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बेबाक बोल: सदियों की सजा

आम तौर पर पुरुष तलाक तभी देता है जब उसे दूसरा निकाह करना होता है। महज तीन बार तलाक बोल कर वह नई दुनिया बसाने को आजाद है लेकिन औरतों के सामने इंसानियत को शर्मसार करने वाली हलाला कुप्रथा भी है।

राज्यसभा में पास हो चुका है तीन तलाक बिल। (फाइल फोटो)

औरतों को मजबूत करने के किसी भी कदम को सामंती मानसिकता मर्द और परिवार को कमजोर करने वाला करार देती है। फौरी तीन तलाक का सबसे घिनौना पक्ष यह है कि उसके बाद मर्द अगर अपनी बीवी को फिर से अपनाना भी चाहेगा तो औरत को हलाला से गुजरना होगा। सदियों तक तीन तलाक और हलाला के खौफ से गुजरने वाली औरतों के हक में भारतीय संसद ने ऐसा कानून पास किया है कि मर्दों को अब उनकी खुद्दारी पर हमला करने में खौफ होगा। नरेंद्र मोदी ने अपने पहले ही कार्यकाल में फौरी तीन तलाक के खिलाफ मजबूत इच्छाशक्ति दिखाई थी और इस बार ऐसा सदन प्रबंधन किया कि तीन तलाक के पक्ष में बोलने वाला खुद को मुसलिम महिलाओं के खिलाफ खड़ा पा रहा था। औरत का मजबूत होना किसी भी तरह से परिवार का कमजोर होना नहीं है। ‘जेंडर जस्टिस’ पर चल रहे बीच बहस में बेबाक बोल।

शाहबानो…
‘लम्हों की खता सदियों की सजा बन जाती है’, मुख्तार अब्बास नकवी ने राज्यसभा में इस पंक्ति से कांग्रेस को शाहबानो पर की गई गलती तो याद दिला दी, लेकिन फौरी तीन तलाक को आपराधिक बनाने वाले कानून के खिलाफ विपक्ष के नेता कश्मीर की ‘अधूरी विधवाओं’ का क्या, सामूहिक भीड़ की हिंसा में मारे गए लोगों की विधवाओं का क्या, इसका क्या और उसका क्या में उलझ गए। एक समुदाय की महिलाओं के हक के फैसले को दूसरे समुदाय के हक के तराजू पर तौला जाने लगा। क्या यातना और वर्जनाओं को तुला पर तुलनात्मक तौला जा सकता है? एक दर्द की पैमाइश दूसरे दर्द से की जा सकती है।

तीन तलाक की लड़ाई न तो भाजपा की है और न कांग्रेस की। इस लड़ाई की बुनियाद में हैं कमजोर तबके की मुसलिम महिलाएं। आंकड़ों की बात करें तो तीन तलाक से प्रभावित होने वालीं 75 फीसद मुसलिम महिलाएं कमजोर तबके की होती हैं। उनके दर्द को समझना हो तो गूगल की खोज इंजन पर शाहबानो लिख दीजिए। पुराने अखबारों, पत्रिकाओं में शाहबानो के संघर्ष और उस पर राज्य द्वारा की गई नाइंसाफी को समझिए। कांग्रेस की सरकार ने जिस तरह शाहबानो पर आए फैसले को पलटा था उसका संदेश यही था कि निकाह जैसी संस्था में औरत को दोयम दर्जे पर रखना है। शाहबानो के नाती फौरी तीन तलाक पर बने कानून पर कहते हैं, ‘मेरी नजर में एक अच्छी बात को गलत तरीके से पेश किया गया है। इस विधेयक में जो फौजदारी अंश जोड़ा गया है, उससे इसका उसी तरह दुरुपयोग हो सकता है, जिस तरह भारतीय दंड विधान की धारा 498-ए (दहेज प्रताड़ना) के गलत इस्तेमाल की शिकायतें हमारे सामने आती हैं।’

