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बेबाक बोल: शाही पैमाना

भाजपा की बहार का मौसम शहर-शहर गांव-गांव में बन उठे शाहीन बाग में पतझड़ की याद दिला रहा है।

भाजपा को नड्डा के रूप में एक साफ छवि का अनुभवी चेहरा मिला है।

भाजपा अध्यक्ष के रूप में जेपी नड्डा को वह विरासत मिली है जिसे कई बार आधुनिक चाणक्य की उपमा दी गई। शाह के छह साल के कार्यकाल में भाजपा उत्तर प्रदेश में ऐतिहासिक आंकड़ों के साथ बंगाल के अभेद्य किले को तोड़ सकी। संगठनात्मक स्तर पर बूथ प्रमुख से लेकर जिला स्तर पर पार्टी दफ्तर खोले गए और दावा है कि आज भाजपा के 18 करोड़ सदस्य हैं। अब जो भी भाजपा की कमान संभालेगा उसके काम का पैमाना अमित शाह ही होंगे। फिलहाल नड्डा के सामने सबसे बड़ी चुनौती उन क्षेत्रों से है जहां चुनावों में पार्टी को कड़ा संदेश मिला। उन्हें हिंदी पट्टी में संगठनात्मक ढांचे पर ध्यान देना होगा। नागरिकता संशोधन कानून का विरोध एक ऐसा साझा मंच बन गया है जहां बेरोजगारी पर चर्चा से लेकर कश्मीरी पंडितों के असंतोष की पंजिका भी तैयार हो रही है। पूर्ण बहुमत वाले पांच साल का मधुमास बीतने के बाद दूसरी बार पहले ही छह महीने में सरकार को मिले कड़े संदेशों के बीच नए भाजपा अध्यक्ष की चुनौतियों पर बेबाक बोल।

अमित शाह जी ने अपने संबोधन में कहा है कि अभी भाजपा का उत्कर्ष पर पहुंचना बाकी है। प्रधानमंत्री जी ने भी कहा कि अभी पार्टी को बहुत आगे ले जाना है। हम भाजपा को उत्कर्ष की स्थिति में ले जाएंगे। हम सिर्फ नीतियों में अलग नहीं हैं, उनके नतीजे भी अलग हैं, यह समझना चाहिए। मेरी राजनीति में कोई पारिवारिक पृष्ठभूमि नहीं रही। हिमाचल प्रदेश के एक सुदूर गांव से आकर इतनी बड़ी जिम्मेदारी मिलती है तो यह सिर्फ भाजपा में संभव है’।
भाजपा अध्यक्ष का पदभार ग्रहण करने के बाद अपने पहले भाषण में जयप्रकाश नड्डा ने अपनी चुनौतियां सामने रख दी हैं। नड्डा की पहली चुनौती वही हैं जिनके वे उत्तराधिकारी बने। अमित शाह, 2014 के बाद यह नाम भारतीय राजनीति में ‘चाणक्य’ के नाम से जाना जाने लगा।

आज दावा किया जा रहा है कि भारतीय जनता पार्टी के सदस्यों की संख्या 18 करोड़ पहुंच चुकी है। यह बहुत बड़ी संख्या है। भारतीय राजनीति के इतिहास में आजादी के बाद किसी भी पार्टी का संगठनात्मक हिस्सा इतनी ऊंचाई पर नहीं पहुंचा था। जिस कांग्रेस को 70 साल का ताना मारा जाता रहा है उसने अपने संगठन पर ध्यान देना कब का छोड़ दिया था और उसका नतीजा आज सबके सामने हैं। अठारह करोड़ वह संख्या है जो ग्लोब पर बहुत से देशों की कुल जनसंख्या है। इस संख्या के साथ नड्डा को भारतीय जनता पार्टी का भविष्य रचना है जो अभी स्वर्णकाल में है। इतिहास के पन्नों पर स्वर्णकाल कई तरह की विडंबनाओं को दर्ज किए हुए है। स्वर्णकाल को चरम स्थिति माना जाता है। चुनौती यह होती है कि एक बार अर्श पर पहुंचने के बाद आप फर्श को कैसे देख रहे हैं। तीन राज्यों के चुनावी नतीजों के बाद भाजपा को फर्श पर देखने की सख्त जरूरत थी।

