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बेबाक बोल: श्याम संस्कृति

गणेश चतुर्थी पर सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा था अभिनेता सलमान खान का वीडियो। इसमें न तो वो चुलबुल पांडे वाला कोई संवाद बोल रहे थे और न कोई खास शैली का नृत्य था और न ही कोई विवादास्पद बयान।

Author Published on: September 7, 2019 5:57 AM
गणेश चतुर्थी पर अभिनेता सलमान खान

भारतीयता या भारतीय संस्कृति की परिभाषा को लेकर जब हम जूझ रहे होते हैं तभी तृणमूल कांग्रेस की सांसद नुसरत जहां अपने समुदाय के कट्टरपंथियों की परवाह नहीं करते हुए जगन्नाथ रथ यात्रा की अगुआई करती हैं तो अभिनेता सलमान खान गणपति उत्सव में आरती करते और थिरकते नजर आते हैं। नुसरत और सलमान हिंदुस्तान की वो झांकी दिखाते हैं जो हर तरह की कट्टरता को नकारती है। भारत में हर समुदाय में सबसे लोकप्रिय कृष्ण हैं। कृष्ण का श्याम रंग उत्तर से दक्षिण और आर्य से लेकर द्रविड़ तक की संस्कृति का मिश्रण है। वैदिक संस्कृति ने उत्तर से लेकर दक्षिण और पूरब से लेकर पश्चिम तक के भारत को एक सांस्कृतिक सूत्र में जोड़ा था। भारतीय संस्कृति ने हर दुराग्रही शुद्धतावादियों को अलग-थलग होने पर मजबूर कर दिया। श्याम रंग सी साझी संस्कृतियों वाली भारतीयता पर बेबाक बोल।

सुनो हिंदू मुसलमानो कि फैज-ए-इश्क से ‘हातिम’
हुआ आजाद कैद-ए-मजहब-ओ-मशरब से अब फारिग

गणेश चतुर्थी पर सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा था अभिनेता सलमान खान का वीडियो। इसमें न तो वो चुलबुल पांडे वाला कोई संवाद बोल रहे थे और न कोई खास शैली का नृत्य था और न ही कोई विवादास्पद बयान। वीडियो शुरू होता है सलमान की गणपति की आरती से और खत्म होता है गणपति उत्सव में उनके नृत्य के साथ। हिंदुओं के त्योहार के दिन यह वीडियो वायरल क्यों होता है? शायद इसलिए कि इसमें सलमान बहुत सहज लग रहे हैं, लग रहा है कि गणपित उत्सव भी उनकी जीवनशैली का हिस्सा है, कोई ओढ़ा हुआ आडंबर नहीं है। उन्हें आरती से लेकर नृत्य में आनंद आ रहा है। सलमान के इस आनंद की अनुभूति जब पूरा हिंदुस्तान करता है तो उसे ही गंगा-जमुनी तहजीब कहते हैं।

नफरत के बोल भरे इस दौर में सलमान का यह वीडियो मरहम की तरह काम करता है। इसलिए नहीं कि एक मुसलमान हिंदू धर्म के प्रतीकों को मान रहा है, बल्कि इसलिए कि एक हिंदुस्तानी हिंदुस्तान की झांकी दिखा रहा है। वह हिंदुस्तान जिमसें मुहर्रम का ताजिया बनाने में हिंदू घर के बच्चे दिन-रात मदद करते हैं और जन्माष्टमी के दिन मुसलिम घरों के आंगन में बच्चे कृष्ण और राधा के रूप में खेलते नजर आते हैं। वह हिंदुस्तान जहां कथा है कि रानी कर्णावती ने अपनी रक्षा के लिए हुमायूं को राखी भेजी थी। रामलीला के मंच पर रामायण के किरदारों में कोई अली और हुसैन मिल जाता है तो ईद पर हर वो हिंदू मीठा-मीठा महसूस करता है जिसका कोई सेवइयों वाला दोस्त हो। क्रिसमस पर ऐसा कौन सा घर नहीं जहां सैंटा आता है। जन्माष्टमी पर राधा-कृष्ण और क्रिसमस पर सैंटा बने बिना तो हर हिंदुस्तानी बच्चे का बचपन अधूरा है। हामिद के चिमटे की कहानी हर हिंदुस्तानी को जुबानी याद है।

