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बेबाक बोल: आतंक का अंत!

आतंकवादियों के आका के मारे जाने की इस बार आधिकारिक रूप से पुष्टि हुई है। अमेरिका का दावा है कि उसके डीएनए विशेषज्ञों ने पुख्ता सबूत दिए कि मारा गया आतंकवादी बगदादी ही था।

Author Published on: November 2, 2019 4:02 AM
अमेरिकी प्रेसीडेंट डोनाल्ड ट्रंप और वह कुत्ता, जो कि बगदादी का पीछा करने के दौरान घायल हो गया था।

मुकेश भारद्वाज

अमेरिका के राष्ट्रपति ने आधिकारिक घोषणा की कि इस्लामिक स्टेट का सरगना बगदादी मारा गया। डोनाल्ड ट्रंप के दावे की बात करें तो जिस आतंकवादी को कुत्ते की मौत मारने के लिए एक कुत्ता ही काफी था वह पूरी दुनिया में लोगों का जानवरों की तरह शिकार क्यों कर रहा था? ईरान के सूचना व प्रसारण मंत्री मोहम्मद जावेद का कहना है कि संयुक्त राज्य अमेरिका ने अपने ही सृजन को सहजता से खत्म कर दिया है। अल-कायदा सरगना उसामा बिन लादेन हो या बगदादी, ये उन्हीं साम्राज्यवादी ताकतों द्वारा खड़े किए गए जिनके लिए ये ही बाद में भस्मासुर बन गए। जिस जमीन पर सभ्यता और संस्कृति फली-फूली अब वहां धर्म के नाम पर बर्बरता के आका पैदा कर दिए गए हैं। राजनीतिक और आर्थिक ताकतें ही अपने स्वार्थ के लिए इन्हें खड़ा करती हैं। फिलहाल आतंक के एक चेहरे के अंत पर बेबाक बोल।

बगदादी को पहले ही और बहुत बेरहमी से मारा जाना चाहिए था। मैं बहुत खुश हूं। मेरे पति को 38 अन्य लोगों के साथ मारा गया था और इसके पीछे आइएस का हाथ था। मुझे इस बात की खुशी है कि आतंकवादियों का शिविर पूरी दुनिया में ध्वस्त किया जा रहा है। इससे भविष्य में कई लोगों की जान बचेगी’। पश्चिम बंगाल के नादिया जिले की दो महिलाओं की जिंदगी में अमेरिकी फौज की कार्रवाई का क्या असर होता है ये उद्धरण यही बताता है। मध्य पूर्व में धर्म के नाम पर बर्बरता फैलाने वालों को प्रश्रय देने का भारत के एक छोटे से इलाके पर क्या असर होता है? बगदादी के मारे जाने की खबरें पहले चाहे जितनी बार झूठी साबित हो गई हों लेकिन धर्म के नाम पर फैलाए गए खौफ के साम्राज्य का सच हम सबके सामने है। उन वीडियो का सच हमारे सामने है जिनमें जेहाद के नाम पर लोगों का अपहरण कर कैमरे के सामने गला रेत कर मार दिया गया। हिंदुस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान से लेकर यूरोपीय देश और अमेरिका तक इसके शिकार हैं। आतंकवादियों के आका के मारे जाने की इस बार आधिकारिक रूप से पुष्टि हुई है। अमेरिका का दावा है कि उसके डीएनए विशेषज्ञों ने पुख्ता सबूत दिए कि मारा गया आतंकवादी बगदादी ही था।

