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बेबाक बोल: मुश्किल दौर

प्रशांत कनौजिया का मामला हमारी संस्थाओं की अम्लीय जांच की तरह है। यह हर संस्था की दरारें दिखा रही है। खास राजनीतिक पक्षधरता रखने के लिए सही समझ और संवेदनशीलता भी होनी चाहिए जिसका पत्रकारों के बीच भी घोर अभाव है।

प्रशांत कनौजिया का मामला हमारी संस्थाओं की अम्लीय जांच की तरह है।

इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू एक मार्गदर्शक कुत्ते के रूप में नेत्रहीन डोनाल्ड ट्रंप को रास्ता दिखा रहे हैं। यह वह कार्टून था जिसके ‘न्यूयार्क टाइम्स’ के वैश्विक संस्करण में छपने के बाद हंगामा मच गया। पुर्तगाली कार्टूनिस्ट अंतोनियो मोरेरा अंतूनेज के बनाए इस कार्टून में सबसे ज्यादा आपत्ति इस बात पर जताई गई कि नेतन्याहू के रूपक के रूप में जिस कुत्ते को चित्रित किया गया उसके गले के पट्टे पर ‘ब्लू स्टार ऑफ डेविड’ लटक रहा है जो इजरायली झंडे को दर्शाता है। वहीं ट्रंप ने परंपरागत यहूदी धार्मिक टोपी पहन रखी है। इस कार्टून के जरिए यहूदी अस्मिता को अपमानित करने के लिए ‘न्यूयार्क टाइम्स’ को कठघरे में खड़ा किया गया।

इस राजनीतिक कार्टून की चौतरफा निंदा के बाद ‘न्यूयार्क टाइम्स’ ने एलान किया कि वह अपने वैश्विक संस्करण में कोई राजनीतिक कार्टून नहीं प्रकाशित करेगा। ‘न्यूयार्क टाइम्स’ के इस फैसले को आलोचक अपने-अपने नजरिए से देख रहे हैं। कुछ लोग इसे गैरजरूरी आडंबर भरा फैसला बता रहे तो कुछ विद्वानों का कहना है कि पहचान की राजनीति के इस युग में सच की अपनी-अपनी परतें हैं। वजह चाहे जो भी हो लेकिन इस फैसले को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अभिव्यक्ति की आजादी की हत्या के रूप में देखा जा रहा है और अमेरिकी मीडिया को ‘शार्ली एब्दो’ के संघर्ष की भी याद दिलाई जा रही है, जब उन्होंने कत्लेआम के बाद भी अपने रुख को नहीं बदला था और पूरी दुनिया में ‘हम भी शार्ली एब्दो’ का नारा गूंज गया था।

‘शार्ली एब्दो’ से लेकर ‘न्यूयार्क टाइम्स’ तक का यह सफर बता रहा है कि अभिव्यक्ति के क्षेत्र में हम वैश्विक स्तर पर अतिवाद से टकरा रहे हैं। भारत में एक पत्रकार के ट्वीट पर उसे गिरफ्तार किया जाना और सुप्रीम कोर्ट का मामले में यह कहना कि अभिव्यक्ति की आजादी के साथ किसी तरह का समझौता नहीं किया जा सकता है एक पूरी विडंबना को हमारे सामने रखता है। दिल्ली में रह रहा पत्रकार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पर आपत्तिजनक टिप्पणी करता है। उत्तर प्रदेश की पुलिस मामले का स्वत: संज्ञान लेती है और बिना दिल्ली पुलिस के दखल के पत्रकार को गिरफ्तार कर लखनऊ ले जाती है और जमानत पर रिहाई सुप्रीम कोर्ट के जरिए होती है।

प्रशांत कनौजिया जब जमानत पर रिहा होते हैं तभी खबर आती है कि रेलवे स्टेशन पर खबर करने गए पत्रकार को पुलिस ने बेरहमी से पीटा। इसके पहले भी हाल में उत्तर प्रदेश से लेकर बंगाल, कर्नाटक और केरल तक कई ऐसे मामले आए हैं जिनमें पत्रकारों को किसी खास राजनेता की मानहानि के आरोप में उठा लिया गया या प्रताड़ित किया किया गया। इन सबमें एक चीज जो चिंतनीय है, वह है सत्ता के पक्ष को लेकर पुलिस या अन्य संस्थाओं की अति सक्रियता।

आज देश के हर कोने में और अलग-अलग विचारधारा की सरकारों में पुलिस और पत्रकार आमने-सामने हैं। दोनों अति सक्रिय हैं, दोनों पर अपनी हदों से बाहर जाने के आरोप हैं। पुलिस सक्रियता बनाम अभिव्यक्ति की सक्रियता को किस तरह से देखा जाए। पुलिस और पत्रकारिता नाम की इन दो संस्थाओं के बीच अदालत और सरकार भी है। सबसे अहम यह है कि हमारा लोकतंत्र इन्हीं संस्थाओं के खंभों पर चलता है और इन्हीं के बीच भयानक टकराव है।