शाहबानो की अगली पीढ़ी सहित एक बड़ा तबका इसे फौजदारी बनाने का विरोध कर इसको दहेज कानून के दुरुपयोग के तर्क में डाल रहा है। दुनिया भर में हर कानून का बेजा इस्तेमाल होता है। लेकिन इस बेजा इस्तेमाल पर तवज्जो ज्यादातर महिलाओं के लिए बने कानून पर ही दी जाती है चाहे वह घरेलू हिंसा, दहेज उत्पीड़न या फौरी तीन तलाक पर बना नया कानून हो। भारत में दहेज की कुप्रथा सदियों से चली आ रही है और इसके खिलाफ कानून बनाया गया। दहेज कानून भी शादी के अंदर फौजदारी मामला लाता है। दहेज की मांग शादी जैसी संस्था में ही की जाती है। इसके लिए लाखों लड़कियों को जला कर मार दिए जाने की बर्बरता, अन्य तरह के उत्पीड़न को रोकने के लिए ही सख्त कानून लाया गया था। इसके दुरुपयोग के चंद मामलों की तुलना में उन लाखों स्त्रियों का क्या जो जिंदा जला दी गर्इं या अन्य तरह के उत्पीड़न से तिल-तिल कर मरने को मजबूर कर दी गर्इं। दहेज कानून से शादी जैसी संस्था कमजोर नहीं हुई, हां वे औरतें जरूर मजबूत हुई हैं जो इस कुप्रथा की आग में जलने के बजाए कानूनन लड़ना पसंद करती हैं। इसमें भी यह कुतर्क दिया जा सकता है कि पति या ससुरालवालों के जेल जाने पर औरतों और बच्चों की परवरिश कौन करेगा? औरत और बच्चों की परवरिश के नाम पर क्या औरतों को जलाने की छूट मिलती रहनी चाहिए? जो औरत कानून के जरिए लड़ सकती है वह अपनी मेहनत से कमा कर अपना और अपने बच्चों का पेट भी भर सकती है।

आम तौर पर पुरुष तलाक तभी देता है जब उसे दूसरा निकाह करना होता है। महज तीन बार तलाक बोल कर वह नई दुनिया बसाने को आजाद है लेकिन औरतों के सामने इंसानियत को शर्मसार करने वाली हलाला कुप्रथा भी है। मर्द फौरी तीन तलाक बोलने के बाद अगर बीवी के पास फिर लौटना चाहेगा तब औरत को हलाला पर हलाल होना ही होगा। सदियों तक हलाला के खौफ में जीने वाली औरतें आज मर्द को कानून का खौफ दे सकती हैं तो इसमें नाइंसाफी कहां है। कई विद्वान और कानूनविद यही तर्क दे रहे कि मर्द जेल चला जाएगा तो औरतों का गुजारा कैसे चलेगा। इस आधार पर अहम यह है कि कोई औरत पुलिस में शिकायत तो तब ही दर्ज कराएगी जब उसे इस बात का भरोसा हो कि वह अपना भरण-पोषण खुद कर लेगी। यहां पर परिवार की भी बात है। इस जुल्म के खिलाफ आवाज उठाने पर उसे मायके या अन्य परिजनों का भी तो साथ मिल सकता है। औरत के वजूद को, उसके भरण-पोषण को सिर्फ शौहर की कमाई से जोड़ने वाले जरा अपने आसपास खेतों-खलिहानों, निर्माण स्थलों, कारखानों में नजर डाल दें तो पता चल जाएगा कि परिवार के गुजर-बसर में महिलाओं की कमाई का कितना योगदान रहता है। ये लोग उस मध्यकालीन जमाने की बात कर रहे हैं जहां औरतें रसोई तक सीमित थीं। यह औरत को तय करने दीजिए कि वह हलाला के बरक्स अपनी खुद्दारी चुने या शौहर की कमाई।

