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बेबाक बोल: बाग बाग बिरयानी

दिल्ली में कांग्रेस के सामने सत्ता की प्लेट नहीं है और वह बहुत दिनों से भूखी है।

‘गरीबी हटाओ’ के नारे वाली कांग्रेस की विरासत का अधिग्रहण केजरीवाल कर चुके हैं। (इमेज क्रेडिट-इंडियन एक्सप्रेस)

मुफ्त बिजली-पानी के नारे से शुरू हुआ दिल्ली विधानसभा चुनाव शाहीन बाग से लेकर बिरयानी तक पहुंच गया। बिरयानी को लेकर वकील उज्ज्वल निकम ने एक प्रयोग किया था और कसाब पर बहस कर रहे मीडिया के सामने मटन बिरयानी परोस दी जिससे बहस की पूरी दिशा आतंकवादी को मटन बिरयानी खिलाने वाली कांग्रेस सरकार की तरफ मुड़ गई। इस बार दिल्ली में कांग्रेस के मुफ्त वाले प्रयोग को आम आदमी पार्टी ने भुनाया। वो तो कैप्टन अमरिंदर सिंह ने याद दिलाया कि यह हमारी विरासत है और मुफ्त बिजली-पानी देना सरकार का काम है। भारतीय अर्थव्यवस्था पर विश्व बैंक के दबदबे और रियायत व मुफ्त के खिलाफ वाले माहौल में भूपिंदर सिंह हुड्डा ने हरियाणा में बिजली के बकाया बिल माफ कर पूरे देश को यह नुस्खा पकड़ाया था जो बाद में यूपीए के किसानों की कर्जमाफी का आधार बना था। ‘आप’ के हाथों छिनी अपनी विरासत और बिरयानी वाली सियासत के बीच दिल्ली में पहचान खो रही कांग्रेस पर बेबाक बोल।

‘ही इज हैंग्री फॉर बिरयानी’

स्वरा भास्कर के इस ट्वीट पर भाजपा आइटी सेल के लोग सक्रिय हो गए कि ‘हंग्री’ की स्पेलिंग भी नहीं आती, तो स्वरा भास्कर ने शब्दकोश दिखाते हुए ‘हैंग्री’ का मतलब समझाया-भूख लगने के बाद खाना नहीं मिलने से पैदा हुआ चिड़चिड़ापन। इसके बाद टिप्पणी आई कि इसलिए ये लोग जेएनयू के विद्यार्थियों से नफरत करते हैं, क्योंकि इनकी स्पेलिंग गलत नहीं होती। यह सारा विवाद उस बिरयानी पर था जिसे शाहीन बाग से जोड़ा जा रहा था। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने केजरीवाल पर कुछ खास पहचान के लोगों को बिरयानी खिलाने का आरोप लगाया।

भारतीय राजनीति में बिरयानी उत्प्रेरक का काम करने लगी है। इसे सबसे पहले उत्प्रेरक बनाने का प्रयोग किया था मुंबई पर आतंकवादी हमले के मुकदमे में सरकारी वकील उज्ज्वल निकम ने। निकम ने पहले बयान दिया कि कसाब ने बिरयानी खाने की इच्छा जाहिर की है। उसके बाद भारतीय राजनीति में बिरयानी खिलाना एक मुहावरा बन गया। कांग्रेस के नेताओं पर सबसे ज्यादा वार इसी बिरयानी शब्द के साथ हुए। बिरयानी शब्द का भावार्थ निकलने लगा आतंकवादियों की मेजबानी करना और जाहिर सी बात है कि उस वक्त तक आतंकवाद की शिनाख्त एक खास पहचान के साथ होने लगी थी। नेताओं से लेकर पत्रकारों की जुबान पर बिरयानी का जुमला आ चुका था। अगर आपको बिजली, पानी और स्कूल के खिलाफ कथ्य खड़ा करना है तो बस एक खास पहचान को बिरयानी खिलाने की चर्चा छेड़ दीजिए।

