं। लेकिन यहां उल्टा था। पूछताछ की जगह के बाहर इस छवि को बहुत सोच-समझ कर भुनाया गया। आपको मीडिया के कैमरों के सामने क्या बोलना था यह तय था। लाव-लश्कर के साथ पूछताछ के लिए गए आरोपी के बारे में नहीं उनकी पत्नी के बारे में बात हो रही थी। अपने पति के साथ खड़ा होना बहुत आसान है लेकिन संवैधानिक संस्थाओं का सम्मान करते हुए निजता को छोड़ सार्वजनिकता के लिए खड़ा होना बहुत मुश्किल। अफसोस कि प्रियंका गांधी वाड्रा ने आसान रास्ता चुना।

वहीं दिल्ली से दूर माकपा के खिलाफ मां, माटी और मानुष का नारा देने वालीं ममता बनर्जी को एक बार भी सारदा घोटाले के पीड़ितों की याद आई थी कि नहीं, कह नहीं सकते। लेकिन ‘स्ट्रगल्स आॅफ एग्जिसटेंस’ नाम से आत्मकथा लिखने वालीं, अच्छी चित्रकार और मां दुर्गा को पूजने वालीं आरोपियों के साथ खड़ी थीं। संविधान तो खैर हर दलों के लिए राजनीतिक लफ्फाजी बन चुका है। दावा किया गया कि वे संविधान की रक्षा के लिए धरना दे रही हैं। उनके धरने के बगल में वो पुलिस अधिकारी बैठे थे जिनकी जिम्मेदारी संविधान की रक्षा करना है। लेकिन उनको बचाने के लिए मुख्यमंत्री धरना दे रही थीं और खुद को बचाने के लिए वे भी धरने पर थे। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस कमिश्नर की दलीलों पर कहा-आप बहुत सोचते हैं। इसके साथ ही उन्हें सीबीआइ के शिलांग के दफ्तर में पूछताछ के लिए हाजिर होने का निर्देश दिया।

2014 के बाद 2019 के लिए तैयार मैदान में यह टकराव का खेल सुपरहिट बन पड़ा है। लेकिन इस टकराव का सबसे ज्यादा नुकसान देश के संघीय ढांचे को हो रहा है। अपने तात्कालिक स्वार्थ के लिए आप टकराव का रास्ता मोल लेकर उसे लोकतंत्र और संविधान को समर्पित कर देते हैं। अदालत में ऐसी बातों के लिए जाते हैं कि टिप्पणी आती है-आप सोचते बहुत हैं। दिल्ली में रात के बारह बजे और कोलकाता में छुट्टी के दिन सरकारी अधिकारी के काम करने का विमर्श बदल कैसे जाता है। एक जगह वह असंवैधानिक है तो दूसरी तरफ संविधान।

सवाल तो उस पक्ष से भी हो रहा कि आपके पास कौन सा वॉशिंग पाउडर है कि मुकुल रॉय, हेमंत बिश्वे या बाबुल सुप्रियो से पूछताछ नहीं हो रही है। आपके पास मुकुल रॉय और नैतिक जीत दोनों एक साथ कैसे हो सकते हैं। जब वो तृणमूल कांग्रेस का दामन छोड़ कमल के साथ खिलने को तैयार थे तो आपको उनके दाग अच्छे क्यों लगे। आपने दाग की सफाई होने का इंतजार क्यों नहीं किया। मुकुल रॉय को अपने पाले में लाते हुए क्या आपको कभी सारदा घोटाले के पीड़ितों की याद आई थी।

सांप्रदायिक दुर्भाव से लेकर देशभक्ति का दोहन और सांस्थानिक संस्थाओं के इस्तेमाल की होड़ में कोई पीछे नहीं। दिल्ली से कोलकाता तक संविधान और नैतिकता दोनों बदल जा रहे हैं। वही मां है वही माटी लेकिन सारदा पीड़ित का मानुष न तो दिल्ली के दिल में है और न कोलकाता के कोलाहल में। इस बार पाठ तो अण्णा हजारे के लिए भी बदला है। 2014 के पहले वो कांग्रेस के भ्रष्टाचार पर बरस रहे थे तो जनता सहित अन्य विपक्षी दल उन पर प्यार बरसा रहे थे। अब नजारा बदला हुआ है। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से बेदखल हुई कांग्रेस का नया आधिकारिक चेहरा दफ्तर की कुर्सी संभालने से पहले अपने पति को पूछताछ की कुर्सी पर बिठा कर आता हैै, 24 अकबर रोड पर उनके नाम की पट्टी के साथ लोग सेल्फी ले रहे हैं। नैतिकता और संविधान बचाने वालों को लोकपाल नहीं चाहिए। घर में टीवी देख रहा बच्चा आकर पूछता है-पापा, पापा, सीबीआइ और पुलिस क्या एक-दूसरे को अरेस्ट करते हैं। पिता बच्चे का बदला सामान्य ज्ञान देख रहा है। इन सबके बीच अपना अनशन तोड़ चुके अण्णा रालेगण सिद्धि से प्रियंका गांधी वाड्रा का ‘जोश’ देख रहे हैं। मैं इसके साथ, मैं उसके की राजनीतिक जुमलेबाजी के बीच नैतिकता और लोकतंत्र का आहत स्वर है-यह 2019 है।

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