ताज़ा खबर
 

बेबाक बोल: डूबती व्यवस्था

मुंबई से कोच्चि और चेन्नई से लेकर पटना, हर डूबते शहर पर सवाल तैरता है कि जिम्मेदार कौन? सड़कों पर निकले लोग अपनी एसयूवी में डूब कर मर जाते हैं। शहरी योजनाओं का मकसद बस मकान बना देना है, उसके आगे के मुकाम पर नजर नहीं रहती। अगर सारी जगहों पर मकान ही बना दिए जाएंगे तो फिर पानी निकलेगा कहां? हम अपनी जरूरतों के अलावा कहीं एक इंच जमीन छोड़ने को तैयार नहीं हैं। अनियोजित शहरों में बेतरतीब बसावट के कारण हर तरह के हादसे से मौतों के आंकड़े बढ़ रहे हैं तो दिल्ली में होने वाले आगामी चुनावों के लिए सबसे लुभावना वादा है कच्ची कॉलोनियों को पक्का करना। अनधिकृत कॉलोनियों को वैधता का जामा पहनाने में कोई राजनीतिक दल पीछे नहीं है। आज का चुनावी फायदा यह बोलने वालों का मुंह बंद करा देता है कि ये सपनों का घर है या आगे आनेवाला दु:स्वप्न। शहरी नियोजन में नागरिकों से लेकर सरकारों तक की नाकामी पर बेबाक बोल।

Author Published on: October 5, 2019 4:02 AM
बिहार में बाढ़ की त्रासदी नई नहीं है। कोसी के इलाके तो हर साल डूबते हैं, नेपाल से छोड़ा पानी सारे सपने बहा ले जाता है।

बिहार के उपमुख्यमंत्री कुछ सामान के साथ बचाव दल के द्वारा निकाले जाने के बाद एक पुल पर असहाय सी हालत में खड़े थे। पद्मश्री गायिका सोशल मीडिया पर गुहार लगा रही थीं कि उन्हें पानी में डूबे हुए उनके घर से निकाला जाए। वे सवाल पूछ रही थीं कि भारत में एअरलिफ्ट करवाने की सुविधा क्यों नहीं? एअरलिफ्ट की बात तो बाद में कर लें कुछ हेलिकॉप्टर बाढ़ प्रभावित इलाकों में जो सामान गिरा रहे थे वो पीड़ितों तक नहीं पहुंच कर बाढ़ के पानी में डूब जा रहे थे। जिन्हें थोड़ा सामान मिला तो गीले हो चुके चिवड़ा और सड़े हुए आलू सोशल मीडिया पर तैरने लगे। बस तीन दिन की बारिश के बाद यह हाल था कि बिहार की राजधानी सहित कई इलाके त्राहिमाम कर उठे। आपदा प्रबंधन जैसी कोई चीज नहीं, एनडीआरएफ की चंद नावें प्रभावशाली लोगों तक पहुंच रही थीं और आम लोग एक-दूसरे का हौसला बढ़ा ट्रैक्टर, क्रेन या स्थानीय जुगाड़ से इस मुसीबत से निकलने की कोशिश कर रहे थे। महात्मा गांधी की डेढ़ सौवीं जयंती के दिन पटना डूबा हुआ था और रंगकर्मियों ने जुगाड़ की नाव पर गांधी को रख कर जुलूस निकाला।

बिहार में बाढ़ की त्रासदी नई नहीं है। कोसी के इलाके तो हर साल डूबते हैं, नेपाल से छोड़ा पानी सारे सपने बहा ले जाता है। कमजोर तबके की कराह हर बार अनसुनी कर दी जाती है। लेकिन इस बार बिहार की राजधानी डूबी थी और मध्यम वर्ग शहर के नगर निगम पर सवाल उठा रहा था कि हमारे शहर में नालियों की व्यवस्था तक क्यों नहीं। उच्च मध्यम वर्ग इस बात पर यकीन नहीं कर पा रहा था कि वो एक हफ्ते से ज्यादा दिनों तक अपनी बहुमंजिला इमारतों में कैद हो जाएंगे। जेब में पैसे होने के बाद भी दूध-सब्जी नहीं ला पाएंगे। मुश्किल तो यह है कि क्या इतने बुरे दौर को झेलने के बाद भी हम कोई सबक ले पाएंगे? हमें कुछ याद रह पाएगा?

इस याद पर सवाल तो राज्य के अगुआ ही उठा देते हैं। पत्रकारों के पूछने पर मुख्यमंत्री तल्खी से कहते हैं, ‘बंबई में पानी आया तो उसके बारे में क्या विचार है, क्या देश और दुनिया के अन्य हिस्सों में पानी नहीं आया। पटना के कुछ हिस्सों में पानी आया क्या सिर्फ यही समस्या है…कुदरत किसी के हाथ में नहीं रहती लोगों को हौसला बुलंद रखना चाहिए’।

नाकाफी इंतजाम पर जब नीतीश कुमार पत्रकारों को मुंबई की बाढ़ की याद दिला रहे थे और अमिताभ बच्चन सरीखे संवाद अदायगी में कह रहे थे कि जाओ पहले वहां देख के आओ जहां बाढ़ आई थी…उसी वक्त याद आता है कि इसी साल बीती जून में महाराष्टÑ बारिश से बेहाल हुआ और मीडिया में खबरें आर्इं कि भारी बारिश की वजह से दीवार गिर जाने से बिहार के जिन 15 लोगों की मौत हुई थी वे सभी लोग कटिहार जिले से ही थे। ये वैसे बिहारी प्रवासी मजदूर थे जो अपने घरों में रोजी-रोटी का इंतजाम करने वाले अकेले थे। इसके पहले चेन्नई में भारी बारिश के बाद जब बाढ़ की आफत आई थी तो बहुत से प्रवासी मजदूरों के सबकुछ खत्म हो जाने की खबरें भी हमने देखीं। तो, महाराष्टÑ की बाढ़ का बिहार से भी नाता है। अगर वहां सवाल उठे थे तो आप की व्यवस्था पर सवाल क्यों नहीं उठेंगे। जब रोजी-रोटी राज्यों के नक्शे से निकल चुकी है तो फिर बाढ़ और सूखा किस हद में रहेगा।