टीवी चैनलों पर मटन बिरयानी को लेकर भुजाएं फड़काने वाली चर्चा और अखबारों में भर्त्सना वाले ढेर सारे लेख छपने के बाद एक दिन उज्ज्वल निकम ने कहा, ‘कसाब ने कभी भी बिरयानी की मांग नहीं की थी और न ही सरकार ने उसे बिरयानी परोसी थी। मुकदमे के दौरान कसाब के पक्ष में बन रहे भावनात्मक माहौल को रोकने के लिए मैंने इसे गढ़ा था’। निकम का दावा था कि राखी के त्योहार से लेकर हर मौके पर मीडिया कसाब के हाव-भाव पर पैनल चर्चा करवा रहा था। अदालत कक्ष में आतंकवादी का सिर झुका हुआ था और आंख में आंसू थे तो टीवी चैनल पर चर्चा शुरू हुई और कुछ ने कहा कि कसाब की आंखों में आंसू अपनी बहन को याद करते हुए आए। सरकारी वकील निकम की परेशानी यह थी कि परिचर्चाओं में कसाब के आतंकवादी न होने पर भी सवाल उठने लगे थे। इसके बाद निकम ने जेल में मटन बिरयानी वाला बयान दे डाला और मीडिया में पूरी बहस का रुख बदल गया। अब चैनल पर लोग गुस्सा कर रहे थे कि एक खूंखार आतंकवादी मटन बिरयानी कैसे मांग सकता है। गुस्से की लहर बिरयानी परोसने वाली सरकार की तरफ घूम गई।

वकील शायद बेहतर मनोवैज्ञानिक भी होते हैं। निकम ने भारतीय राजनीति, पत्रकारिता और समाज पर एक शानदार प्रयोग कर डाला। अजमल कसाब का गुनाह कितना बड़ा था इस पर बात करने की कोई जरूरत नहीं। एक संप्रभु देश पर आतंकवादी हमला जो अपनी भयावहता बताने के लिए काफी है। लेकिन निकम ने इस भयावहता को बिरयानी से जोड़ दिया और अपने प्रयोग को सफल होता देख उसके अंजाम का विश्लेषण करते रहे।
अंजाम तो यह है कि बस एक गोली मारने वाले नारे के बाद से ही दावा किया जाने लगा कि दिल्ली का चुनाव एकतरफा नहीं है। शाहीन बाग से लेकर बिरयानी तक की बातों के साथ भाजपा की लोकप्रियता चरम पर पहुंची बताई जाने लगी। उधर, केजरीवाल ने खुद को आतंकवादी कहे जाने को भी तवज्जो नहीं दी और मखमली आवाज में अपनी बात कहते गए। बिरयानी के मसालों और बेहतर व रियायती सुविधाओं की मिसालों के बीच दिल्ली में लगातार 15 साल शासन करने वाली कांग्रेस कहां थी?

दिल्ली विधानसभा चुनाव प्रचार में बिजली-पानी का मुद्दा जब बिरयानी तक पहुंच चुका था उसी वक्त एक आवाज आई कि मुफ्त बिजली और पानी कोई बड़ी बात नहीं है। यह तो सरकार का काम है। यह आवाज थी पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की। कैप्टन ने दिल्ली के चुनाव प्रचार में कहा-रियायती शुल्क में बिजली पानी और बेहतर स्कूल व स्वास्थ्य सुविधा प्रदान करना हर सरकार का काम है। केजरीवाल कहते हैं कि हम मुफ्त पानी देंगे, पंजाब में पानी नि:शुल्क है। वे (केजरीवाल) कहते हैं कि नए स्कूल बनाए जाएंगे। पंजाब में मैंने 5500 स्मार्ट स्कूल का निर्माण करवाया और अगले साल तक सभी 13000 स्कूल स्मार्ट स्कूल में बदल दिए जाएंगे। जहां तक मोहल्ला क्लीनिक की बात है तो हमारी योजना के अनुसार 70 फीसद आरोग्य केंद्र का निर्माण किया जा चुका है और अगले साल तक बाकी के भी पूरे कर लिए जाएंगे। यह सब दिल्ली के अलावा कांग्रेस शासित राज्यों में हो चुका है’। अमरिंदर सिंह ने सवाल किया कि केजरीवाल ने आपके बच्चों को रोजगार देने के लिए क्या कदम उठाए? पंजाब सरकार ने 11 लाख युवाओं तक रोजगार की पहुंच बनाई।

