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बेबाक बोल: हौसले का हासिल

दुनिया भर के वैज्ञानिक और पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा के अभियान से उत्साहित हैं। आइपीसीसी की पिछली विशेष रिपोर्ट के लेखकों में से एक वुल्फेंग क्रैमर लिखते हैं कि काश हमारे पास भी तुम्हारे जैसी साफ अभिव्यक्ति होती।

Author Published on: September 28, 2019 5:45 AM
ग्रेटा थनबर्ग

तेजी से बढ़ रहे जलवायु संकट पर एक बच्ची से दुनिया परेशान हो उठी कि इसे इतनी जल्दी क्या है? आठ साल से पर्यावरण को लेकर सचेत लड़की आज सोलहवें साल में दुनिया भर के राष्ट्राध्यक्षों से कहती है कि आपकी हिम्मत कैसे हुई, आप पर हमारी नजर है। ग्रेटा वही बात कह रही है जो पिछले तीस सालों से पर्यावरणविद कह रहे हैं और जो शीशे की तरह साफ है कि कम उपभोग के बिना धरती का बचना मुश्किल है। लेकिन इन सबके बीच वह भारत को भी कार्बन उत्सर्जन कम करने का काम सौंप देती है जिसकी इसमें बहुत छोटी भूमिका है। धरती पर आज पर्यावरण उन्हीं देशों की बदौलत बचा हुआ है जिन्हें अर्थशास्त्र की भाषा में विकासशील और अविकसित देश कहते हैं। आज जब ग्रेटा की नाव यात्रा की तुलना गांधी के हिंद स्वराज से हो रही है तो हमें भूगोल, राजनीति और अर्थशास्त्र के विरोधाभासों को समझने की जरूरत है। ग्रेटा के जरिए छिड़ी बहस पर बेबाक बोल।

कुछ समय पहले पेरिस जलवायु सम्मेलन की प्रतिक्रिया में आॅस्ट्रेलिया के प्रमुख अखबार ‘द ऑस्ट्रेलियन’ ने एक कार्टून छापा था। इसमें दिखाया गया था कि एक गरीब भारतीय परिवार सौर ऊर्जा संयंत्र को तोड़ कर खा रहा है। एक आदमी को आम की चटनी के साथ सोलर पैनल को खाते दिखाया गया। यह कार्टून उन लोगों की मानसिकता की उपज थी जिन्हें शायद यह जानकारी नहीं कि कार्बन उत्सर्जन में भारत जैसे विकासशील देशों की कितनी छोटी भूमिका है। आज अगर फूल और तितलियां बचे हुए हैं तो इसलिए कि दुनिया में गरीबी और कम उपभोग करने वाले भारत जैसे देश अब भी हैं। इस देश की सांस्कृतिक बुनियाद कम उपभोग की वकालत करती है। यहां के शास्त्रों में उपभोग की सेवानिवृत्ति यानी वानप्रस्थ की अवधारणा है। यहां के घरों में भिक्षा के आधार पर जीवनयापन करने वालों के लिए खाना बनता है। इन दिनों मशहूर फैशन पत्रिका वोग (भारत) की पूर्व संपादक बंदना तिवारी की मुहिम चर्चा पर है जो गांधी के विचारों के तहत ‘फैशन डाइटिंग’ की बात कर रही हैं।

