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बेबाक बोल: पानी बीच मीन प्यासी

अब जनता की बात हो रही है तो स्तंभ का समापन भी चुटकुले से। एक गांव का आदमी मुंबई के समुद्र तट पर खड़ा होकर कौवों को देख रहा था। तभी एक आदमी ने कहा कि लगता है मुंबई में नए आए हो इसलिए कौवों को देख रहे हो।

सनी देओल नामांकन से पहले एक कार्यक्रम में अपने भाई बॉबी देओल के साथ। (PTI Photo)

सोशल मीडिया पर व्यंग्य
एक आदमी शहर में घूमते हुए दूसरे आदमी से टकराया। दूसरे आदमी ने उससे पूछा, भाई साहब क्या आपको पता है कि इस शहर में सूरज किधर से उगता है। दूसरे आदमी ने कहा, मैं कैसे बता सकता हूं, अभी तो इस शहर में नया हूं।
चुनावी मैदान का सच

पत्रकार : आपको लगता है बालाकोट स्ट्राइक से देश को कुछ फायदा हुआ है?सन्नी देओल : क्या स्ट्राइक? कौन स्ट्राइक? मुझे इन चीजों के बारे में कुछ खबर नहीं है। मैं यहां आया हूं। लड़ने आया हूं और मैं चाहता हूं जीत जाऊं। फिर आपसे जुड़ूंगा तो इन सब चीजों पर बातें करूंगा। फिलहाल मैं यही चाहता हूं कि मैं जीत जाऊं और अपने देश की सेवा करूं।

टीवी पत्रकार : भारत ने 1971 में पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिए थे और नए देश बांग्लादेश का निर्माण किया था।
हंसराज हंस : अच्छा! मैं उस वक्त बहुत छोटा था और मुझे उसके बारे में कुछ याद नहीं।

2019 का चुनावी पाठ राजनीति और समाज-शास्त्र की पुस्तकों के लिए कितनी अहमियत रखेगा यह तो मालूम ही है लेकिन चुनावी मैदान में उतरे दिग्गजों के बयानों से चुटकुलों की एक किताब जरूर तैयार हो जाएगी। गुरदासपुर पंजाब की पहचान है और सिनेमाई पर्दे ने सन्नी देओल को ‘पंजाब दे पुत्तर’ की पहचान दे रखी है। इसी सिनेमाई पहचान को सच मान और हिंदी फिल्मों में उनकी देशभक्ति से प्रभावित हो उन्हें चुनावी टिकट भी दे दिया जाता है। लेकिन जब चुनावी सभा में उन्हें गुरुमुखी लिपि में लिखा पढ़ने को दिया जाता है तो वो साफ कहते हैं कि उन्हें पंजाबी बोलनी आती है, पंजाबी पढ़ नहीं पाते हैं।

हंसराज हंस की सूफियाना आवाज वोट लेने में कितनी मददगार होगी पता नहीं, लेकिन टीवी चैनल पर वे तर्क देते हैं कि वे बहुत छोटे थे इसलिए उन्हें 1971 के भारत-पाकिस्तान की जंग और बांग्लादेश के जन्म के बारे में पता नहीं। वैसे विभिन्न स्रोत बताते हैं कि उनकी उम्र 57 साल है। सन्नी देओल की सौतेली मां हेमा मालिनी मथुरा में चुनाव प्रचार के दौरान फसल काटती दिखती हैं और उनकी खेतों में काम करती वायरल तस्वीर का मजाक भी उड़ता है। इस पर हेमा मालिनी बहुत ईमानदारी से कहती हैं कि वो तो उन्होंने फसल काटने का अभिनय किया था, जीतने के बाद फसल काटना सीखेंगी।

यह तो शुक्र है कि सन्नी देओल और हेमा मालिनी एक ही पार्टी के हैं। असली समानांतर सिनेमा तो उत्तर प्रदेश के लखनऊ में दिखा। भाजपा के शत्रु बने खामोश वाले सिन्हा को कांग्रेस अपना टिकट देती है। उनकी पत्नी पूनम सिन्हा को समाजवादी पार्टी और बसपा का गठबंधन लखनऊ से राजनाथ सिंह की टक्कर का मान टिकट देता है। अब पूर्व भाजपाई और वर्तमान कांग्रेसी उम्मीदवार, शत्रुघ्न सिन्हा लखनऊ में अपनी पत्नी पूनम सिन्हा के लिए प्रचार करने के लिए जाते हैं और कहते हैं कि कांग्रेस नेतृत्व को इससे कोई परेशानी नहीं है।

इस स्तंभ में हम पहले भी उस हालात का जिक्र कर चुके हैं जब हेमवती नंदन बहुगुणा जैसे जमीनी नेता को हराने के लिए कांग्रेस ने अमिताभ बच्चन को टिकट दिया और पर्दे के नायक के सामने जमीनी नायक टिक नहीं पाया। भारतीय राजनीति में फिल्मी सितारों का जलवा हमेशा रहा है। इसके पहले यह भी था कि कला के चेहरे इक्का-दुक्का रहते थे। लेकिन इस बार जिस तरह से पर्दे और मंच के नामदारों को तवज्जो दी गई है वहां कामदारों के लिए सवाल तो उठ ही रहा है।

