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बेबाक बोल: वतन का वक्त (पाठ नौ)

सीमा पार से आतंकवादी हमला करने आए कसाब को जन्नत नसीब हुई कि नहीं, यह तो पता नहीं कर सकते, लेकिन मरने के बाद उसे एक ऐसा देश नसीब नहीं हुआ जो कहे कि यह हमारा नागरिक है, कोई ऐसा झंडा नहीं था जो उसकी पार्थिव देह पर लपेटा जा सके।

विंग कमांडर अभिनंदन की तस्वीर लिए लोग फोटो सोर्स : इंडियन एक्सप्रेस

हमने पिछली बार यही कहा कि कुछ समय ऐसा होता है जब आपसे बस एक जिम्मेदार नागरिक होने की तवक्को की जाती है। आज खास की मांग वाले समय में आम होना बहुत आसान नहीं है। चाहे आप बहुत बड़े नेता, वक्ता, स्तंभकार, पत्रकार या किसी भाषा के विशेषज्ञ हों। लेकिन हर वक्त आपका नहीं होता। एक समय ऐसा आता है जब आपको उस देश के आम नागरिक की तरह व्यवहार करना होता है जिसका झंडा आपकी पहचान बनता है, जिसका नक्शा आपका मान बढ़ाता है और जिसका राष्ट्रीय गान आपका सम्मान बन जाता है। फिलहाल हमारा देश जिन हालात से गुजर रहा है उस समय आपको अपने उस नेतृत्व पर भरोसा करना होता है जिसे जनता ने लोकतांत्रिक तरीके से चुन कर तंत्र और लोक की सुरक्षा का जिम्मा सौंपा है। आज का समय सिर्फ और सिर्फ सेना के साथ होने का है। समय की मांग यही है कि देश का हर नागरिक तेरा-मेरा छोड़ एकजुट हो भारत की मजबूत दीवार बने।

पुलवामा पर आतंकवादी हमले के बाद पाक की नापाक हरकतों का करारा जवाब जरूरी था। भारतीय सेना की यही विशेषता है कि वह सत्ता विशेष की नहीं पूरे देश की है। उस पर किसी तरह का राजनीतिक दबाव नहीं है। पुलवामा पर आतंकवादी हमले के बाद भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के उस इलाके पर लक्षित हमला किया जहां जैश-ए-मोहम्मद के दहशतगर्दों ने पनाह ले रखी थी। उसके बाद भारतीय सेना का जिम्मेदाराना बयान यही था कि हमने सिर्फ आतंकी शिविरों को निशाना बनाया और कोई आम नागरिक हताहत नहीं हुआ। हमारी सेना से यही उम्मीद थी। सेना का मकसद युद्ध छेड़ना नहीं बल्कि युद्ध के कारण बन रहे आतंकगाह को खत्म करना था। भारतीय सेना बहादुरी से गई और अपने जवानों के खून का बदला लेकर आई। भारत की इस बहुत जरूरी कार्रवाई पर पूरी दुनिया उसके साथ थी।

पुलवामा के शहीद जवानों पर पूरा देश गर्व कर रहा था, उन चालीस जवानों के नाम कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक गूंज रहे थे जो पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी के हमले में शहीद हुए। लेकिन पाकिस्तान में भारत के लक्षित हमले के बाद राख हुए आतंकवादी शिविरों से कोई नाम बाहर नहीं निकल पाया। इसलिए नहीं निकल पाया कि वे न तो सेना के जवान थे और न आम नागरिक। वे पाकिस्तानी फौज और सरकार के समर्थित आतंकवादी थे। दहशतगर्दों को जब मिट्टी में मिलाया जाता है तो वे सिर्फ मिट्टी होते हैं, किसी पहचान के काबिल ही नहीं रहते। उनकी कब्र पर जन्नतनशीं होने का फातिहा नहीं पढ़ा जाता, जबकि बहुत जल्द ही बहादुरी के मेडल हमारे जांबाज अभिनंदन के सीने की शान बढ़ाएंगे। सीमा पार से आतंकवादी हमला करने आए कसाब को जन्नत नसीब हुई कि नहीं, यह तो पता नहीं कर सकते, लेकिन मरने के बाद उसे एक ऐसा देश नसीब नहीं हुआ जो कहे कि यह हमारा नागरिक है, कोई ऐसा झंडा नहीं था जो उसकी पार्थिव देह पर लपेटा जा सके।

जब अमेरिका के कमांडो पाकिस्तान के ऐबटाबाद में घुसे थे तो क्या इज्जत रह गई थी पाक हुक्मरानों की दुनिया के दायरे में। उसामा बिन लादेन को पनाह देने वाले उसकी लाश तक रखने के काबिल नहीं थे। पाकिस्तानी झंडा, पाकिस्तानी नक्शा एक दहशतगर्द को पनाह देने के लिए झुका दिया गया था। पाकिस्तान की स्कूली किताबों में ऐबटाबाद अभियान का किस तरह जिक्र किया गया होगा या जाएगा यह पता नहीं। दुख है कि उसामा बिन लादेन के सबक को पाक हुकूमत इतनी जल्दी भूल गई। पाकिस्तानी संप्रभुता को अमेरिका ने रौंद डाला क्योंकि उसे अपने नागरिकों को बताना था कि अमेरिकी संप्रभुता क्या चीज है। 9/11 हमले के बाद जो अमेरिका ने किया, पुलवामा के बाद वही भारत ने भी किया।

