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बेबाक बोल: बराबरी की बात

भारत के इस ऐतिहासिक ना को बाजार की शक्तियां कोस रही हैं, संरक्षणवादी कह कर उसकी हैसियत को कमतर करने की कोशिश की जा रही है। अपने दूसरे कार्यकाल के शुरुआत में बाहर जाकर नरेंद्र मोदी ने कहा है, अपना घर सबसे पहले।

Author Published on: November 9, 2019 4:40 AM
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की जनता का मनोबल बढ़ाया है।

नब्बे के दशक में उदारीकरण के राजमार्ग पर दौड़ने के बाद 2008 की आर्थिक मंदी से सामना हुआ। यह वैसा समय था जब भारत जैसी अर्थव्यवस्था का बखान हुआ था, जहां नकद को नारायण कहा जाता है और गुल्लकों में सपनों का चक्रवृद्धि ब्याज पलता है। डेबिट और क्रेडिट कार्ड के बारे में आम भारतीयों की धारणा थी कि जिसके मूल शब्द का भावार्थ ही कर्ज है उसका सहारा ले आमदनी अठन्नी और खर्च रुपया क्यों करना। यही वह समय था जब मुक्त बाजार के नाम पर पश्चिमी देशों ने विकासशील देशों को अपने बाजार के जाल में उलझाना शुरू किया। अब जबकि ग्लोब के हर हिस्से पर नवउदारवादी व्यवस्था कराह रही है और मुक्त पूंजी नागरिकों के बंधन बढ़ा रही है तो एक बार ठहर कर अपने घरेलू हालात पर नजर डालना जरूरी है। किसी वैश्विक अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनना आसान होता है लेकिन अपने घरेलू हालात से तालमेल बिठाना मुश्किल। क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (आरसीईपी) के ताजा प्रावधानों के खिलाफ भारत ने अपने कदम पीछे हटा कर जो सतर्कता बरती है उस पर बेबाक बोल।

आरसीईपी करार का मौजूदा स्वरूप पूरी तरह इसकी मूल भावना और इसके मार्गदर्शी सिद्धांतों को नहीं दर्शाता है। इसमें भारत की ओर से उठाए गए शेष मुद्दों और चिंताओं को भी संतोषजनक तरीके से दूर नहीं किया जा सका है। ऐसे में उसके लिए आरसीईपी समझौते में शामिल होना संभव नहीं है’। दुनिया को सबसे बड़ा मुक्त बाजार बनाने की तैयारी वाले मंच से जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह एलान किया तो चीन से लेकर आॅस्ट्रेलिया के प्रतिनिधियों ने गहरी नाराजगी जाहिर की। यहां तक कि भारत से जुड़े नवउदारवादी खेमे के अर्थशास्त्रियों और चिंतकों ने भी इसे प्रतिगामी कदम बताया। क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (आरसीईपी) में शामिल 16 देशों के मंच पर भारत अपने उत्पादों के लिए बाजार पहुंच और वस्तुओं को संरक्षित सूची से जुड़े मुद्दों को जोरदार तरीके से उठा रहा था।

2014 के चुनाव में नरेंद्र मोदी की अगुआई में भारतीय जनता पार्टी को ऐतिहासिक जीत मिली थी। यह जीत कांग्रेस की उन नवउदारवादी नीतियों के खिलाफ थी जिसकी मुक्त व्यापार नीति ने भारतीय किसानों और कामगारों को बाजार का बंधक बना डाला था। नवउदारवादी आर्थिक नीतियों के राजमार्ग पर कमजोर तबके के लिए कोई सहायक गली नहीं छोड़ी गई थी। इस नीति का परिणाम यह था कि 2019 के चुनाव घोषणापत्र में उसे अपने ही आर्थिक फैसलों के खिलाफ सामाजिक न्याय की बात कहते हुए ‘न्यूनतम मासिक आय’ का वादा करना पड़ा था। पी चिदंबरम और मनमोहन सिंह जैसे नेता उन वादों का पुलिंदा पकड़े हुए थे, जिन पर जनता पूछ रही थी कि अगर अब पीछे ही लौटना है तो फिर आप कौन?