अमित शाह ने अपने नेतृत्व में नई भारतीय जनता पार्टी को खड़ा किया। जब अमित शाह उत्तर प्रदेश की सड़कों पर भाजपा कार्यकर्ताओं के साथ गुजरते थे तो लोग सवाल उठाते थे कि क्या गुजरात से आए इस नेता को हिंदी पट्टी की समझ होगी? इस सवाल का जवाब नतीजों के रूप में बोला कि उत्तर प्रदेश विधानसभा में भाजपा को 312 सीटें मिलीं जो प्रदेश के चालीस साल के इतिहास में अनोखा था।

उत्तर प्रदेश के बाद अमित शाह भाजपा को पश्चिम बंगाल तक पहुंचाने में कामयाब हुए और वहां 18 लोकसभा सीटों पर भगवा लहराया। वाम के लाल किले को ढहाने वालीं ममता बनर्जी के मजबूत किले को तोड़ना बहुत आसान नहीं था। पश्चिम बंगाल की राजनीति सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक मायनों में अहमियत रखती है। यह वह मिट्टी है जहां सबसे पहले नवजागरण आया था और यह अपनी खास सांस्कृतिक व राजनीतिक पहचान के साथ जाना जाता है। जय श्रीराम के नारे वाली पार्टी को मां, माटी और मानुष वाले राज्य में स्थापित करना शाह के कंधों पर एक चमकता सितारा तो है ही। बंगाल में भाजपा को स्थापित करने के साथ ही शाह ने वामपंथी राज के लाल गढ़ त्रिपुरा में भी भगवा झंडा लहरा दिया। अपने नेतृत्व में क्षेत्रीय क्षत्रपों के साथ तालमेल बिठा कर 21 राज्यों तक में भाजपा की भागीदारी लाने वाले शाह का ताज जब नड्डा के सिर पर आया है तो यह चुनौती अब और कड़ी हो चुकी है।

भारत जैसे विशालकाय बहुलतावादी देश के 21 राज्यों में शासन की भागीदारी हासिल करना आसान नहीं था। लेकिन अब सबसे मुश्किल है इस जलवे को बरकरार रखना। शाह ने जिस तरह से जमीनी स्तर पर काम शुरू किया वह भाजपा के खाते में अहम अध्याय है। बूथ स्तरों पर काम करना, जिला स्तर पर पार्टी का दफ्तर खुलवाना, सांगठनिक ढांचे को लेकर पूरे देश की यात्रा कर कार्यकर्ताओं से मिलना। शाह ने भाजपा के कार्यकर्ताओं को चुनाव लड़ना सिखाया। इसका असर हुआ कि स्थानीय चुनावों को भी राष्टÑीय स्तर के चुनाव की तरह लड़ा जाने लगा। चुनाव के बाद नतीजे जो आएं लेकिन चुनाव के पहले भाजपा के उम्मीदवार व कार्यकर्ता जीत व सिर्फ जीत के लिए लड़ते दिखने लगे। बहुत बार तो जनता ने इनकी नीति नहीं नीयत देख कर वोट दिया कि ये वोट मांग रहे हैं, जीतना चाहते हैं, सत्ता में आना चाहते हैं। पांच सालों के अंदर भाजपा में ऐसे चुनावी लड़ाके तैयार हुए जिसे राजनीति की भाषा में काडर बोलते हैं। आज भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़े काडर वाली पार्टी है।

अब भाजपा की कमान ऐसे व्यक्ति के हाथ में आई है जो उस कथित गुजरात मॉडल के घेरे से बाहर का है जिसे लेकर सवाल उठते रहे हैं। सांगठिनक स्तर पर हिंदी पट्टी की उपेक्षा की बात हो रही थी और अब लग रहा है कि पार्टी इस ओर पूरी तरह तवज्जो देना चाहती है। बृहत हिंदी पट्टी को सांगठनिक ढांचे में लाए बिना भाजपा अपनी चमक बरकरार नहीं रख सकती है। आगे आने वाले समय में रोजी-रोटी के मुद्दों से लेकर राजनीतिक फैसलों से भी कड़ी चुनौती यहीं से मिलने वाली है।

