ताज़ा खबर
 

बेबाक बोल: 2019

आनेवाला साल 2019 है। नाम में क्या रखा है की तर्ज पर साल में क्या रखा है का भी सवाल किया जा सकता है। लेकिन कैलेंडरी रस्मअदायगी के अपने मायने हैं। भारतीय राज और समाज में आनेवाले नए साल पर तो पांच साल के हिसाब-किताब का बोझ है। पिछले आम चुनाव के बाद 2014 से ही 2019 का नारा गूंजने लगा था। नए साल की दहलीज पर कैलेंडर बदलने के पहले भारतीय राजनीति का कथ्य बदल रहा है। भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों के अस्तित्व और विकल्प की शुरुआत ही कांग्रेस विरोधी नारे के साथ हुई थी और उत्तर से लेकर दक्षिण तक के क्षेत्रीय दल भाजपा के विजय रथ से घबराए हुए दिख रहे थे। वहीं आज स्टालिन जैसे नेता कांग्रेस अध्यक्ष के जयकारे लगा रहे हैं। ओड़ीशा और पश्चिम बंगाल जैसे क्षेत्रीय दलों की अगुआई वाले राज्यों के लिए अब कांग्रेस नहीं भाजपा की चुनौती है। पिछले साल के दिसंबर से लेकर अलविदा कह रहे इस दिसंबर तक बदले राजकाज पर बेबाक बोल।

तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर (फाइल)

‘देखिए पाते हैं उश्शाक बुतों से क्या फैज
इक बरहमन ने कहा है कि ये साल अच्छा है…’
गालिब की पुरानी दिल्ली से चंद किलोमीटर की दूरी पर नई दिल्ली के सत्ता के गलियारे में फुटपाथ पर कटिंग चाय पीते हुए उसकी आवाज आई, ‘सरजी, ये चुनाव पांच साल में क्यों होते हैं’। उत्तर प्रदेश से लेकर छत्तीसगढ़ तक जनता रूपी चाणक्य से मात खाए हम जैसे राजनीतिक टिप्पणीकार सजग हो गए और उससे पूछा कि क्यों पांच साल में नहीं होने चाहिए? उसने कहा, सरजी, चुनाव हर साल होने चाहिए तभी तो हम किसानों की भी बात हो जाती है। चलो आनेवाला साल तो हमारे लिए अच्छा रहेगा।

आनेवाले साल की भविष्यवाणी ‘बरहमन’ नहीं एक किसान कर रहा था। गालिब के जमाने में भविष्यवाणी करने वाले ‘बरहमन’ भारत यात्रा पर आए गूगल अधिकारी के हाथ के पोस्टर को देख अपने कथित भविष्य को लेकर घबराए हुए थे। वहीं किसान एलान कर गया कि बात तो हमसे ही शुरू होनी है।
आनेवाला साल 2019 है। इस साल का अंत अगले साल का आगाज है। भारतीय राजनीति में अहम होनेवाला साल। यह साल बीत रहा है हिंदी पट्टी के तीन हृदयप्रदेशों के संदेश के साथ। इस साल के अंत में कितना कुछ बदल गया। जीत के तीन ताज पहन कर कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि हमने सीखा कि हमें क्या नहीं करना चाहिए। राजस्थान में नई सत्ता के मंच पर बुआ विपक्षी दल के अपने भतीजे को गले लगाती हैं। मध्य प्रदेश में भूतपूर्व हुए नेता वर्तमान मुख्यमंत्री के साथ हंसते हुए ऐसे मिले जैसे कभी एक-दूसरे के खिलाफ कुछ बोला ही न हो।

नवउदारवाद का राजमार्ग तैयार करने वाली कांग्रेस के अध्यक्ष के ट्वीट वाम और अवाम की राजनीति करने वाले रीट्वीट कर रहे हैं। कांग्रेस अध्यक्ष कह रहे हैं कि दस दिनों में कर्ज चुकाने का वादा दो दिनों में पूरा कर दिया। छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार में जो जेल भेजे गए, वह नई सरकार में सम्मान के पद पर हैं। कल तक भाजपा समर्थकों को भक्त कहकर चिढ़ाने वाले इस तरह कांग्रेसी भगत बन गए हैं कि कमलनाथ के यूपी-बिहार के लोगों के मध्य प्रदेश की नौकरी खाने वाले बयान को जायज ठहराने में भी कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। कल तक ‘मौन’ रहने के आरोपी आज अपनी पूरी किताब और उसी पुरानी उम्मीद के साथ नए साल के मंच पर मौजूद हैं कि इतिहास उनके साथ इंसाफ करेगा।