प्रचंड बहुमत वाले अपने पहले कार्यकाल में नरेंद्र मोदी की अगुआई में सरकार ने महाराष्ट्र से लेकर मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में बड़े किसान आंदोलन देखे। महाराष्ट्र सरकार ने इस आंदोलन की अहमियत समझते हुए किसान संगठनों के नेताओं से बात कर किसानों और वनवासियों के साथ होने का वादा किया था। दिल्ली में पहुंचे किसानों के साथ मध्यवर्ग भी खड़ा हो चुका था। बड़े आर्थिक सुधारों के बाद यह पहला मौका था जब शहरी बेरोजगारी का संबंध गांव के खेत-खलिहानों से जोड़ा जा रहा था। देश भर के किसान दिल्ली की सीमा पर पहुंच अपना हक मांग चुके थे।

अपने दूसरे कार्यकाल में भाजपा को पूरा अहसास है कि उसे प्रचंड बहुमत और बैंकॉक में देश के लोगों की किस्मत तय करने का अधिकार देने वाले कौन लोग हैं। किसानों से लेकर कामगारों और मध्यम वर्ग तक ने भाजपा को वोट दिया। अपने दूसरे कार्यकाल में नरेंद्र मोदी ने इस वर्ग की मुसीबतों को देखते हुए एक संवेदनशील छवि बनाने की कोशिश की है। आम बजट से लेकर सरकार की कई झंडाबरदार योजनाएं ऐसी हैं जो हाशिए पर खड़े लोगों के लिए हंै।

पिछले महीने चीन के राष्टÑाध्यक्ष शी जिनपिंग की भारत यात्रा के समय राष्टÑीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े किसान संगठन से लेकर कई किसान व कामगार संगठनों ने आरसीईपी को लेकर अपनी खासी चिंता जाहिर की थी। जमीन से जुड़े लोगों ने सरकार के शीर्ष तक संदेश पहुंचाया था कि पहले से ही कई तरह की आर्थिक गैरबराबरी झेल रहे इस देश को अगर आरसीईपी की जद में लाया गया तो देश के किसान तबाही के कगार पर पहुंच जाएंगे। वामपंथी संगठनों के साथ कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दलों से जुड़े संगठनों ने भी इसका विरोध किया था। राजनीतिक दलों के साथ अगर भारत की बड़ी दुग्ध उत्पादक संस्था अमूल के प्रबंध निदेशक आरएस सोढी इसके खिलाफ चिंता जता रहे थे तो इस संदेश को सरकार ने समझने में देरी नहीं की।

अगर आरईसीपी लागू हो जाता है तो विभिन्न देशों को भारत के अंदर व्यापार करने और आयात व निर्यात शुल्क में भारी छूट मिलती। वैश्वीकरण के बाद नवउदारवादी अर्थव्यवस्था का यही रुझान है कि इन मुक्त मार्ग से विकासशील देश की अर्थव्यवस्था को बंधन में डाल दिया जाता है। इन अनुभवों को देखते हुए ही किसान से लेकर बाग मालिक व डेयरी उत्पादक इसका विरोध कर रहे हैं। इस करार के बाद भारत के दुग्ध उत्पादकों पर सीधा हमला होना तय दिख रहा था। किसान संगठनों ने खौफ जताया कि आॅस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड जैसे देश मिल्क पाउडर का पुनर्चक्रण कर भारत में सस्ते दुग्ध उत्पाद बेचेंगे और यहां के मवेशी पालकों की रीढ़ की हड्डी ही टूट जाएगी।

