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बेबाक बोल: जो जीता वही नरेंद्र

उम्मीद है कि लोगों के इस अटल विश्वास को मोदी उतनी ही सहृदयता से सहेज कर रखेंगे जैसा उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के मुख्यालय में कहा कि जीत को विनम्रता से स्वीकारना होगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। (फोटो सोर्स- @ solanki.sohan instagram)

जो जीता वही नरेंद्र…। सोशल मीडिया का यह नया नारा है। इसी में है विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में मोदी की महाविजय का सार। जीत का जलवा ऐसा कि मुहावरा बन गया और वह भी सदियों पुराने एक मुहावरे को तोड़ कर। ऐसा पहली बार नहीं हुआ कि मोदी के विजय अभियान के दौरान मुहावरों की शक्ल बदल गई हो या मौके के मुहावरे गढ़ लिए गए हों। याद है कि पहली बार ऐसा 2014 में हरियाणा में हुआ जहां लोकसभा और विधानसभा के चुनावों में कुछ महीनों का अंतराल था। मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा लगातार दो कार्यकाल के बाद उत्साहित थे कि दोनों चुनाव साथ-साथ ही हो जाएं। लेकिन 2014 में मोदी लहर साफ दिख रही थी। लिहाजा पार्टी परेशान थी कि कहीं दोनों ही चुनाव हाथ से न निकल जाएं। यहीं से एक नारा बुलंद हुआ, ‘नीचे भूपिंदर, ऊपर नरिंदर’। हरियाणा के लोगों ने अपनी बोली के हिसाब से उच्चारण भी तय कर दिया। राजस्थान विधानसभा चुनाव में उसकी गूंज कुछ इस तरह सुनाई दी- ‘मोदी तुझसे बैर नहीं, वसुंधरा तेरी खैर नहीं’।

इस लोकसभा चुनाव के बाद मोदी एक महानायक की तरह उभरे हैं। उनके धुर विरोधी भी सामने आकर खुद के गलत होने को कुबूल रहे हैं। कहीं कोई झंझट नहीं। न ईवीएम का, न ही जबरन कब्जे का। बस हर तरफ विजय गान। विरोधी एक बात में सच साबित हुए कि मोदी पार्टी से भी बड़े हो गए हैं। राजनीतिक पार्टियों को अपनी ऐसी साख बनाने में बरसों लग जाते हैं। वे इस हद तक जनता जनार्दन का विश्वास नहीं जीत पाते, लेकिन मोदी ने अपने पांच वर्ष के कार्यकाल में यह कर दिखाया। उन्होंने इन वर्षों में जनता का विश्वास जीता है। लोग देश की राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक या कैसी भी स्थिति के लिए मोदी के कहे को ही अटल मान रहे हैं। विरोधी अब यह भी नहीं कह पाएंगे कि देश के महज 31 फीसद लोग उनके साथ हैं जबकि 69 फीसद उनके खिलाफ।

लोगों ने नरेंद्र मोदी को पहले से कहीं ज्यादा बड़ा जनादेश दे दिया है। यह जनादेश उस विश्वास को बनाए रखने की अति महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी भी लेकर आया है। इस जनादेश को राष्ट्रवाद, जातिवाद या किसी भी तरह के संकीर्ण दायरे में बांधने की जरूरत नहीं। यह जनमानस की सहज आवाज है जिसे सुनने-समझने में बौद्धिकों की बुद्धि भी कम पड़ गई। क्योंकि किसी भी तरह के पूर्वग्रह से जुड़ कर देखने से सफेद रंग भी काला दिखने लगता है। भरी दुपहरी में सूरज बादलों की ओट में चला जाए तो रात लगती है और पानी का छोटा-मोटा बहाव भी बाढ़ सरीखा दिखाई देता है।

एक मुद्दत से पाकिस्तान की गीदड़ भभकियां झेलते देश के अवाम को मोदी में एक ऐसा नेता दिखा जो पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब दे सकता था। उन पर छद्म राष्ट्रवाद का आरोप मढ़ने वालों को लोगों ने दरअसल छद्म धर्मनिरपेक्षतावादी समझा और वे अपने तर्क-कुतर्क के दम पर लोगों का विश्वास जीतने में नाकाम रहे। विश्व भर में मोदी ने देश की जो प्रतिष्ठा बहाल की लोग उससे गदगद थे। यह संदेश दूर तक गया कि मोदी ने अपनी एक मजबूत अंतरराष्ट्रीय छवि बनाई जिसमें लोगों को गर्व करने के कई वाजिब कारण दिखे। बेरोजगारी, कालाधन, भ्रष्टाचार के आरोपों को लोगों ने जैसे सिरे से नकार दिया।

