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2019: पहला पाठ

बीते साल के चुनावी नतीजों के बाद नए साल में 2019 का एजंडा तय कर दिया गया है। जनता के सामने उस महागठबंधन को रख दिया गया है जो नीतियों के आधार पर अभी तक एकजुट नहीं है। आजादी के बाद हुए चुनावों में कांग्रेस के बाद सबसे ज्यादा सीटें पाने वाला और केरल में पहली गैर कांग्रेसी सरकार बनाने वाला वाम दल अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है। वह वाम मोर्चा ही था जो गैर भाजपा और गैर कांग्रेसी शक्तियों को नीति के स्तर पर मंच साझा करवा सकता था, लेकिन 2014 के चुनावों के बाद वाम मोर्चे के पास इतना संख्या बल भी नहीं रह गया कि वह क्षेत्रीय ताकतों को एकजुट कर सके। तीसरा मोर्चा तो तब भी नहीं बना था जब वाम के दखल से यूपीए सरकार ने न्यूनतम साझा कार्यक्रम बनाया था। अब जब वाम शक्तिहीन है तो बहुप्रचारित गठबंधन की शक्ल क्या होगी, नीतियों पर बात हो भी पाएगी या नहीं, इसी की पड़ताल करता बेबाक बोल।

पिछले आम चुनाव 2014 के नतीजों और उसके बाद बने हालात को देख राजनीति के जमीनी जानकारों को इतना तो समझ आ गया था कि फिलहाल तीसरे मोर्चे जैसी कोई चीज बनती नजर नहीं आ रही है। (फाइल फोटो)

’छत्तीसगढ़ में हार हुई लेकिन बाकी दोनों राज्यों में किसी को बहुमत हासिल नहीं हुआ..पंद्रह साल की एंटी इनकंबैसी थी। हम लोग आपस में बात कर रहे कि कहां कमी रह गई… ’यह जनता बनाम गठबंधन होने वाला है।

नए साल के पहले दिन 2019 का चुनावी एजंडा तय कर दिया गया। इसके साथ ही बहुप्रचारित और अभी तक आभासी महागठबंधन को जनता के सामने खड़ा कर दिया गया है। अब इनके सामने चुनौती है कि ये बताएं कि नीति के स्तर पर आप कितने अलग हैं। पिछले हफ्ते इसी कॉलम में हमने भारतीय राजनीति में एक बदली हुई अवधारणा का जिक्र किया था। आजादी के बाद क्षेत्रीय दलों के उभार के पीछे एक अहम अवधारणा थी गैर कांग्रेसवाद। वह चाहे जेपी आंदोलन से निकले नेता हों या फिर तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल की सरकार। 1967 में हुए आम चुनावों ने सही मायनों में सत्ता का विकेंद्रीकरण किया था। देश के लगभग आधे भूभाग पर गैर कांग्रेसी दल राज्यों की सत्ता की अगुआई कर रहे थे। उसके बाद से मनमोहन सिंह की सरकार तक क्षेत्रीय दलों की कांग्रेस से दूरी बनती जा रही थी, लेकिन पिछले साल दिसंबर में आए तीन राज्यों के चुनाव नतीजों ने हालात बदल दिए। आज क्षेत्रीय दलों को अपने अस्तित्व के लिए भाजपा एक बड़ा खतरा लग रही है और वे कांग्रेस के हाथ मजबूत देखना चाहते हैं।

गठबंधन की राजनीति में यूपीए से लेकर एनडीए तक के गठन के सफर पर नजर डालेंगे तो आज एकदम उलटी स्थिति पाएंगे। यूपीए-2 में मनमोहन सिंह की सरकार के समय क्षेत्रीय दल कांग्रेस से छिटककर दूर जा रहे थे। मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ एनडीए बना। आज हालात ये हैं कि एनडीए के घटक दलों को अपनी आवाज घुटती नजर आ रही है। हाल के दिनों में कर्नाटक से आवाज आई कि आठ दिनों में सरकार बदल जाएगी। विधायक की बातें भी सामने आर्इं कि किस तरह से सरकार गिराने की कोशिश हो रही है। अब जरा याद करें कि यहां जद (सेकु) और कांग्रेस गठबंधन की सरकार बनी कैसे थी। पूर्ण बहुमत नहीं मिलने के बावजूद भाजपा के मुख्यमंत्री ने शपथ ले तो ली, लेकिन उन्हें इस्तीफा देकर रुंधे गले से विधानसभा के बाहर जाना पड़ा। ज्यादातर क्षेत्रीय क्षत्रप इसी गुणा-भाग की राजनीति ही कर रहे हैं।

भाजपा और कांग्रेस की शक्तियों के इस उलटफेर के दौर में क्षेत्रीय शक्तियों को बस एक सुरक्षित छतरी की तलाश है। पिछले आम चुनाव 2014 के नतीजों और उसके बाद बने हालात को देख राजनीति के जमीनी जानकारों को इतना तो समझ आ गया था कि फिलहाल तीसरे मोर्चे जैसी कोई चीज बनती नजर नहीं आ रही है। कांग्रेस के खिलाफ बने माहौल में भाजपा बड़ी ताकत बनकर उभरी और अब कांग्रेस अपनी खोई हुई ताकत बटोरने में लगी है। मजबूत और कमजोर के खेल में आज का बड़ा सच यह है कि चुनावी मैदान में ये दोनों बड़ी ताकतें हैं। इन दोनों से कुछ अलग हो सकता है तो नीति। इस नीति पर एक प्रयोग हुआ था यूपीए-1 में। उस समय एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम भी बना था। ध्यान रखें कि वहां भी तीसरा मोर्चा नहीं बना था, सिर्फ साझा कार्यक्रम ही सामने आया था, नीतियों के स्तर पर।