इस तरह के अंतरराष्टÑीय समझौतों का दीर्घकालीन असर होता है। अगर एक बार आपने करार कर लिया तो फिर पीछे हटने का सवाल इतनी तरह की जटिलताएं सामने लाता है कि आपकी पूरी व्यवस्था बंधक हो जाती है। ऐसे करार के वक्त देखना चाहिए कि इससे हमारे यहां संपदा का निर्माण होगा या हमारी संपदा का दोहन होगा। प्राकृतिक साधनों और श्रम के सहयोग से ही संपदा का निर्माण होता है। लेकिन अभी तक जैसा कि किसान-मजदूर संगठनों को आशंका है कि आरसीईपी जैसे करार के बाद संपत्ति के निर्माण की प्रक्रिया तो बाहर ही होगी और यहां उसका सिर्फ पुनर्चक्रण ही होगा। आयात और निर्यात की खाई बढ़ेगी और संपत्ति पैदा होने के बजाए बाहर जाएगी। नतीजतन देश में सिर्फ उपभोक्ता पैदा होंगे।

आरसीईपी के मौजूदा प्रावधानों से तय है कि इससे भारत की श्रमशक्ति को कुछ नहीं मिलने वाला है। न तो उत्पादन के ढांचे का विकास होगा और न यहां के श्रम को रोजगार मिलने की उम्मीद दिख रही है। अभी ही देश की हालत यह है कि खर्च करने के लिए खरीद क्षमता नहीं है। कुछ खास संख्या में अरबपतियों और खरबपतियों की संख्या तो बढ़ रही है लेकिन 71 फीसद लोगों के हिस्से बहुत कम संपदा है। जिस आर्थिक संकट से देश गुजर रहा है उस समय में ऐसे गैरबराबरी के आर्थिक प्रावधानों से अलग रहने का साहसिक फैसला कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की जनता का मनोबल बढ़ाया है।

2008 की आर्थिक मंदी वैसा समय था, जब भारत जैसी अर्थव्यवस्था का बखान हुआ था, जहां नकद को नारायण कहा जाता है और गुल्लकों में सपने संजोए जाते हैं, डेबिट और क्रेडिट कार्ड के बारे में कहा जाता था कि जिसके मूल शब्द का भावार्थ ही कर्ज है उसका सहारा ले आमदनी अठन्नी और खर्च रुपया क्यों करना। यही वह समय था जब नवउदारवाद और मुक्त बाजार के नाम पर पश्चिमी देशों ने विकासशील देशों को अपने बाजार के जाल में उलझाना शुरू किया। अब जबकि ग्लोब के हर हिस्से पर नवउदारवादी व्यवस्था कराह रही है और पूंजीवादी व्यवस्था को आगे बढ़ने का रास्ता नहीं मिल रहा है तो यह बहुत जरूरी है कि भारत जैसे देशों के राष्टÑाध्यक्ष यह सवाल पूछना शुरू करें कि इस एक दस्तखत से हमारे किसानों और मवेशीपालकों को कितना फायदा होगा? इस बाजार में घरेलू रोजगार कितना बढ़ेगा? वैश्विक दबाव की परवाह नहीं करते हुए नरेंद्र मोदी ने अंतरराष्टÑीय मंच पर यह सवाल पूछने का साहस किया है।

भारत के इस ऐतिहासिक ना को बाजार की शक्तियां कोस रही हैं, संरक्षणवादी कह कर उसकी हैसियत को कमतर करने की कोशिश की जा रही है। अपने दूसरे कार्यकाल के शुरुआत में बाहर जाकर नरेंद्र मोदी ने कहा है, अपना घर सबसे पहले। यह भी तय है कि सिर्फ एक ना से तुरत-फुरत में सब ठीक नहीं हो जाएगा, लेकिन इसके जरिए एक बड़े वर्ग की आवाज तो सुनी गई है। 1990 के दशक में भारत ने विश्व व्यापार संगठन पर दस्तखत किए थे और 2019 में आरसीईपी पर करार से इनकार किया है। खोया-पाया का विश्लेषण आगे होता रहेगा। देश के अंदरूनी ढांचे से तो अपनी तरह से निपटा जा सकता है लेकिन एक बार वैश्विक ढांचे का हिस्सा बनने के पहले जो सतर्कता बरती गई है उसका स्वागत।

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