इसके पहले अमेरिकी फौज की ही कार्रवाई में पाकिस्तान के ऐबटाबाद में अल-कायदा का सरगना उसामा बिन लादेन मारा गया था। अमेरिका पर आरोप है कि तालिबान में पैदा हुए अल-कायदा नाम के आतंकवादी संगठन को उसने ही अपने स्वार्थों के तहत खड़ा किया था। अमेरिका के होश तब उड़े थे जब अल-कायदा ने उसके घर में हमला किया और उसकी सर्वशक्तिमान सत्ता को चुनौती दी। अमेरिका में जुड़वां मीनार का गिरना और उसमें तीन हजार लोगों का मरना वह मोड़ था जब अमेरिका ने इस संगठन के खात्मे के लिए सोचा। बराक ओबामा को पता था कि बिना आतंकवाद पर मजबूत वार किए अमेरिकी जनता को भरोसे में नहीं लिया जा सकता। इसमें कोई शक नहीं कि उसामा बिन लादेन की मौत के बाद अल कायदा का नेटवर्क बहुत कमजोर पड़ा और ओबामा की छवि चमकी।

ऐबटाबाद में उसामा बिन लादेन की मौत के बाद उसका एक वीडियो जारी हुआ था, जिसमें वो अपने खौफ के संदेशों का वीडियो बनवा रहा था। वीडियो में दिखता है कि वह धमकी भरे संवादों को बोलने के लिए कितना अभ्यास करता है, कहीं हिचकता है तो कहीं अटकता है। उस वीडियो से अंदाजा लगाया जा सकता है कि कैसे कोई साधारण सा आदमी असाधारण होने का दिखावा कर अपना खौफ कायम करता है। जेहाद के यलगार के पीछे कई बीवियों और बच्चों के बीच एक आम आदमी की सी छवि। सत्ता और समाज का स्वार्थ ही ऐसे हत्यारे पैदा करते हैं जो बाद में सत्ता और समाज के लिए ही सबसे बड़ा खतरा बन जाते हैं।

उत्तर पश्चिमी सीरिया में इस्लामिक स्टेट के नेता अबु बकर अल बगदादी के अंत के बारे में अमेरिकी राष्टÑपति डोनाल्ड ट्रंप दावा करते हैं-हमारे कुत्ते उसे खदेड़ रहे थे। सुरंग के आखिरी छोर पर वो गिर गया और तीन बच्चों के साथ अपने कमर में बंधे बम से खुद को उड़ा लिया। बगदादी गिड़गिड़ाते हुए रो रहा था। दुनिया के नंबर वन आतंकवादी की मौत।

उसामा से लेकर बगदादी तक, आतंक के चेहरों का ऐसा ही अंत होता है। अमेरिका ने बताया कि बगदादी को मारने में उसका एक कुत्ता जख्मी हो गया। कुत्ते ने खदेड़ा और बगदादी ने खुद को विस्फोटक से उड़ा लिया। उसामा बिन लादेन और बगदादी की मौत के अंतिम क्षण यही बताते हैं कि धर्म के नाम पर हत्या करने वालों को जन्नत और हूरें नहीं कुत्ते की मौत नसीब होती है। डोनाल्ड ट्रंप ने अपने ट्विटर हैंडल पर उस कुत्ते के साथ फोटोशॉप तस्वीर डाली जिसने बगदादी को खदेड़ा था।

जब ऐसे लोगों को मारने के लिए कुत्ते ही काफी होते हैं तो फिर इन्हें इंसानियत के एक बड़े हिस्से की हत्या करने का समय क्यों दिया जाता है? जिसके लिए एक कुत्ता ही काफी था वह पूरी दुनिया में लोगों का जानवरों की तरह शिकार क्यों कर रहा था? क्या इस पूरी मुहिम में अमेरिका नायक भर है? ईरान के सूचना व प्रसारण मंत्री मोहम्मद जावेद कहते हैं कि अमेरिका द्वारा बगदादी का खात्मा कोई बड़ी बात नहीं है, दरअसल उसने अपने ही सृजन को साधारण तरीके से खत्म कर दिया।