तीन राज्यों के नतीजों के बाद आम आदमी पार्टी के अगुआ ट्वीट करते हैं कि भाजपा राज की उलटी गिनती शुरू हो गई है। लेकिन, आनेवाला 2019 उनसे 2014 का हवाला देकर पूछ रहा है कि आप क्यों खुश हो रहे हैं। जनता ने उसी कांग्रेस को चुना है जिसके भ्रष्टाचार के खिलाफ आप ट्रकों में सबूत लेकर रामलीला मैदान में घूम रहे थे, लेकिन उन सबूतों को अदालतों तक पहुंचाने वाला कोई नहीं मिला। टूजी से लेकर कोयला घोटाले पर जजों से जिरह करने वाले इतने कमजोर थे कि आज कांग्रेस मजबूती से वापसी कर रही है। वैसे हम आज तक समझ नहीं पाए कि ‘आप’ चाहते क्या हैं। आपके एक नेता की पहचान सिर्फ इतनी है कि उन्होंने पूर्व वित्त मंत्री पर जूता फेंका था। आज उसी पहचान की राजनीति और पंजाब में वोट जुगाड़ने की खातिर ‘राजीव चौक’ के नाम पर कालिख पोती जा रही है। आज के दौर में बस विभिन्न पहचानों को विकल्प का नाम देने को क्या बताएं, ये तेरा दीवानापन है या सत्ता से मोहब्बत का कुसूर…। और अगर कांग्रेस जीत रही है तो फिर आपका क्या काम? कांग्रेस वापस आ गई और भाजपा तो मजबूत है ही। जंग तो इन दोनों का विकल्प बनने की थी। दिल्ली से बाहर आमने-आमने वही भाजपा और कांग्रेस हैं और 2014 वाले विकल्प की जमानत जब्त हो रही है।

कैलेंडर की तरह राजनीति के पन्ने भी बदल रहे हैं। कल जीएसटी पर जब विपक्षी नेता ने ट्वीट किया था कि इतने सारे स्लैब क्यों तो सत्ता वाले मंत्री जी ने उनका मजाक उड़ाया था। तकाजा था कि भारत बहुरंगी विविधताओं का देश है, एक जैसा कर कैसे लग सकता है। आज साल के अंत में उनका ट्विटर खाता अलग-अलग करों को कम कर एक ढांचे की वकालत करता है तो उनका मजाक उड़ता है। कल तक मजाक उड़ाया जा रहा था कि मर्सडीज से लेकर नमक तक एक कर कैसे हो सकता है और आज मामला उलट है।

यह गुजरता साल राजनीति के कथ्य का कैलेंडर भी बदल रहा है। एक दौर था जब सारी क्षेत्रीय पार्टियां कांग्रेस के खिलाफ बने माहौल का उत्पाद थीं। चाहे वह समाजवादी आंदोलन से उभरा हो या किसी और मंच पर, लेकिन मूल में कांग्रेस विरोध ही था। आज के दौर में भाजपा के विजय रथ को देख उत्तर के क्षेत्रीय क्षत्रप से लेकर दक्षिण के स्टालिन तक कांग्रेस के हाथ पर ही अपना साथ रख रहे हैं। ओड़ीशा और बंगाल दो ऐसे राज्य हैं जहां अभी तक 2014 वाला विजय रथ नहीं पहुंच पाया है। इन दोनों राज्यों में मुख्य विचारधारा रही है कांग्रेस विरोध की। लेकिन आज इनके लिए कांग्रेस नहीं भाजपा खतरा है।

2019 का राजनीतिक कैलेंडर तैयार होते ही सबसे पहले मौसम बदला बिहार में। मौसम का पूर्वानुमान देख एक राजनीतिक वैज्ञानिक को याद आई नोटबंदी की। इनकी पूर्वानुमान की क्षमता इतनी तेज है कि ये हर सत्ता के मंत्रिमंडल में पैठ बना लेते हैं। वैसे मनमुताबिक सीटें मिलते ही नोटबंदी के नतीजों को भूल अपने नतीजों की गणना करने के लिए गठबंधन की वेधशाला में अपनी जगह बना ली। एक वैज्ञानिक को अचानक से याद आया कि साढ़े चार साल तक सामाजिक न्याय में कमी रह गई और वे यूपीए का हिस्सा हो गए। वैसे, राज्य के मुखिया ने ही सबसे पहले डर जताया था कि सामने वाले से कोई जीत नहीं सकता। अब इनके डर के आगे मनमुताबिक सीटों की जीत है।

2019 एक ऐसा साल है जिसकी गूंज मई 2014 के बाद से ही सुनाई देने लगी थी। इन पांच सालों में देश ने सिर्फ चुनाव ही चुनाव देखा। पांचवें साल की दहलीज पर हम उस कैलेंडर को देख रहे हैं जहां पूरी राजनीति का कथ्य बदला हुआ है। मध्यवर्गीय राजनीति वाले देश के राजनीतिक कथानक के केंद्र में किसान आ चुका है।
2014 से लेकर 2019 के प्रवेश तक हिंदी पट्टी में जो जुमला सबसे ज्यादा उभरा वह है चाणक्य का। उत्तर का चाणक्य, दक्षिण का चाणक्य, बड़े से लेकर छोटा चाणक्य। आने वाला साल इसी चाणक्य शब्द की बीज व्याख्या करेगा। कथ्य में किसान आ तो गए हैं लेकिन उनकी बुनियादी समस्याओं से टकराने के साथ आपको उस बुनियाद से भी टकराना होगा जो 90 के दशक में रखी गई थी। उदारीकरण के राजमार्ग पर आपने खेत और किसानों के लिए कोई मोड़ या कटाव बनाया ही नहीं। कर्जमाफी का वास्तविकता से अधिक मूल्यांकन कर बुनियाद पर अभी भी चुप्पी सधी है। देखना है कि 2018 में किए आपके ट्वीट, 2019 में रीट्वीट होकर नए हास्य का हिस्सा न बन जाएं। चाणक्य लाखों, करोड़ों की शक्ल में सबके सामने है और वह है 2019 की जनता। देश के राज और समाज के लिए रोचक होने वाले नए साल की शुभकामनाएं। नए साल के अंत में फिर बात करने की उम्मीद है। तब तक तो…
‘यकुम जनवरी है, नया साल है
दिसंबर में पूछूंगा क्या हाल है!’

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App