हमारे सामने अक्सर भारतीयता का मुश्किल सवाल आता है। आखिर किसे कहते हैं भारतीयता? इसके जवाब में हमारे सामने वही राम और कृष्ण खड़े हो जाते हैं जो गंगा-जमुनी तहजीब की धुरी हैं। कृष्ण को लेकर संतों से लेकर सूफियों ने लोक साहित्य रचा है। लोक रचनाकारों के सबसे प्रिय कृष्ण ही हैं। इस्कॉन के भव्य मंदिरों से लेकर जंगलों में किसी कोटर में कृष्ण मिल जाएंगे। कृष्ण का रंग-रूप ही भारतीयता है। हम अपनी संस्कृति को परिभाषित करते हुए विविधता में एकता की बात करते हैं। जब हम विविधता की बात करते हैं तो शुद्धतावादी एकरूपता को नकारते हैं। शुद्धता का आग्रह किसी भी संस्कृति को रोकता और टोकता है। धर्म और संस्कृति का शुद्धतावादी रूप हमें सांप्रदायिक बनने के मोड़ पर खड़ा कर देता है। सबको अपनाने वाली संस्कृति हर उस मोड़ पर थोड़ी रुक और मुड़ जाती है जहां उसे कोई अपनाना चाहता है, उससे कुछ लेना चाहता है और कुछ देना चाहता है।

भारतीय संस्कृति में कृष्ण जैसी लोकप्रियता किसी की नहीं है। कृष्ण को समझ लीजिए तो संस्कृतियों के मिश्रण वाली भारतीय संस्कृति भी समझ आ जाएगी। जन्म देने वाली कोई और, पालने वाली कोई और। कृष्ण के रंग को श्याम रखा गया है। ज्यों-ज्यों हम उत्तर से दक्षिण की ओर जाते हैं देवता का वर्ण अश्वेत होता जाता है। कृष्ण श्याम हैं, मतलब न तो गोरे और न काले। कृष्ण का श्याम रंग उत्तर और दक्षिण को जोड़ने वाली कड़ी है। यह आर्य और अनार्यों की बहस की कट्टरता पर भी विराम लगाती है। वैदिक से द्रविड़ संस्कृति के जोड़ में भी कृष्ण हैं। हम इसी श्याम संस्कृति के वारिस हैं जो हर रंग को खुद में समा लेती है।

भारत में धर्म, राजनीति और समाज के साझे इतिहास को समझने के लिए वैदिक संस्कृति अहम है। भारतीय संस्कृति में शुरू से ही विविधता के साथ एकसूत्रता मौजूद रही है। भारत राजनीतिक इकाई के रूप में एक होने से पहले सांस्कृतिक इकाई के रूप में एक हुआ, इसका सबसे बड़ा उदाहरण वैदिक धर्म है। इसका प्रसार उत्तर से लेकर दक्षिण व पूरब से लेकर पश्चिम तक हुआ। राजनीतिक एकसूत्रता के पहले प्राचीन काल से ही सांस्कृतिक एकसूत्रता आ गई थी। भारत को राजनीतिक इकाई के रूप में तो अंग्रेजों के आने के बाद औपनिवेशिक काल में देखा गया, उसके पहले तक यह पूरा भूगोल सांस्कृतिक इकाई की पहचान ही रखता था। वैदिक धर्म ने भारत को जो सांस्कृतिक पहचान दी थी उसी की अस्मिता को विवेकानंद जगाते हैं। औपनिवेशिक काल में दयानंद सरस्वती ‘वेदों की ओर लौटो’ का आह्वान करते हैं।