गांधी के हिंद स्वराज और खादी के जरिए रोजगार का ऐसा ढांचा तैयार करने की बात कर रही हैं जिसमें कम कपड़ों और कम उपभोग में बुनकरों तक अधिक मेहनताना पहुंचे। पिछले दिनों एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें ग्रेटा थुनबर्ग भारत को कम कार्बन उत्सर्जन का काम सौंप रही हैं। पर्यावरणविदों से लेकर सबने इसकी बहुत सराहना की। सोलह साल की किशोरी ग्रेटा के जरिए पर्यावरण पर जो बहस छिड़ी है और इस पर जिस तरह से दो खेमे तैयार हो गए हैं उसी से पता चलता है कि जलवायु संकट पर एक आम समझ बनाने की तो अभी बुनियाद भी नहीं रखी गई है। एक तरफ तो लोग ग्रेटा के हाव-भाव और उसके किसी और का हथियार बन जाने की एक सिरे से आलोचना कर रहे हैं तो दूसरी तरफ वे लोग हैं जो इसलिए इस परिघटना को ऐतिहासिक करार दे रहे हैं कि उसने दुनिया के शक्तिशाली देशों के राष्ट्राध्यक्षों को कार्बन उत्सर्जन कम करने का काम सौंपा है। एक तरफ उस संवेदनशील बच्ची को खास व्यवहारगत बीमारियों का शिकार बनाकर पेश किया जा रहा है तो दूसरी तरफ पूरी दुनिया को एक ही डंडे से हांकने का अतिरेक भी किया जा रहा है।

पहले भारत और उसके बाद जब अमेरिका में ऐतिहासिक तरीके से सरकारें बदलीं तो दोनों देशों में परिवर्तन के पीछे एक समान कारण था, घटता रोजगार। अपने उन्हीं मतदाताओं को ध्यान में रखते हुए डोनाल्ड ट्रम्प बिना लाग-लपेट के कहते हैं कि उनके लिए सबसे बड़ी चिंता वैश्विक मंदी है और इससे निकलने का एकमात्र रास्ता रोजगार सृजन ही है। जहां रोजगार के मसले पर दुनिया भर में सत्ता बदल रही है वहीं एक संकट यह भी है कि ज्यादा नौकरियों का मतलब है पर्यावरण को ज्यादा से ज्यादा नुकसान। भारत में मनरेगा एक ऐसी योजना है जिसे भाजपा ने कांग्रेस का स्मारक बताते हुए भी उसे आगे बढ़ाया। आखिर क्या मजबूरी थी मनरेगा को आगे बढ़ाने की। मनरेगा पर आरोप लग रहे थे कि तालाबों के किनारे पक्के करने जैसे कामों के कारण पर्यावरण को नुकसान ही पहुंच रहा है। लेकिन यह योजना उन लोगों के लिए वरदान साबित हो रही थी जिनके लिए गांवों में रोजी-रोटी का कोई साधन नहीं बचता। इसने बेरोजगार लोगों को न्यूनतम काम मिलने की गारंटी दी और कांग्रेस के सिर से सत्ता का मुकुट उतारने के बाद भाजपा सरकार मनरेगा जैसी योजना का रत्न उससे निकाल नहीं पाई। कहने का मतलब है कि जो लोग इस धरती पर भूख जैसी जरूरतों को लेकर आ गए हैं उनके पेट भरने का इंतजाम व्यवस्था को करना ही होगा।

राष्टÑाध्यक्षों को अब यह अंदाजा हो गया है कि अब तक जो जनता उनसे रोजी-रोटी की मांग करती थी उनकी नई पीढ़ी साफ हवा, पानी, तितली, फूलों और पक्षियों की मांग कर रही है। ग्रेटा थुनबर्ग जब भारत से कार्बन उत्सर्जन कम करने की मांग करती हैं तो यहां यह भी तथ्य है कि भारत का प्रति सालाना कार्बन उत्सर्जन लगभग 1.6 मीट्रिक टन है। भारत दुनिया के सबसे कम कार्बन उत्सर्जक देशों में से एक है। भारत की सवा अरब जनसंख्या से ज्यादा उत्सर्जन स्वीडन जैसा छोटा देश करता है जिसकी ग्रेटा नागरिक हैं। अगर पर्यावरण को बचाने की बात करनी है तो उस पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ बोलना होगा जिसके शीर्ष पर आज स्वीडन जैसा देश खड़ा है मतलब भारत से बहुत कम जनसंख्या होने के बावजूद अधिकतम उपभोग। ग्रेटा का हवाई यात्रा का बहिष्कार, छोटी सी नाव में साहसी समुद्री यात्रा का प्रतीकात्मक महत्व है, और दुनिया बदलने के लिए इन प्रतीकों की जरूरत पड़ती रही है। गांधी का हिंद स्वराज आज ग्रेटा की छोटी सी नौका के साथ मिल जाता है।