कई लोगों ने आश्चर्यजनक ढंग से तर्क दिया कि तीन तलाक आपराधिक बनेगा तो शौहर तलाक देने के बजाए बीवी पर जुल्मो-सितम बढ़ा देगा। यह तर्क देकर आप भारतीय समाज और कानून को जंगल राज के रूप में ही देखते हैं। तो क्या बीवी पर अत्याचार करने वाला शौहर घरेलू हिंसा कानून के दायरे में नहीं आएगा? संसद और कानून द्वारा औरतों को मिले हर हक को सबसे पहले परिवार पर ही खतरा बताया जाता है। औरतों को मजबूत करने की कोशिश को मर्दों के खिलाफ मान लिया जाता है।

राम रहीम जैसा कद्दावर चरित्र जिसे सत्ता का भी संरक्षण प्राप्त था, उसे अदालत ने बलात्कार के मामले में दोषी करार दिया तो पूरी दुनिया उन दो साध्वियों के हौसले से ताज्जुब में थी जिसने कथित सर्वशक्तिमान के खिलाफ आवाज उठाई थी। तीन तलाक के मामले में सत्ताधारी पार्टी उन महिलाओं के साथ खड़ी भर हुई जो इसके लिए तीन दशकों से लड़ रही थीं। लड़ाई में साथ देकर निर्णायक मोड़ पर लाने वाले विजेता की श्रेणी में ही आ जाते हैं। नेता को पता है कि उसकी मजबूती जनता में है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पहले कार्यकाल में ही फौरी तीन तलाक के खात्मे को लेकर प्रतिबद्धता दिखाई थी।

लाल किले से दिए अपने भाषण में भी इसे प्रमुखता से रखा। जहां राजनीतिक विश्लेषक इसे ध्रुवीकरण का मामला बताने में जुटे थे उसके उलट नरेंद्र मोदी ने इसे सामाजिक न्याय का स्वरूप देने में कामयाबी पाई। इस मसले पर सदन प्रबंधन भी ऐसा रहा कि अन्य दलों को अहसास हो गया कि तीन तलाक के पक्ष में खड़े होने का मतलब औरतों के खिलाफ खड़े होना है।

फौरी तीन तलाक पर कानून के जरिए नरेंद्र मोदी सरकार ने साबित किया कि मजबूत सरकार के क्या मायने होते हैं। हज सबसिडी से लेकर इस ताजा विधेयक तक में भाजपा को चेताया जाते रहा कि पूरा मुसलिम वोट बैंक उसके खिलाफ हो जाएगा। लेकिन अब दिख रहा है कि हज पर सबसिडी खत्म होने के बाद हाजियों की संख्या बढ़ी है और गिने-चुने लोगों को छोड़ कर आम मुसलिम तबके ने इसका जरा भी विरोध नहीं किया। किसी महिला हाजी के साथ पुरुषों के जाने की अनिवार्यता भी खत्म की गई। मजे की बात यह है कि सऊदी अरब के समाज में ऐसी कोई परंपरा नहीं है कि औरत किसी मर्द के साथ ही हज पर जाए। यह यहां के मजहबी उस्तादों का जोड़ा हुआ पुछल्ला था।

दुनिया के ज्यादातर देश बहुत पहले ही अपने यहां फौरी तीन तलाक को समाप्त कर चुके हैं लेकिन आश्चर्यजनक ढंग से कई विद्वान औरत को तोड़ने वाली इस कुप्रथा को परिवार को जोड़ने वाला बता रहे हैं। इस ‘जेंडर जस्टिस’ में भाजपा आगे निकली क्योंकि उसने वोट बैंक के बिगाड़ के डर से औरतों के हक पर ईमान की बात नहीं छोड़ी। इंटरनेट पर जाकर संसद में तीन तलाक पर हुई बहस को गौर से सुनें। यह बहस भारत के सामाजिक इतिहास में अहम रहेगी, और आगे की तारीखों में एक बार फिर साबित होगा कि बदलाव का साथ देने वाले ही तारीखी होते हैं।
‘सब ने पढ़ रक्खा था सच की जीत होती है मगर
था भरोसा किस को सच पर सच को सच कहता तो कौन’

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