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2019 : पाठ दो

बिना किसी बड़े आंदोलन, सड़कों पर विरोध प्रदर्शन के भारतीय संसद ने सामान्य वर्ग के लोगों के लिए आर्थिक आधार पर दस फीसद आरक्षण के विधेयक को पास कर दिया। इस ऐतिहासिक फैसले का ठीकरा फोड़ा गया तीन राज्यों में भाजपा की हार पर, लेकिन राजद और दक्षिण भारत के कुछ दल छोड़ सभी इस फैसले के साथ खड़े हुए। वह कांग्रेस भी साथ थी, जिसे हिंदी के तीन हृदय प्रदेशों में जीत मिली थी। माकपा जैसे वाम दल ने संसद में इस आरक्षण को वोट दे बाहर आकर बस अलग सा प्रेस नोट ही जारी किया। विरोध के दो ही बिंदु एक तो ऐन लोकसभा चुनाव और शीतकालीन सत्र के अंतिम समय में इसे लाने की अवधि और गरीबी के दायरे में आने वाली आठ लाख से कम सालाना आमदनी की सीमा है। आम चुनावों के पहले साल के दूसरे हफ्ते का पाठ यही है कि रोजगार का संकट सब समझ रहे और समाधान किसी के पास नहीं। समस्या और समाधान के बीच आरक्षण के मरहम पर बेबाक बोल।

राज्यसभा ने 124वें संविधान संशोधन विधेयक को सात के मुकाबले 165 मतों से पारित किया। (RSTV grab via PTI)

आर्थिक आधार पर दस फीसद आरक्षण के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगा दी गई है। गैर सरकारी संगठन ‘यूथ फॉर इक्वलिटी’ ने याचिका में इस विधेयक को निरस्त करने का अनुरोध करते हुए कहा है कि एकमात्र आर्थिक आधार पर आरक्षण नहीं दिया जा सकता और इस विधेयक से संविधान के बुनियादी ढांचे का उल्लंघन होता है क्योंकि सिर्फ सामान्य वर्ग तक ही आर्थिक आधार पर आरक्षण सीमित नहीं किया जा सकता है और 50 फीसद आरक्षण की सीमा लांघी नहीं जा सकती। जातिगत आरक्षण के विरोध की बुनियाद पर बना यह समूह आज उस ऐतिहासिक प्रस्ताव के खिलाफ सुप्रीम अदालत में है जिसमें लगभग सारे दल एक हैं। औपनिवेशिक आजादी के बाद जवाहरलाल नेहरू के अर्द्धरात्रि वाले बच्चे आज फिर एकजुट हैं। आर्थिक आधार पर आरक्षण को लेकर भाजपा, कांग्रेस, बसपा, सपा सब इसे सबका साथ और सबका विकास मान रहे हैं। राज्यसभा ने 124वें संविधान संशोधन विधेयक को सात के मुकाबले 165 मतों से पारित किया, जिसे लोकसभा पहले ही पारित कर चुकी थी।

तुरुप का पत्ता, मास्टर स्ट्रोक शायद इसी को कहते हैं कि वाम दलों ने भी राजग सरकार के इस फैसले के खिलाफ शांति से समर्पण कर अपना गुस्सा प्रेस नोट में जारी कर दिया। माकपा नेता बृंदा करात का एक बयान रहा है, ‘लोकसभा और राज्यसभा की वास्तविक दूरी पांच मिनट की भी नहीं है। लेकिन आठ साल लग गए, राज्यसभा में पारित हुआ महिला आरक्षण बिल लोकसभा नहीं पहुंच पाया है’। इसलिए आरक्षित कोटे से इतर सामान्य गरीब तबकों के लिए इस आरक्षण के प्रस्ताव को लोकसभा और राज्यसभा में इतनी आसानी से पारित होने को भारत के राजनीतिक इतिहास की सबसे बड़ी घटना करार देने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है। सारे दलों को एक ही शिकायत है कि सरकार ने इतना बड़ा फैसला अपने कार्यकाल के आखिरी दिनों में क्यों किया। या, यह संघ के आरक्षण प्रणाली के एजंडे की शुरुआत हो गई है। इसके अलावा किसी का भी इससे कोई वैचारिक मतभेद नहीं है। अगर, यह संघ के वैचारिक एजंडे की शुरुआत है तो फिर माकपा और अन्य वाम दलों के वोट इसके साथ क्यों हैं?

आलोचना की जद में यही है कि अब सरकारी परिभाषा के अनुसार आठ लाख से कम सालाना आमदनी और एक हजार वर्गफुट से कम मकान, पांच एकड़ से कम जमीन और अन्य शर्तों वाला व्यक्ति आर्थिक रूप से कमजोर के दायरे में आएगा। और दूसरा संदर्भ है आम चुनावों से पहले जल्दबाजी का। तीसरा संदर्भ है कि अगर नौवीं अनुसूची में डाला होता तो, खैर उसके लिए तो अदालत में याचिका पहुंच ही गई है। बाकी सब राजी-खुशी इसमें शामिल हैं तो इससे ज्यादा ऐतिहासिक क्या हो सकता था। चुनावों के पहले तुरुप का पत्ता चलाने का चलन नया नहीं है। राजीव गांधी से लेकर वीपी सिंह तक ने यह किया था। सवाल है कि इस पत्ते को निकालने की जरूरत क्यों महसूस हुई।