पुलवामा पर आतंकवादी हमले के बाद भारत सरकार को राजनीतिक कदम उठाने या राजनीतिक संप्रभुता दिखाने की जरूरत नहीं थी। यह देश की सुरक्षा का गंभीर मसला था जो हर एक नागरिक से जुड़ा था। सैन्य ताकत के जरिए ही देश का मनोबल बढ़ाया जा सकता था। भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के अंदर घुसकर आतंकवादियों पर बम गिराए। आम तौर पर पाकिस्तानी सेना ऐसे हमलों को खारिज कर देती है और उसे सरकार के सामने जवाबदेह भी नहीं होना पड़ता है। उड़ी के बाद किए गए भारत के लक्षित सैन्य हमले को उसने नहीं माना। लेकिन पाकिस्तान में बालाकोट पर भारतीय वायुसेना के हमले को पाकिस्तानी फौज और सरकार ने स्वीकार किया।

बालाकोट के पहले दो मौके ऐसे थे जब पाकिस्तानी सेना को अपनी जमीन पर नाकामी के लिए जवाबदेह होना पड़ा था। पहला मौका था 1971 के युद्ध में जब 93 हजार पाकिस्तानी सैनिकों ने समर्पण कर दिया था। दूसरी बार ऐबटाबाद का मामला हुआ जिसने पूरी दुनिया में पाकिस्तान को बेनकाब कर दिया। अमेरिकी कमांडो पाकिस्तान में घुसे और बिना कोई खरोंच लगे उसामा बिन लादेन की लाश लेकर लौट गए। पाकिस्तानी फौज को तो अमेरिकी जनसंचार के साधनों से ही पता चला कि वहां क्या हुआ था।

1971, ऐबटाबाद के बाद एक बार फिर से भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तानी फौज के अहंकार को नेस्तनाबूद किया है। भारतीय वायुसेना के जहाज 21 मिनट तक पाकिस्तानी दहशतगर्दों को ठिकाने लगाते रहे और पाक फौज को पता भी नहीं चला। यह तो अहसास था ही कि पाकिस्तानी फौज अपना वजूद बचाने के लिए फिर कुछ नापाक हरकत करेगी और उसने किया भी। दहशतगर्दों पर हमला करने के बजाए उसने भारतीय वायुसेना क्षेत्र में हमला किया। इसके साथ ही इमरान खान के प्रचार तंत्र ने परमाणु हथियारों पर बैठक वाली तस्वीरें जारी कर एटमी हमले की धमकी भी देनी चाही। पाकिस्तानी दहशतगर्द तो आजाद घूम रहे थे लेकिन भारतीय वायुसेना के एक विंग कमांडर को पाकिस्तानी फौज ने अपने कब्जे में ले लिया। आतंक के खिलाफ और मानवता के पक्ष में कदम उठाने वाली भारत सरकार ने इस बार दोहरी जीत पाई। पाकिस्तान में दहशतगर्दों के खात्मे के साथ अपने फौजी की शान से वापसी कराई।

पाठ नौ भी सरहद पार की हुकूमत और इमरान खान के लिए ही है। जनता के वोट से चुनकर फौज के इशारों पर नाचने वाले नेताओं का बुरा हश्र पाकिस्तान के समसामयिक इतिहास में दर्ज है। फौज तो महफूज रहती है लेकिन उसकी कठपुतली बना नेता या तो मार दिया जाता है या जेल की सलाखों के पीछे होता है। अयूब खान, याहया खान, भुट्टो से लेकर परवेज मुशर्रफ और नवाज शरीफ का हश्र याद करें खान साहब। आपके पूर्ववर्ती बस अयूब खान से ही सीख लेते तो आज ग्लोब पर पाकिस्तान का नक्शा आतंक के गंदे धब्बे की शक्ल नहीं अख्तियार करता। इमरान खान क्रिकेट के खिलाड़ी रहे हैं लेकिन आज तो उनके खिलाड़ियों को हम अपने खेल के मैदान पर भी बुलाना पसंद नहीं करते, क्योंकि सबको पता है कि वहां के सारे खेल और खिलाड़ी फौज ही तय करती है। इमरान खान अभी तक अपने पूर्ववर्तियों की तरह इसी गफलत में हैं कि सेना के पिच से कोई चौका और छक्का लगा लेंगे। लेकिन पाकिस्तान के पिछले पाठ बता रहे कि इस फौजी प्यादे की एक ही नियति है, क्लीन बोल्ड।

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