नीतीश कुमार ने मुंबई की बाढ़ की ठीक ही याद दिलाई। भारी बारिश के बाद दिल दहला देने वाला मंजर। मुंबईकरों के पास विशालकाय गाड़ियां तो थीं लेकिन बाढ़ से निकलने का रास्ता नहीं था। लोग अपनी शाही गाड़ियों में डूब कर मर रहे थे। देश की औद्योगिक राजधानी, सपनों के शहर में नालियों के ऊपर तो घर बन गए। फिर बारिश का पानी कहां जाए। वहां मीठी नदी तो संकरे गंदे नाले में तब्दील हो गई है। और, हम इस मानवीय आपदा को कुदरती आपदा का नाम दे दिल को बहला लेते हैं।

केरल, महाराष्ट्र, ओड़ीशा से लेकर उत्तराखंड में विकास का जो ढांचा खड़ा किया गया उसका संबंध पर्यावरण संकट और जलवायु परिवर्तन से है। यह वैश्विक नीतिगत समस्या है जिस पर पुरजोर बहस चल रही है। विकसित देश बांधों का कारोबार विकासशील देशों में भेज कर खुद साइकिल की ओर लौट रहे हैं और बेयर ग्रिल्स की तरह इंसान बनाम जंगल की वकालत कर कुदरत से कुदरती तरीके से ही जीवन निर्वहन की बात कर रहे हैं। भारत जैसे बड़ी जनसंख्या वाले विशाल देश में जहां लोगों को रोजगार दिलाना चुनौती है वहां नए जमाने की कार आने के इंतजार में पुराने जमाने की कार के निर्माण का बंद हो जाना भी बड़ी चुनौती पैदा कर देता है। वैश्विक संसाधनों में गैरबराबरी पर अभी जो बहस शुरू हुई है वह कितनी तेज होगी और किस दिशा में जाएगी यह देखना अभी बाकी है।

विकास का दूसरा संदर्भ शहर नियोजन से है। पटना एक अनियोजित शहर है। लोग आते गए और अंदर की तरफ शहर बसता गया। इन शहरों में बसावट पहले होती है और पानी की निकासी की बात बाद में सोची जाती है। पटना जैसे पुराने शहरों की बात तो समझी जा सकती है, लेकिन गुरुग्राम जैसे आधुनिक शहर में पानी निकासी की व्यवस्था नाकाम हो जाती है। चंडीगढ़ जैसे शहर की स्थापना में फ्रांसीसी वास्तुकार का नाम जुड़ा है पर वहां भी आम शहरों जैसा जलजमाव होना शुरू हो गया है। समस्या यह है कि शहरी नियोजन में हम सारी जगह मकान को ही दे देना चाहते हैं, मकान के बाहर जो हमारा नहीं होगा हम उसके लिए सोचना ही नहीं चाहते हैं। जब सारी जगहों पर घर ही बन जाएंगे तो फिर उन घरों का पानी निकलेगा कहां से?

सबसे मुख्य बात आपात योजना की है। केरल और अन्य जगहों पर जहां जल निकासी व्यवस्था थोड़ी ठीक है वह भी सामान्य जिंदगी के लिए ही है, कि जितना पानी घर में इस्तेमाल हुआ उसकी निकासी हो गई। अगर तीन दिन तक लगातार बारिश हो जाए तो फिर हर जगह की व्यवस्था नाकाम है। यानी कि हमारे शहरी नियोजन में आपात हालात के बारे में सोचा ही नहीं जा रहा है। ऐसी स्थिति में तीन दिन की लगातार बारिश हमें लाचारगी की हालत में डाल देती है।
भारत में शहरी नियोजन की विडंबना समझनी है तो दिल्ली में आगामी चुनावों के वादों पर नजर डालें। इस बार सबसे अहम वादा है कच्ची कॉलोनियों को पक्का करने का और इसमें कोई पार्टी पीछे नहीं है।

दिल्ली को अनधिकृत कॉलोनियों की राजधानी भी कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। बिना किसी योजना के मकान के ऊपर मकान बन रहे और हुक्मरान उन्हें वैध बनाने का वादा कर रहे। इस वक्त हममें से अगर कोई पूछ देगा कि आग लगने, भूकम्प या बाढ़ आने पर जब लोगों की जान जाएगी तो जिम्मेदार कौन होगा तो उसे ही जनता विरोधी घोषित कर दिया जाएगा। बिहार के मुख्यमंत्री आज जिस चीज के लिए घिरे हैं, दिल्ली के मुख्यमंत्री उसी के लिए वाहवाही बटोर रहे हैं। इन विरोधाभासों के बीच हर बारिश के बाद किसी डूबते शहर पर फिर से सवाल तैरने लगेंगे कि जिम्मेदार कौन?

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories
1 बेबाक बोल: हौसले का हासिल
2 बेबाक बोल: विषम विवाद
3 बेबाक बोल: ऐसे कैसे चलेगा!