दलित उत्पीड़न कानून को संशोधित करने की अदालती पहल तभी होती है। यह वह समय था जब नौकरियों पर वर्तमान रोस्टर व्यवस्था को सरकार लागू नहीं करवा पा रही थी और स्थायी नियुक्ति का ढांचा खत्म करने की कवायद को हर तरफ से कबूल है, कबूल है करवाया जा रहा था। इसके पहले बिहार चुनाव का संदर्भ देखिए। 2014 के बाद का विजय रथ रुकते देख वहां जातिगत आरक्षण पर सवाल उठा दिए गए थे। इन सभी संदर्भों को जोड़कर पिछले साल अप्रैल में भारत बंद की अपील होती है। बिना किसी राजनीतिक अगुआई के उत्तर प्रदेश से लेकर मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ तक में इतने बड़े पैमाने पर विरोध होता है जो किसी ने सोचा भी नहीं था। यह विरोध आमने-सामने के संघर्ष में तब्दील होकर हिंसक भी हुआ। इस स्थिति के बाद सरकार अदालती फैसले के खिलाफ अधिसूचना लाती है। इस अधिसूचना के आते ही वह परंपरागत सवर्ण वोटर भाजपा के खिलाफ खड़ा हो गया, जो अब तक उसकी धुरी था। सवर्णों ने भाजपा की अगुआई वाली केंद्र सरकार पर तुष्टीकरण का आरोप लगाया कि अब आप कांग्रेस से अलग कैसे हैं। चुनावी जानकारों का दावा है कि सवर्णों का यह गुस्सा तीन राज्यों में भाजपा की सरकारों को ले डूबा।

तीन राज्यों में चुनाव के बाद के पाठ को भाजपा ने अच्छी तरह पढ़ लिया है। नोटबंदी पर तो अब कुछ किया भी नहीं जा सकता, लेकिन जीएसटी और आरक्षण दो ऐसे क्षेत्र हैं जिन पर सुधारात्मक प्रक्रिया अपनाई गई। जीएसटी भी एक ऐसा फैसला था जिस पर अन्य दलों को सिर्फ जारी करने के तौर-तरीकों से ही दिक्कत थी, लेकिन भाजपा जमीनी सच को पहचान इस पर पाठ सुधार की पूरी कोशिश कर रही है। तीन राज्यों में हार के बाद सुधार कैसे हो यह चिंता सरकार में साफ-साफ दिख रही है। अर्थव्यवस्था में उदारवाद के समर्थक सुधारवादी मौजूदा सरकार की इस मुद्दे पर तो भरपूर तारीफ कर रहे हैं कि इसने उन नीतिगत कठोर फैसलों को बेहिचक लागू किया जो कांग्रेस अपने कार्यकाल में लागू नहीं कर सकी थी। सरकार की ज्यादातर योजनाओं पर कांग्रेसी नेताओं का यही बयान होता है कि यह तो हमारे दिमाग की उपज थी। आज जब केंद्र्र सरकार यह ऐतिहासिक फैसला पारित करवा चुकी है तो कांग्रेस, सपा और बसपा के पास हम साथ-साथ हैं कहने के अलावा कुछ नहीं बचता है। सपा और बसपा जैसे दलों के नेताओं के पास मौजूदा सरकार पर संविधान विरोधी होने के आरोप लगाने के विकल्प भी खत्म कर दिए गए हैं।

पांच साल में तीन महीने कम की अवधि में हमने यह तो देख लिया कि मौजूदा सरकार भी रोजगार कहां से लाएं के संकट से जूझती रही। अब जहां नौकरियां ही गायब हों वहां इस दस फीसद का क्या औचित्य है? निजी क्षेत्र को भी इसके दायरे में लाया जाता तो कोई बात होती। पिछले दो दशकों में सरकारी नौकरियों में लगातार कटौती की जा रही है। अनुदान आधारित शैक्षणिक संस्थाओं को कर्ज आधारित संस्थाएं बनाया जा रहा है। निजीकरण सच है और स्वीकार्य है तो बिना निजी क्षेत्रों को जद में लाए इस दस फीसद आरक्षण का लाभ किसे मिलने वाला है। अगर सरकारी क्षेत्र में भरपूर नौकरियां होतीं तो सरकार का यह फैसला आज हर पान की दुकान और गांव की चौपालों पर गूंज रहा होता। पर जमीनी स्तर पर आम लोगों की चुप्पी ही दिख रही है।

तीन राज्यों में हार के बाद सरकार का सुधार और आम लोगों की चुप्पी। सरकार के नुमाइंदों और आम लोगों को भी पता है कि यह वैसा गंभीर प्रयास नहीं है जो कोई जमीनी बदलाव ला पाएगा। इस फैसले का सकारात्मक पक्ष यह है कि सरकार अपनी हताशा और निराशा से उबरने की जद्दोजहद करती दिखाई दे रही है। ‘आरक्षण भगाओ देश बचाओ’ का नारा लगाने वाले भी अब ज्यादा से ज्यादा नौकरियां लाने का ही नारा लगाने के लिए मजबूर होंगे। इस फैसले के बाद एक सामूहिक आवाज तो उभर ही गई है कि नौकरियां कहां हैं? साल के दूसरे हफ्ते का पाठ यही कि विमर्श में नौकरी है। रोजगार पर बात निकली है तो दूर तलक जाएगी।

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