केंद्र में सत्ता का भाजपा का दूसरा कार्यकाल शुरू होते ही हरियाणा, महाराष्टÑ और झारखंड से पार्टी को कड़े संदेश मिले। पिछले लंबे समय से भाजपा ने मजबूत राजनीतिक फैसले कर जो उग्र राजनीति शुरू की है उसका बचाव करते हुए अब उसे आर्थिक मोर्चे पर भी जूझना है। वैश्विक मंदी का बहाना काम नहीं आने वाला है। भाजपा के दावा किए जा रहे 18 करोड़ सदस्य भी इससे प्रभावित हो रहे हैं, और जैसा कि कहा जा रहा है कि यह किसी देश की जनसंख्या के बराबर है तो अपनों के बीच भी यह कितनी बड़ी चुनौती है इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।

अभी पार्टी और सरकार पर चारों तरफ से दबाव है। सरकार का पूरा ध्यान एनआरसी और सीएए को लेकर उठे विरोध प्रदर्शन पर है। पांच साल के शासन के बाद मधुमास का समय बीत चुका है और भाजपा की बहार का मौसम शहर-शहर गांव-गांव में बन उठे शाहीन बाग में पतझड़ की याद दिला रहा है। नागरिकता संशोधन कानून पर उठे विरोध ने तीन तलाक और अनुच्छेद 370 के खात्मे जैसे मजबूत फैसलों को नेपथ्य में भेज दिया है। नागरिकता कानून संशोधन एक ऐसा फोल्डर बन गया है जिसमें नागरिक असंतोष की सभी फाइल एक साथ जमा हो रही हैं। बेरोजगारी पर चर्चा से लेकर कश्मीरी पंडितों के असंतोष की पंजिका तैयार हो रही है।

नड्डा की पृष्ठभूमि संघ की रही है और उन्हें जमीन से जुड़ा व्यक्ति माना जाता है। उनके जरिए संघ भी अपने सांगठनिक ढांचे की कदमताल भाजपा के साथ करने की कोशिश करेगा। संघ और भाजपा की साझा समझ और शक्ति ही है जो आज पार्टी इस मुकाम पर पहुंची है।

वाम और दक्षिण दोनों दलों की खासियत है कि इसमें व्यक्ति से ज्यादा अहमियत संगठन की होती है। संगठन ही केंद्र में होता है। लगातार एक व्यक्ति, एक पद को संभालता है तो उसका सबसे ज्यादा नुकसान संगठन को होता है। अच्छी बात है कि गृह मंत्री ने एक व्यक्ति एक पद का ध्यान रखा। जेपी नड्डा के अध्यक्ष पद के चयन के बहाने एक पार्टी के तौर पर भाजपा का लोकतांत्रिक चेहरा सामने आया है। खास कर जब मुख्य विपक्षी कांग्रेस से लेकर कई क्षेत्रीय दलों में पार्टी अध्यक्ष पद पर भी वंशवाद और भाई-भतीजावाद हावी है तो भाजपा के नए अध्यक्ष नड्डा अपनी अलग छाप छोड़ते हैं। जब नड्डा कहते हैं कि यह भाजपा जैसी पार्टी में ही संभव हो सकता था कि मैं अध्यक्ष पद पर पहुंचा तो इसके अपने मायने हैं।

भाजपा को नड्डा के रूप में एक साफ छवि का अनुभवी चेहरा मिला है। भारतीय जनता पार्टी अपने उम्मीदों भरे सफर को इनकी अगुआई में कैसे जारी रखेगी यह देखना होगा। लेकिन यह तय है कि आगे आने वाली चुनौतियां कितनी भी अलग हों लेकिन उनके काम को शाही पैमाने से ही नापा जाएगा।

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