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बेबाक बोल: सड़क से संसद तक

बलात्कार पितृसत्ता का ऐसा हथियार है जिसके लिए छोटे कपड़े से लेकर मोबाइल फोन तक को जिम्मेदार बताया जाता है। इसके पीछे सिर्फ एक ही कारण है स्त्री पर वर्चस्व की मानसिकता।

Author Updated: December 7, 2019 3:47 AM
हैदराबाद कांड के सभी 4 आरोपियों का एनकाउंटर हो चुका है। (pc- indian express)

सड़क पर न्याय होता है और बहुजन से लेकर कांग्रेस व भाजपा के सांसद उसकी वाह-वाह में जुट जाते हैं। जिस पार्टी के अगुआ बलात्कार पर कहते हैं कि लड़के हैं, लड़कों से गलती हो जाती है उसकी सांसद को बलात्कार का हल संसद को दुरुस्त करने में नहीं सड़क पर न्याय होने में दिखता है। सिनेमा और संसद से सड़क तक मर्दानगी का महोत्सव ऐसा है कि अनुच्छेद 370 खत्म होते ही ‘गोरी’ कश्मीरी लड़कियों की अस्मिता पर हमला शुरू हो जाता है। संसद में गांधी के हत्यारे का महिमामंडन और भीड़ द्वारा सजा देने की मांग कर लोकतंत्र को कमजोर करने की कोशिश हो रही है। लोकतंत्र के कमजोर होने का मतलब है कमजोर पर मजबूत का वर्चस्व। बलात्कार के मामलों का सड़क से संसद तक मर्दवादी नजरिए से जो हल निकाला जा रहा है और होता दिख भी रहा है वह खुद कितनी बड़ी समस्या है इससे आगाह करता बेबाक बोल।

हैदराबाद…कुछ लोग आए हैं, मदद के लिए बोल रहे हैं। सबसे बड़ी त्रासदी इंसान का इंसान से भरोसा टूटना। उस लड़की के साथ साजिश की गई, मदद देने के नाम पर उसे घेरा गया। इस स्तंभ में पहले भी सुदर्शन की कहानी के जरिए बाबा भारती के भरोसे को कायम रखने की जद्दोजहद का जिक्र किया जा चुका है। मदद और भरोसे की हत्या कर दी गई, जला दिया गया। क्या इसके बाद लड़कियां सड़क पर किसी का भरोसा करेंगी? मिर्ची स्प्रे की बोतल, जूडो-कराटे के दांव-पेच के भरोसे क्या उनका सड़क पर वह हौसला बरकरार रहेगा जो इंसानों पर भरोसे के साथ था? इसके बाद जो सड़क पर पुलिस न्याय हुआ और कई सांसदों ने उसकी प्रशंसा की, इसका नतीजा आगे क्या होगा? जो उत्तर प्रदेश पुलिस मुठभेड़ों के लिए सवालों के घेरे में रही है उसे भी तेलंगाना पुलिस से सीख लेने की नसीहत दी जा रही है।

16 दिसंबर 2012, दिल्ली और 28 नवंबर 2019, हैदराबाद के बीच भी देश में सामूहिक बलात्कार के मामले हुए। लेकिन आम लोगों से संसद तक पहुंचे इस गुस्से के वर्गीय ढांचे को भी देखिए। लिखित कानून और अलिखित संवेदनशीलता को ताक पर रख कुछ ही देर में डॉक्टर लड़की का सुंदर चेहरा और जला हुआ शरीर सोशल मीडिया पर तैरने लगा और आरोपियों को सड़क पर मारने की, जिंदा जला देने की मांग की जाने लगी। आरोपियों की तस्वीर, उनके कमजोर तबके की पृष्ठभूमि और एक समुदाय विशेष के नाम के साथ अलग तरह की अलोकतांत्रिक मांगें भी उठने लगीं। इस बार भी आम लोगों की यही चिंता थी कि मेरी भी बेटी है, वह भी बाहर जाती है, उसके साथ भी ऐसा होगा तो? हम सामूहिकता की बात ही नहीं कर पाए। स्त्रियों को बहू और बेटी के दायरे में बांध दिया। स्त्री को सिर्फ स्त्री की तरह नहीं देख पाते हैं। निर्भया मामले के बाद भी हम उन लोगों को संसद भेजते रहे जिन पर यौन उत्पीड़न के आरोप हैं, जो लड़कियों के बलात्कार के लिए खुलेआम उनके कपड़ों और आजादी को दोषी ठहराते रहे हैं।