ये नामदार बस एक ही जुमले के साथ आते हैं, हमें तो जीतना है। जीतने के बाद फसल काटना भी सीख लेंगे और बालाकोट के बारे में भी सामान्य ज्ञान अर्जित कर लेंगे। फिलहाल तो हमें जीतना है। यहां सवाल उठता है कि वह कौन सी वजह है कि राजनीतिक पार्टियां इन नामदारों को अपने पाले में खींचने के लिए लालायित रहती हैं। पिछले दिनों पूर्वी दिल्ली में बतौर घरेलू सहायिका काम करने वाली एक लड़की से पूछा, प्रियंका गांधी के बारे में कुछ जानती हो। उसने सूनी आंखों से अनभिज्ञता जताते हुए न में सिर हिला दिया। फिर पूछा कि प्रियंका चोपड़ा के बारे में क्या जानती हो? अब उसकी आंखों में चमक थी और होठों पर फूटता हुआ जवाब था, देसी गर्ल… निक जो… से शादी की है…वो उमर में प्रियंका से बहुत छोटा है। उसकी तो सारी फिल्में टीवी पर देखी हैं।

कमजोर आर्थिक तबके की उस लड़की की आंखों में प्रियंका गांधी के नाम से चमक क्यों नहीं आई? अगर वह प्रियंका गांधी के बारे में थोड़ा-बहुत जानती भी है तो उसके बारे में बात करना पसंद क्यों नहीं किया? इसका जवाब प्रियंका गांधी ही बहुत पहले दे चुकी हैं कि मैं तो बरसाती मेढ़क हूं। हमारे देश में जैसे-जैसे लोकतंत्र की उम्र बढ़ रही है वैसे-वैसे वह लोक से दूर हो रहा है। चुनाव जीतने वाले ज्यादातर नेता अपने संसदीय क्षेत्र से गायब रहते हैं क्योंकि सबने मिलकर खुद को जिताने और हराने की खास व्यवस्था कर ली है। इसमें ज्यादातर राजनीतिक दल मिले हुए हैं। चुनाव अब काम नहीं धन-बल, जाति और भेदभाव की लड़ाई पर जीता जा रहा है। जनता को इस हालात के आगे समर्पण करने का प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है।

चुनाव जीतने के बाद नेता गायब हो जाते हैं और टीवी से लेकर मोबाइल पर सालों भर अभिनेता कायम रहते हैं। वह अभिनेता पर्दे पर एक झटके में पाकिस्तान को सबक भी सिखा देता है तो नेता और माफिया के आगे ‘सिंघम’ भी बन जाता है। रुमानी गीतों और हसीन लोकेशन में थोड़ी देर अपना दुख तो भूल जाती है आम जनता। बॉलीवुड की फिल्में अभी तक काल्पनिकता में होती हैं इसलिए वहां बुराई पर अच्छाई की जीत के साथ समापन होता है। इसलिए साल भर अपने आस-पास प्रियंका चोपड़ा को देखने वाली कमजोर तबके की लड़की उसी पर्दे वाले सपने को वोट देना पसंद करने लगती है।

लेकिन पर्दे वाला हसीन सपना जल्दी टूट भी जाता है और जनता हीरो को जीरो बनाने में देर नहीं लगाती। कभी खुद को सरकार का चम्मच बोलकर गर्व करने वाले अनुपम खेर को चंडीगढ़ के मतदाता ने ऐसा शर्मसार किया कि उन्हें पता चला होगा कि बिना पटकथा के नायक बनना कितना मुश्किल है। चंडीगढ़ में किरण खेर के लिए वोट मांगने के लिए जब उनके पति एक दुकान में पहुंचे तो दुकानदार ने 2014 का घोषणापत्र सामने रख कर पूछ दिया कि इनमें से कौन सा वादा पूरा किया है। चंडीगढ़ के इस जागरूक मतदाता का वीडियो जितनी तेजी से सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, वह बताता है कि अभिनेता जी हों या नेताजी असली मुद्दे पर तो आना ही होगा।

अब जनता की बात हो रही है तो स्तंभ का समापन भी चुटकुले से। एक गांव का आदमी मुंबई के समुद्र तट पर खड़ा होकर कौवों को देख रहा था। तभी एक आदमी ने कहा कि लगता है मुंबई में नए आए हो इसलिए कौवों को देख रहे हो। ग्रामीण आदमी के हां कहने पर उसने कहा कि जितने कौए देखे उस हिसाब से दस रुपए दो। आदमी ने उसे तीस रुपए दिए, और अपने गांव में फोन कर अपनी पत्नी को बताया कि आज मैंने सत्तर रुपए बचा लिए क्योंकि मैंने देखे तो दस कौए थे। चुटकुले में मूर्खता की गाथा होती है। नेता और अभिनेता तो जनता को बहुत मूर्ख बना चुके और अब गेंद जनता के पाले में है। देखते हैं 23 मई को कि जनता ने कितने कौए देखे। जनता मूर्ख बनी कि नेताओं की अक्ल ठिकाने आई। लेकिन इस बार का चुनावी पाठ यही कह रहा-यह राजनीति का प्रहसन काल है।

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