आज की तारीख में भाजपा और कांग्रेस दोनों ताकतों का अपना वजूद है। भाजपा और उसके अगुआ तो पूरे दम-खम के साथ हैं ही, वहीं अब राहुल गांधी को सार्वजनिक मंच पर कोई चाहकर भी पप्पू नहीं बोल सकता है। ऐसी हालत में वैसी किसी नीति के आधार पर तो तीसरा मोर्चा बनने की उम्मीद कहीं से भी नहीं दिख रही है जिसकी चुनौती प्रधानमंत्री दे चुके हैं। अब इस माहौल में क्षेत्रीय पार्टियों का कांग्रेस या भाजपा से मेल एक ही आधार पर हो रहा है और वह है हिस्सेदारी। कुछ पहचान के चिह्नों को छोड़ दें तो नीति के आधार पर उनका कांग्रेस या भाजपा से गहरा अंतर नहीं है। अब यह हिस्सेदारी नीति नहीं संख्या के आधार पर बढ़ेगी। ज्यादातर क्षेत्रीय पार्टियों का मुख्य मकसद येन केन प्रकारेण अपनी सीटों की संख्या बढ़ाना है।

कांग्रेस और भाजपा के बरक्स एक वाम मोर्चा ही था जो नीतियों के स्तर पर क्षेत्रीय दलों या इन दोनों केंद्रीय दलों से समझौता करवा सकता था, लेकिन आज संख्या बल पर वाम का आधार खत्म हो चुका है। याद करें कि देश के पहले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के बाद सबसे ज्यादा सीटें सीपीआइ को मिली थीं। आजादी के बाद देश में पहली गैर कांग्रेसी सरकार भी 1957 में केरल में बनी थी, जिसे नेहरू की अगुआई वाली केंद्रीय सरकार ने बर्खास्त कर दिया था। 2004 के चुनाव के बाद ऐसा भी वक्त आया कि लोकसभा की 53 सीटों पर वाम दलों के प्रतिनिधि बैठे थे। यह वह वक्त था जब मनरेगा जैसी योजना आई जिसे राजग भी खारिज नहीं कर सका।

लेकिन 2014 का आम चुनाव वह मोड़ था जिसने भारतीय राजनीति में वाम मोर्चे का सूपड़ा साफ कर दिया। इस चुनाव के बाद सिर्फ 10 सदस्यों के साथ वाम मोर्चे ने नीतिपरक मोर्चे पर अगुआई की अपनी शक्ति खो दी। पश्चिम बंगाल तो आज ममता बनर्जी का गढ़ है और बस अब सिर्फ केरल में उसका अस्तित्व बचा है। कहीं भाजपा, तो कहीं कांग्रेस मजबूत के गणित के बीच आज संसदीय संख्या बल के आधार पर वाम खत्म है। क्षेत्रीय दलों का भविष्य यही है कि जो जितनी सीटें बढ़वा सकेगा उसी का अस्तित्व बचा रहेगा।

माकपा पोलित ब्यूरो के सदस्य हन्नान मुल्ला ने हाल ही में बयान दिया ‘इस तथ्य से इनकार नहीं है कि संसदीय राजनीति में संख्या एक महत्त्वपूर्ण कारक है। संसद में अभी हमारे पास जो ताकत है, हमारे लिए वह भूमिका निभाना संभव नहीं है। विभिन्न क्षेत्रीय दल अब वह करने का प्रयास कर रहे हैं। राष्ट्रीय राजनीति में समाजवादी पार्टी हमेशा वाम दलों की भरोसेमंद सहयोगी रही है। अतीत में कई मौकों पर वाम ने विपक्षी ताकतों को एकजुट करने में प्रमुख भूमिका निभाई, लेकिन मौजूदा स्थिति में ऐसा करने के लिए संख्या बल नहीं है’। इसी समय सपा उपाध्यक्ष किरणमय नंदा बयान देते हैं, ‘अब वाम दलों की भूमिका महत्त्वहीन और अप्रासंगिक है’।

केंद्रीय बलों में वाम की अनुपस्थिति के बाद अभी तो यही दिख रहा है कि 2019 में नीति के आधार पर कोई मोर्चा नहीं बनेगा। मौजूद सत्ता पक्ष ने जनता के सामने उस महागठबंधन को रख दिया है जो अभी तक बना ही नहीं है। लेकिन यह चुनौती तो सामने आ ही गई है कि विपक्ष के नाम पर साझा मंच पर आते ही आपको बताना होगा कि सिर्फ संख्या बढ़ाने की महत्त्वाकांक्षा के अलावा आपकी नीति क्या है? एक साथ हाथ उठाए नेताओं को जनता को बताना ही होगा कि सीटों की घटत-बढ़त के अलावा आप ऐसा क्या देंगे जो अभी वाले नहीं दे रहे हैं। साल की शुरुआत की इस चुनौती के बाद देखना यह है कि सामने वाले का क्या जवाब होगा। यह साल भारतीय राजनीति की पाठशाला में नया अध्याय जोड़ने वाला है इतनी उम्मीद तो हम राजनीति के विद्यार्थी कर ही सकते हैं।

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