सड़क पर जले भरोसे के बाद दूसरी त्रासदी संसद में दिखी। समाजवादी पार्टी की सांसद कहती हैं कि बलात्कार के आरोपियों को सार्वजनिक तौर पर सजा देनी चाहिए, उन्हें भीड़ के हवाले कर देना चाहिए। तेलंगाना पुलिस के मुठभेड़ के बाद वो कहती हैं, ‘देर आए दुरुस्त आए, देर आए बहुत देर आए’। याद रहे कि ये उन्हीं समाजवादी पार्टी के कोटे से सांसद बनी हैं जिसके तत्कालीन अगुआ ने बलात्कार के आरोपियों पर कहा था कि लड़के हैं, लड़कों से गलतियां हो जाती हैं। उस वक्त सड़क पर अपने नेता की मानसिकता दुरुस्त करने की कोशिश करतीं तो आज शायद संसद में हालात बेहतर होते। संसद भवन में मांग उठ रही है कि बलात्कारियों को सड़क पर सजा दो और यह पूरी भी हो रही है। ताज्जुब है कि संसद में बैठे सांसदों ने जया बच्चन के इस अलोकतांत्रिक मांग की निंदा नहीं की। शर्म-शर्म के कोई नारे नहीं लगे। हां, तेलंगाना में इस मांग के पूरा होते ही कांग्रेस, भाजपा और बहुजन नेताओं के एक से बोल हो गए। सड़क पर कार्रवाई का मतलब संसद और उससे जुड़ी संस्थाओं की नाकामी है क्या इन्हें इस बात का अहसास है?

सांसदों की सड़क पर कार्रवाई की मांग उस पूरे महिला आंदोलन को पीछे की ओर ले जाती है जिसने संसद से घरेलू हिंसा के खिलाफ भी कानून बनवाया। महिला अधिकार आंदोलन दशकों से यह समझ विकसित करने में लगे हैं कि यौन संबंध महिला का निजी मामला है, घर से लेकर बाहर तक जहां जो कुछ हो उसकी सहमति से हो। हमने समाज का वह पिछड़ा दौर भी देखा है जब बलात्कार का पर्याय महिला की इज्जत जाना माना जाता था, आरोपी का मुंह काला करना होता था और महिला को खुदकुशी के लिए मजबूर कर दिया जाता था। महिला अधिकार आंदोलनों की देन है कि इसे अपराध बनाया गया और ऐसे मामलों को पुलिस, अदालत से लेकर जजों के स्तर पर संवेदनशीलता से लेने की शुरुआत हुई।

बलात्कार पितृसत्ता का ऐसा हथियार है जिसके लिए छोटे कपड़े से लेकर मोबाइल फोन तक को जिम्मेदार बताया जाता है। इसके पीछे सिर्फ एक ही कारण है स्त्री पर वर्चस्व की मानसिकता। बेबीलोन से लेकर रोम तक विश्व की प्राचीन सभ्यताओं में महिलाओं ने यह दंश झेला है। भारत-पाकिस्तान का बंटवारा विश्व की बड़ी विभीषिकाओं में से एक है। दो देश बंटे और सरहद की लकीरों के बीच नोचा गया औरत का जिस्म। गुजरात से लेकर मुजफ्फरनगर के दंगों में स्त्री-देह को अलग ही सजा दी गई। किसी गांव में कोई कमजोर तबके की लड़की स्कूल जाने लगती है तो रास्ते में उसका बलात्कार किसी यौन सुख के लिए नहीं, सामंती पितृसत्ता को बनाए रखने के लिए किया जाता है। समाज का परिवेश जितना सामंती होगा, वहां के मर्दों के पास औरत को तोड़ने का यह उतना ही बड़ा हथियार होगा।