दुनिया भर के वैज्ञानिक और पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा के अभियान से उत्साहित हैं। आइपीसीसी की पिछली विशेष रिपोर्ट के लेखकों में से एक वुल्फेंग क्रैमर लिखते हैं कि काश हमारे पास भी तुम्हारे जैसी साफ अभिव्यक्ति होती। जिस ग्रेटा की ‘स्कूल स्ट्राइक’ के लिए आलोचना हो रही थी उसी बच्ची का भाषण आज दुनिया भर के स्कूलों में प्रोजेक्टर पर दिखाया जा रहा है। दुनिया भर के प्रयोगधर्मी शिक्षक अपने विद्यार्थियों को ग्रेटा का लिखा पढ़ने को दे रहे हैं। एक ही काम पर केंद्रित होने के जुनून को वैज्ञानिक एसपर्जर बीमारी का नाम देते हैं, लेकिन इसी जुनून ने उसे इस धरती की योद्धा बना दिया।

ग्रेटा आज वही कह रही जो दशकों से वैज्ञानिक और सामाजिक कार्यकर्ता कहते आ रहे हैं। यहां कुछ नया है तो वह है जूनून और उसके काम करने का तरीका। वह आराम से लो (टेक इट ईजी) वाले भाव के खिलाफ है। उसकी बेचैनी और गुस्से को समझा जा सकता है। उसका गुस्सा हमें चेतावनी दे रहा है कि अब आराम से बैठने का वक्त नहीं है। हमें संकट को संकट की तरह ही देखना होगा और फौरी कदम उठाने होंगे। अनुभव से बड़ा कोई अध्ययन नहीं होता है। एक बच्ची ने महसूस किया कि उसके हिस्से की तितलियां और साफ हवा छीन ली गई हैं और धरती पर बाद में आने वाले बच्चों के लिए यह भी नहीं बचेगा। हमने ग्रेटा का बचपन और स्कूल छीन कर उसे आंदोलनकारी बना दिया।

इतिहास गवाह है कि अपने सपनों के लिए स्कूल छोड़ने वाले लोग बाद में खुद ही एक बड़ी संस्था बन जाते हैं। लेकिन उस सुनियोजित तंत्र के खिलाफ भी आंखें मूंदी नहीं जा सकती हैं जो मलाला यूसुफजई जैसी व्यवस्था से लड़ने वाली बच्ची को एक दूसरी व्यवस्था का प्रतीक बना देता है। मुश्किल यह है कि कोई ग्रेटा के दूसरों का हथियार बनने पर सवाल उठा रहा है तो दूसरा पक्ष उसे शांति का नोबेल देने की मांग कर रहा है। इन बहसों के बीच जलवायु संकट जैसा क्लिष्ट विषय फूल, पत्तियों और तितलियों के रूमान तक ही सीमित हो गया है। ग्रेटा से उठा तूफान कहीं भावुकता की बाढ़ और नोबेल दिलाओ मुहिम तक सीमित न हो जाए। ग्रेटा के हौसले का हासिल यह है कि आज दुनिया भर में लोग धरती को बचाने के लिए सड़क पर उतर रहे हैं। बच्चे शुक्रवार को स्कूल से अवकाश ले धरती बचाने की मांग कर रहे हैं। पर्यावरण पर बहस को तेज बनाने और संक्रमणकाल की पहचान कराने के लिए ग्रेटा थुनबर्ग को सलाम।

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