इन सबके बीच सोशल मीडिया एक आभासी संस्था के रूप में आकर खड़ा हो गया है। इस नए मंच को सबसे ज्यादा लोकतांत्रिक मानकर इसे बहुत उम्मीदों से देखा जा रहा था। लेकिन इस पर ही सबसे ज्यादा असामाजिक, अलोकतांत्रिक और गैरजिम्मेदार होने के आरोप लगे। बिना तथ्य जांचे सबसे पहले पोस्ट करने की हड़बड़ी, तंज और कमर से नीचे वार करने वाली भाषा का इस्तेमाल करने वाले सूरमाओं की वजह से इसका नकारात्मक पक्ष ज्यादा हावी होने लगा। पत्रकार, पुलिस और सरकार के बीच में सोशल मीडिया की एक पोस्ट पर जंग लड़ना ‘लोकतंत्र बचाने’ के लिए भारी पड़ने लगा है।

पुलिस, पत्रकार और सरकार के बीच ऐसे सोशल मीडिया की सक्रियता को कैसे संतुलित करें। सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसका कोई लिखित संविधान और जिम्मेदारी नहीं है। ऐसे में हमें यह समझना होगा कि हर चीज संविधान में नहीं खोजी जा सकती। नैतिकता, जिम्मेदारी और सहिष्णुता वे सांस्कृतिक मूल्य हैं जिनके लिए संविधान की किताब खोलने की जरूरत नहीं है। एक-दूसरे पर आधारित संस्थाओं को समझना होगा कि कि बिना नैतिकता और जिम्मेदारी के न तो लोकतंत्र जिंदा रह सकता है और न ही संविधान सुरक्षित रह सकता है।

सवाल यह भी है कि सोशल मीडिया की अति सक्रियता के इस समय में नैतिकता और सहिष्णुता को कैसे देखें? अगर आप खास राजनीतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक पूर्वग्रहों के कारण किसी भी तथ्य को बिना जांचे, उस पर मंथन किए बिना सोशल मीडिया पर डाल देते हैं, तो मान लीजिए कि यह अनैतिक और असहिष्णु है। वह इसलिए कि ऐसी किसी पोस्ट पर अति सक्रियता हो सकती है और उसके नतीजे के रूप में पुलिस और अन्य संस्थाएं आमने-सामने होती हैं। कानून के दायरे में न आने के बावजूद पुलिस अपनी सक्रियता दिखाती है, पत्रकार और नागरिक समाज संगठनों की ऊर्जा खर्च होती है, सरकार असहज होती है। और, इतना हंगामा इसलिए कि कुछ ऐसा लिखा गया जिस पर कार्रवाई करने के लिए कहीं कुछ स्पष्ट नहीं लिखा गया है। लिखित बनाम अलिखित की जंग में खास तरह की पक्षधरता को लेकर हम कट्टर होते जा रहे हैं।

प्रशांत कनौजिया का मामला हमारी संस्थाओं की अम्लीय जांच की तरह है। यह हर संस्था की दरारें दिखा रही है। खास राजनीतिक पक्षधरता रखने के लिए सही समझ और संवेदनशीलता भी होनी चाहिए जिसका पत्रकारों के बीच भी घोर अभाव है। मीम, फोटोशॉप की भरमार सही-गलत का भेद खत्म कर चुके हैं। पुलिस को भी समझ होनी चाहिए कि मानहानि का मामला उसके स्वत: संज्ञान की चीज नहीं है, यह व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है कि उसकी मान की कितनी हानि हुई है और इसके लिए वह क्या कदम उठाए। पुलिस को ऐसे मामलों पर अपनी ऊर्जा खर्च करने के बजाए अलीगढ़ जैसे मामलों पर अपनी जिम्मेदारी दिखानी चाहिए। बच्ची के पिता जब उसकी गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखाने जाते हैं तो पुलिस तब तक सोई पड़ी रहती है जब तक कि उसकी सड़ी हुई लाश पूरे समाज को जलाने न लगे। अबोध बच्ची की नृशंस हत्या पर भी हम साथ मिलकर रोने और लड़ने के बजाए खांचों में बंट कर इंसानियत को शर्मसार करने लगते हैं।

पक्ष हो या विपक्ष, पुलिस, पत्रकार या नागरिक समाज। अगर सब अपने पक्षों को लेकर इतने आक्रामक हो जाएंगे तो लोकतंत्र बचेगा कैसे। जो सत्ता में बैठे हैं वो भी इतनी टकराहटों को कैसे संभाल पाएंगे। अब वह वक्त आ गया है जब सारी संस्थाएं मिल कर सोचें कि पूरे समाज में यह आक्रामकता क्यों बढ़ रही है। सब एक-दूसरे के खिलाफ क्यों खड़े हो रहे हैं। हिंदुस्तान जैसे सामूहिकता में जीने वाले देश में सब लोग अकेला क्यों महसूस कर रहे हैं और इसका समाधान क्या है।

देश में एक-दूसरे से टकराती संस्थाओं का समाधान उसी जनता के सामने है जिसने ताजा चुनावों में एक राष्टÑीय नेता और एक राष्ट्रीय पार्टी को चुना। यह वही जनता है जो नोटबंदी जैसे कड़े फैसलों के वक्त राष्टÑीय चेतना के साथ सरकार की ढाल बनकर रही। आज सत्ता की जिम्मेदारी है कि वह संस्थाओं से लेकर नागरिकों को सामूहिकता में लाए, इन्हें एक-दूसरे के खिलाफ खड़े होने से बचाए। देश की जनता साथ चलना जानती है, बस नैतिकता और जिम्मेदारी जैसी बुनियादी बातों की बहाली हो जाए।

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