माना गया कि यह विपक्ष का प्रलाप भर है। जब प्रधानमंत्री के खिलाफ कहने को कुछ नहीं तो फिर अनर्गल आरोप ही सही। गांव-गांव, घर-घर पहुंची रसोई गैस और शौचालय ने मोदी की जीत में एक अहम भूमिका निभाई। ऐसा ही कुछ आयुष्मान भारत के साथ भी था। इन योजनाओं का लाभ आम लोगों तक पहुंचाया गया जो उनके मोदी के प्रति विश्वास की एक मजबूत नींव बनाने में कामयाब हुआ। लोगों ने माना कि प्रधानमंत्री सचमुच सब का साथ, सब का विकास का नारा फलीभूत करने में लगे हैं। मोदी के लिए यह जनादेश किसी एक जाति, एक समुदाय या एक वर्ग का नहीं वरन समग्र समाज का है।

प्रचंड बहुमत से चुने जाने के बाद उनकी यह घोषणा मायने रखती है कि देश में अब दो ही जाति रह जाएगी-एक गरीब और दूसरी गरीबी मिटाने वाली। यह एक सराहनीय लक्ष्य है जिसे हासिल करना सदी की बड़ी उपलब्धि हो जाएगी। पार्टी के वरिष्ठों की उपेक्षा का इल्जाम जीत के बाद लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी की दहलीज पर धुलता दिखाई दिया। जमीनी स्तर पर यह भाव साफ दिखाई दिया कि मोदी देश के लिए जो भी कर रहे हैं वही उचित है, श्रेष्ठ है। यह जीत किसी संगठन, दल या किसी कार्यक्रम प्रबंधन प्रतिभा की न हो कर व्यक्ति विशेष की है।

मोदी देश में एक मुहावरे की तरह हो गए हैं जिन्हें सहज ही कामयाबी के पर्याय के रूप में देखा जा रहा है। मोदी या उनकी नीतियों का विरोध अपनी जगह है, लेकिन लोकतंत्र के इस उत्सव में उनकी अभूतपूर्व जीत का जश्न अपनी जगह है। लोगों का नुमाइंदा उनके ही वोट से तय होगा न कि दिल्ली की संभ्रांत कालोनियों में स्थित बंगलों के वातानुकूलित कमरों में बैठ कर। मोदी ने देश के राजनीतिक इतिहास में एक ऐसा पन्ना लिखा है जो शायद ही कभी दुहराया जाए। हो सकता है कि जनता के विश्वास को यों ही कायम रख कर वे स्वयं ही इसे आगे ले जाएं। सच यह है कि देश की सभ्यता और संस्कृति के ध्वजवाहक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के यह स्वयंसेवक देश के इतिहास में एक मिथकीय चरित्र की तरह दर्ज हो चुके हैं।

उम्मीद है कि लोगों के इस अटल विश्वास को मोदी उतनी ही सहृदयता से सहेज कर रखेंगे जैसा उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के मुख्यालय में कहा कि जीत को विनम्रता से स्वीकारना होगा। मोदी की इस जीत के बहुत मायने निकालने की जरूरत नहीं और न ही इसे आलोचना के कठोर पहलुओं पर परखने की। न ही इसे किसी सूक्ष्मदर्शी के नीचे रख कर भेदने की जरूरत है। इस जीत को उसी परिप्रेक्ष्य में देखना होगा जिसमें देश के लोगों ने इसे उनके सुपुर्द किया है। इस जीत के बाद अपने आसपास के उन लोगों की बात पर भी विश्वास नहीं होता कि वे कांग्रेस को, सपा को, बसपा को, वामपंथ को या किसी भी दूसरे विपक्षी दल को वोट करके आए। पूरा चुनाव पूरी तरह से एकतरफा रहा है। हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर जिन्होंने प्रदेश में पहली बार भाजपा की झोली में दस की दस लोकसभा सीटें डाल दीं, ने सही कहा कि श्रेय के असली हकदार प्रधानमंत्री हैं, न कि कोई और। वे खुद भी नहीं।

यह भाव सिर्फ उनका ही नहीं है। कोई और कहे न कहे, सच यह है कि इस जीत पर मोदी की मोहर है। लोकतंत्र में कोई व्यक्ति विशेष क्या सोचता है यह महत्त्वपूर्ण नहीं। महत्त्वपूर्ण यह है कि देश की आम जनता क्या सोचती है। और जनता का फैसला मोदी के पक्ष में है। लोगों ने न सिर्फ यह विश्वास किया कि वे पिछले पांच वर्ष में देश को सही दिशा में ले गए वरन यह भी माना कि वे अगले पांच वर्ष उसे और आगे ले जाएंगे। चुनौतीपूर्ण लहजे में यह कहना कि अब मोदी को मंदिर बनवाना होगा, धारा 370 और अनुच्छेद 35-ए हटाना होगा, हास्यास्पद है क्योंकि उन मुद्दों पर मोदी अपना रुख साफ-साफ जाहिर कर चुके हैं। ऐसा लगता है कि अब कुछ अरसा आलोचकों को अपनी बुद्धि को विश्राम देने की जरूरत है ताकि देश सही दिशा में जा सके।

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