महाराष्टÑ में पेशवाओं के समय से ही गणपित उत्सव को अस्मिता बोध के साथ मनाया जाता था। स्वतंत्रता आंदोलन के समय बाल गंगाधर तिलक को महसूस हो गया था कि गणपति वो प्रतीक हैं जो विभिन्न जातियों और वर्गों में बंटे लोगों को एक पंडाल के अंदर ला सकते हैं। तिलक के प्रयासों से बड़े स्तर पर गणपति महोत्सव शुरू हुआ और जल्दी ही गणपति के पंडाल उपनिवेशवाद के खिलाफ एक बड़ा मंच बनने लगे। गणपति उत्सव के दौरान इन पंडालों में कांग्रेस के बड़े नेता जुटते और जंग-ए-आजादी में सबकी सहभागिता की अपील करते।

गणपति, दुर्गा पूजा या फिर ईद। भारत जैसे विभिन्न खांचों में बंटे लोगों के लिए ये त्योहार अहम हैं जो अपने घर की चारदीवारी से निकल कर पंडालों की सामूहिकता में मनाए जाते हैं। ईद के दिन की यही रौनक होती है कि उत्सव घर के बाहर ईदगाह, मस्जिदों और सड़कों पर होता है। गणपति पंडाल के मोदक हों या ईद की सेवइयां इनकी मिठास सामाजिक विद्वेष के जख्मों पर जो मरहम लगाती हैं उसका मुकाबला कोई नहीं कर सकता है। यहां तक कि तीन दशक तक बंगाल पर शासन करने वाले वामपंथियों ने भी दुर्गा पंडाल का महत्व समझा था। बंगाल में दुर्गा पंडाल के बाहर बिकतीं क्रांतिकारी किताबों का महिषासुरमर्दिनी और दुर्गासप्तशती से कोई मेल नहीं हो सकता। लेकिन कम्युनिस्ट भी जानते थे कि बंगाल की संस्कृति से दुर्गा को नहीं हटाया जा सकता। दुर्गा पूजा भी घर से बाहर निकल पंडालों में मनाया जाने वाला उत्सव है जो लोगों को सांस्कृतिक रूप से जोड़ता है। इतिहास गवाह है कि राजनीतिक रूप से लोगों को जोड़ने के लिए संस्कृति की सड़क पर ही चौराहा बनाया गया है।

इन दिनों ईदगाह से लेकर कांवड़ यात्रा और गणपति पंडालों के लोक-तत्त्व पर जो हमला हो रहा है उसके खिलाफ नुसरत जहां से लेकर सलमान खान तक खड़े हो जाते हैं। जगन्नाथ रथ यात्रा से लेकर गणपति आरती तक ये इस बात की परवाह नहीं करते कि इन्हें अपने समुदाय के कट्टपरपंथी ही निशाना बना रहे हैं। भारत की श्याम संस्कृति इनके वजूद में इस तरह समा गई है जो हर शुद्धतावादी (यहां कट्टरपंथी भी पढ़ा जा सकता है) को अलग-थलग कर देता है। यहां जीत उस मिलावट की होती है जो ईद और दिवाली की मिठास में भेद करना भुला देता है।

आज मीराबाई के प्रेम को ‘पद्मावत’ के जौहर में झुलसा दिया जाता है। कहीं एक अतिरेक तुलसी को हिंदू बना देता है तो दूसरा अतिरेक कबीर को मुसलमान। ‘पद्मावत’ फिल्म के संदर्भ में एक आक्रमणकारी को इसलिए महान घोषित किया जाता है क्योंकि उसने दूसरे आक्रमणकारी को रोका था। ईदगाह से लेकर गणपति के पंडालों तक शांति और संस्कृति के दुश्मन पैदा हो ही जाते हैं। लेकिन गणपति पर थिरकते सलमान, मुसलिम समुदाय के रोजे खुलवाते सिखों के लंगर और ईदगाह से लौटते मौलवी को रै ताऊ तैने ईद की राम-राम कहते लोग ही मिजाज-ए-हिंदुस्तान को बनाते और बचाते हैं।

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