आज पूरी दुनिया में जहां रोजी-रोटी की समस्या बढ़ रही है, वहीं दुनिया भर के शासक जनता को भरमाने के लिए युद्धोन्माद और उग्र राष्ट्रवाद का सहारा ले रहे हैं। दुनिया का सबसे महंगा बाजार हथियारों का ही है जिसके आपूर्तिकर्ता अमेरिका, फ्रांस और इजराइल जैसे देश हैं। इसके मूल में इन देशों की साम्राज्यवादी नीति ही है। अफगानिस्तान में कम्युनिस्ट शासन के खिलाफ तालिबान को खड़ा किया गया। लेकिन सोवियत संघ का विघटन और अफगानिस्तान में कम्युनिस्ट शासन के खात्मे के बाद यह साम्राज्यवादी ताकतों के लिए अनुपयोगी हो गया। इन बर्बर लड़ाकों ने जबरिया सेवानिवृत्ति के बजाए अमेरिका और अन्य साम्राज्यवादी देशों में भी अपने पांव पसारने शुरू कर दिए। तालिबान का भस्मासुर नौ सितंबर 2001 को अमेरिका में तबाही मचा गया।

अफगानिस्तान जैसा ही उदाहरण हम सीरिया में भी देखते हैं। यहां की लड़ाई में इस्लामिक स्टेट को एक रणनीति की तरह खड़ा किया गया था। इसके पहले ईरान और इराक को लड़ाकर आधुनिक सभ्यता से दूर किया गया। वहां इस्लामिक कट्टरता को बढ़ावा दे तबाही का मंजर बनाया गया जिसमें स्वाभाविक तौर पर हथियार का इस्तेमाल होना था। हथियार बेचने वाला ही अफगानिस्तान में था और वही अब सीरिया में भी है। और जब लगने लग जाता है कि ये ताकतें साम्राज्यवादी पूंजी को नुकसान पहुंचा रही हैं तो फिर इन्हें कुत्तों की मौत मारने का तमगा भी हासिल कर लिया जाता है। ये तमगा कितना अहम है यह इसी बात से समझा जा सकता है कि भारत सहित दुनिया में कई जगह के जनसंचार के माध्यम इससे पहले कई बार बगदादी को मार चुके हैं। इस बार जबकि इसका एलान सर्वशक्तिमान की तरफ से किया गया है तो हम उम्मीद जता सकते हैं कि अब इस्लामिक स्टेट का नेटवर्क कमजोर होगा।

मध्य पूर्व में तेल की राजनीति ने विश्व को बड़ा बाजार और विनाश दोनों का कारण दिया। तेल आधुनिक औद्योगिक युग का इंजन है और उस पर कब्जे की मारकाट में शक्तिशाली देशों ने इस पूरे हिस्से को कमजोर करने की साजिश रची। जो मध्य पूर्व सभ्यताओं का जनक रहा वहां नफरत की चिंगारी फैलाई गई। इस पूरे क्षेत्र को धार्मिक कट्टरपंथियों का संघर्ष क्षेत्र बनाया गया। बामियान की जिन गुफाओं में बुद्ध की शांति बसती थी वहां विस्फोट किया गया। 1970 के दशक के पहले के काबुल की तस्वीरें आज भी बहुत जगह उपलब्ध हैं। यह वह समय था जब काबुल की लड़कियां पाश्चात्य शैली के कपड़ों में विश्वविद्यालय परिसरों में जाती थीं। लेकिन पिछले पचास सालों में इस पूरे क्षेत्र को धार्मिक बर्बरों और शक्तिशाली देशों का सैन्य अड्डा बना दिया गया जिसका सबसे बड़ा नुकसान इस क्षेत्र की औरतों और बच्चों ने उठाया। जो बच्चे और बच्चियां बड़े हुए उनके सारे अधिकार छीने जा चुके थे। आज अफगानिस्तान से लेकर सीरिया ने जो खोया है उसकी भरपाई तो नहीं हो सकती। लेकिन दुनिया में खोने वाला हिस्सा जितना बड़ा होता जाएगा खौफ का साया भी उतना बढ़ता जाएगा। धर्म, साम्राज्य और बाजार का यह खेल जितनी जल्दी कमजोर पड़े उतना अच्छा।

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