मुफ्त बिजली-पानी बनाम शाहीन बाग और बिरयानी के शोर में जब कैप्टन अमरिंदर सिंह कांग्रेस की विरासत याद दिला रहे थे तो पता नहीं अन्य कांग्रेसी नेता के कानों तक उनके शब्द पहुंचे थे या नहीं। कैप्टन ने कहा कि जिस देश में जवाहरलाल नेहरू, मोतीलाल नेहरू, राजीव गांधी और इंदिरा गांधी जैसे नेता जो इस देश को लेकर एक सोच के साथ थे वहां अब सिर्फ मुफ्त बिजली और पानी ही चुनाव के केंद्र में हो गया है।

कैप्टन ने कांग्रेस की विरासत का जो बटन दबाया पता नहीं उसका करंट दिल्ली कांग्रेस या पार्टी के राष्टÑीय नेताओं की याददाश्त वापस ला पाया या नहीं। रियायती बिजली की कहानी शुरू करने वाले हैं कांग्रेस के नेता भूपिंदर सिंह हुड्डा। हुड्डा ने पांच मार्च 2005 को हरियाणा में मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के कुछ ही घंटों बाद किसानों का 16 सौ करोड़ रुपए का बकाया बिजली बिल माफ कर दिया था। बिजली बिल बकाए की माफी के एलान के साथ उन्होंने पूरे चुनाव का रुख बदल दिया था। यहां पर ध्यान देने की बात है कि हुड्डा ने बिजली बिल माफ करने की शुरुआत तब की थी जब भारतीय अर्थव्यवस्था पर विश्व बैंक का जबर्दस्त कर्ज था और यहां के लिए साफ संदेश था कि जनता को कोई चीज मुफ्त नहीं दी जाएगी। हुड्डा ने गरीबी रेखा से नीचे के लोगों के लिए मुफ्त में बुनियादी सुविधाएं पहुंचाई और पूरे देश की राजनीति को बिल माफी और मुफ्त का प्रयोग करना सिखा दिया।

‘गरीबी हटाओ’ के नारे वाली कांग्रेस की विरासत का अधिग्रहण केजरीवाल कर चुके हैं। कांग्रेस के नेता अपने ही नारों को दूसरे के द्वारा उछालते हुए देख रहे हैं। दिल्ली में मेरे एक कारोबारी मित्र ने मुझसे कहा कि मैं तो केजरीवाल को वोट नहीं दूंगा। मैंने पूछा, क्यों तो उसका जवाब था कि केजरीवाल ने मुझे क्या फायदा पहुंचाया? मेरे पास 50 लोग काम करते हैं और उन सबके बिजली और पानी का बिल शून्य है, लेकिन मुझे तो इससे कोई फायदा नहीं पहुंचा। कारोबारी मित्र के सवाल का जवाब यही है कि केजरीवाल ने एक के ऊपर 50 लोगों की खुशियों को चुना। चंद लोगों की नाराजगी पर ढेरों की खुशियों को तरजीह दी। यह पाठ शायद केजरीवाल ने कांग्रेस की विरासत से ही सीखा था जिसे कांग्रेस भूल गई थी।

दिल्ली में कांग्रेस के सामने सत्ता की प्लेट नहीं है और वह बहुत दिनों से भूखी है। लेकिन उसके नेताओं में भूख से उपजा चिड़चिड़ापन, गुस्सा क्यों नहीं दिख पाया। कांग्रेस ‘हैंग्री’ क्यों नहीं दिख रही। पंजाब तो दिल्ली से ज्यादा दूर नहीं है। लेकिन कैप्टन अमरिंदर सिंह के काम को भी कांग्रेस दिल्ली की जनता को नहीं दिखा पाई। शीला की विरासत को लेकर भी इतनी देर से जागी कि लोगों पर अब बिजली और बिरयानी के अलावा कुछ असर नहीं कर रहा है। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी तब मैदान में उतरे जब लोग आम आदमी पार्टी और भाजपा में से कौन की चर्चा कर रहे हैं।

भूख मर जाना सेहत के लिए अच्छा नहीं माना जाता है। खाने की इच्छा खत्म होने के बाद शरीर रोगग्रस्त हो जाता है, उसके पास काम करने की ऊर्जा नहीं होती। आयुर्वेद में पाचन शक्ति को स्वास्थ्य का केंद्र माना गया है। कांग्रेस को चाहिए कि वह अपनी बदहजमी का जल्द से जल्द इलाज करवा ले।

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