आदिकाल से ही महिला शरीर के स्तर पर हिंसा की शिकार है तो सोचिए जब समाज में अर्जित लोकतांत्रिक विमर्शों को भी मार डाला जाएगा तो क्या हश्र होगा। देश की संसद में अनुच्छेद 370 के खत्म होते ही सबसे पहला मौखिक हमला कश्मीरी लड़कियों की अस्मिता पर होता है। क्षेत्र विशेष की गोरी लड़कियों को हासिल करने की तमन्ना कितने अश्लील तरीके से व्यक्त की जाने लगी। संसद के लिए चुने नेता और सड़क पर खड़े एक आम मर्द ने किस मानसिकता के तहत खास क्षेत्र की दुलहन लाने की मांग कर ली। अगर ऐसा करते लोग हमें बलात्कार के छद्म समर्थक नहीं दिखते हैं तो यकीन मानिए हम समस्या की जड़ में हैं। एक तरफ स्कूल से लेकर संसद और सिनेमा तक मर्दानगी उत्सव की तरह है और दूसरी तरफ भीड़ के हवाले करो की हिंसक मांग हमें बहुत पीछे की ओर ले जा रही है।

फांसी की मांग के बाद का सबसे खतरनाक पक्ष यह है कि सामूहिक बलात्कार के बाद उसके सबूत मिटाए जा रहे हैं, झारखंड से लेकर उत्तर प्रदेश तक। हम अपराध के कारण को समझने के लिए अभी भी तैयार नहीं और न उसके खिलाफ माहौल बनाने के लिए इच्छुक। आज तकनीक कहां से कहां पहुंच गई है। बंगलुरु में बैठा आदमी नासा के साथ मिलकर काम कर सकता है तो क्या हम शिक्षा और तकनीक का समन्वय नहीं कर सकते। जब अंतरिक्ष में उपग्रह हैं तो हम इस ग्रह से लेकर अपने शहर तक की महिलाओं को सुरक्षित नहीं कर सकते। पुलिस का जाल ऐसे फैलाया जाए कि पीड़ित को तुरंत मदद मिले। घर से लेकर स्कूल में मर्दों को सिखाया जाए कि उनका घर या सड़क पर होना किसी महिला के लिए खतरा न हो। सड़क पर न्याय जैसी अलोकतांत्रिक मांग के लिए चीखना बहुत आसान है और घर से बाहर तक महिलाओं के लिए संवेदनशील माहौल बनाना मुश्किल। जब तक आसान राह चुनते रहेंगे, यह समस्या बढ़नी है।

आज देश के कई सांसद अलोकतांत्रिक रवैए के साथ खड़े हैं। धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र जैसे शब्दों को खारिज और धूमिल कर और कैसा समाज बन सकता है। जब आप लोकतंत्र जैसे जीवंत शब्द का मजाक उड़ाते हैं तो आप स्त्री स्वतंत्रता की भी हत्या करते हैं और बलात्कार के लिए राह तैयार करते हैं। लोकतांत्रिक संस्थाएं किस तरह से महिलाओं को मजबूत करती हैं उसका एक छोटा सा उदाहरण जेएनयू है। वहां की लड़कियां मांग करती हैं कि हमें देर रात पुस्तकालय में पढ़ने दो, सड़क पर घूमने दो। जेएनयू परिसर में बहुत ज्यादा पुलिस की जरूरत नहीं है लेकिन अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के साथ लड़कियां खुश और सुरक्षित हैं। यहां यौन उत्पीड़न को रोकने के लिए जीएसकैश जैसी लोकतांत्रिक व्यवस्था थी जिसे खत्म कर दिया गया। देश में और भी जगहों को जेएनयू जैसा लोकतांत्रिक बनाने के बजाए खास तबके के द्वारा इकलौते जेएनयू को ही खत्म करने की मांग की गई। पिछले दिनों जेएनयू पर हमले के जरिए जिस तरह इस प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय की छात्राओं की छवि खराब करने की कोशिश की गई वह हमारे स्त्री विरोधी होते समाज का ज्वलंत उदाहरण है।

अगर हम जेएनयू को खत्म करने की, अपराधियों को सड़क पर सजा देने की, गांधी के हत्यारे के महिमामंडन की मांग कर रहे हैं तो हम अपनी लोकतांत्रिक जमीन को खिसकाने का काम कर रहे हैं। लोकतंत्र के दरकने का मतलब है कमजोर पर मजबूत का वर्चस्व। वैज्ञानिक, तार्किक और लोकतांत्रिक माहौल को खत्म करने वालों के साथ होकर हम कभी भी बलात्कार के खिलाफ नहीं खड़े हो सकेंगे।

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