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बेबाक बोल: बेदम दिल्ली

ज्यादातर केंद्रों पर मतदाताओं को मतदान के बाद टॉफी और गुलाब के फूल दिए गए। आयोग की तरफ से मतदान केंद्रों पर सेल्फी प्वाइंट भी बनाए गए। इतनी सुविधाओं के बावजूद दिल्ली की जनता ने निराश किया।

दिल्ली में सात लोकसभा सीटें हैं

‘हमीं हैं मौजिब-ए-बाब-ए-फसाहत हजरत-ए-‘शाइर’
जमाना सीखता है हम से हम वो दिल्ली वाले हैं…’

एक शायर कहते हैं कि दिल्ली रास्ता दिखाती है। लेकिन मतदान को लेकर ऐसा सिर्फ 1977 में हुआ। यही वह साल था जब आपातकाल के बाद दिल्ली की जनता ने 71.31 फीसद मतदान किया था। जब हम कहते हैं कि आदर्श स्थिति सौ फीसद मतदान की होनी चाहिए तो दिल्ली के पास आदर्श इतना पुराना और कमजोर है। छठे चरण के मतदान के आंकड़े बता रहे हैं कि दिल्ली वालों की राजनीतिक और सामाजिक चेतना इतवार की छुट्टी की तरह अलसाई हुई रही। बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकार और जिम्मेदारी को लेकर राष्ट्रीय राजधानी उन इलाकों के सामने बौनी साबित हुई जिन्हें दिल्ली की तुलना में छटाक भर भी सुविधा और संसाधन नहीं मिले हैं।

रेगिस्तानी, द्वीपीय और बीहड़ जंगलों के पास से मतदान की खबरें आर्इं। लोग सुबह उठकर कई कोस पैदल चलकर वोट देकर आए। कच्चे पुल से नदी पार किया, पहाड़ की ऊंचाई लांघी और अपनी सरकार चुनने के लिए शिरकत की। वहीं दिल्ली में मतदान के दिन रविवार की छुट्टी थी। मतदाताओं और पीठासीन अधिकारियों की सुविधा के लिए सुबह चार बजे से दिल्ली मेट्रो की सेवा शुरू कर दी गई। बसों की सेवा बढ़ा दी गई। चुनाव आयोग ने हर केंद्र पर ठंडे पानी और छांव का इंतजाम कर रखा था। ज्यादातर केंद्रों पर मतदाताओं को मतदान के बाद टॉफी और गुलाब के फूल दिए गए। आयोग की तरफ से मतदान केंद्रों पर सेल्फी प्वाइंट भी बनाए गए। इतनी सुविधाओं के बावजूद दिल्ली की जनता ने निराश किया।

देश की राजधानी दिल्ली और सात संसदीय सीट। लोकसभा चुनाव के छठे चरण में इन सीटों पर उम्मीदवार शीला दीक्षित, अजय माकन, डॉक्टर हर्षवर्धन, मीनाक्षी लेखी और आतिशी जैसे लोग हैं। इस बार भाजपा-कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने चुनाव जीतने के लिए पूरा जोर भी लगा दिया। ध्यान देने की बात है कि उत्तर पूर्वी दिल्ली में सबसे ज्यादा और नई दिल्ली सीट पर सबसे कम मतदान हुआ। नई दिल्ली, जैसे नाम से ही जाहिर है, अपनी अलग शान रखती है। देश के दूसरे भाग से आए लोग यहां के किराए के मकानों में भी इसलिए रहना पसंद करते हैं कि यहां का डाक पता शान की बात हो जाती है। यहां चमचमाती कालोनियां और महंगे स्कूल हैं। इन स्कूलोें में नर्सरी दाखिले के लिए अभिभावकों की जितनी लंबी कतार लगती है, मतदान केंद्रों पर वह कतार उतनी ही छोटी दिखी।

यूपीए शासन के दूसरे दौर में दिल्ली नए प्रतीकों की राजनीति का केंद्र भी बनी। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने अण्णा आंदोलन का रूप धरा। जंतर मंतर से लेकर रामलीला मैदान तक राजनीतिक प्रशिक्षण की पाठशाला बन गए थे। इन मंचों से चुनाव सुधारों की बात भी शुरू हुई थी। चुनाव खर्च, लोकपाल जैसे मुद्दों से लगा था कि दिल्ली से उठी यह हवा देश बदलने वाली है। दिल्ली की जनता ने इन आंदोलनकारियों का साथ भी दिया और आम आदमी पार्टी को राष्टÑीय राजधानी की अगुआई सौंपी। लेकिन आंदोलन से जन्मी यह खास पार्टी सत्ता का हिस्सा बनते ही समाज से लेकर राजनीति के सुधारों को भुलाने में वैसे ही आम हो गई जैसा सभी पार्टिंयां करती हैं। शिक्षा और समाज सुधार के लिए काम करने वाले लोगों की जो फौज आम आदमी से जुड़ी थी वह जल्दी ही अपने हथियारों को उलटा कर बैरक में चली गई। पूर्व एडमिरल रामदास जनलोकपाल-जनलोकपाल की रट लगाते रह गए जो अरविंद केजरीवाल के कानों तक पहुंचनी बंद हो गई।

2014 से लेकर 2019 तक देश की राजधानी दिल्ली ने कई आंदोलन देखे। पूरे देश के किसान दिल्ली में जुटे और सरकार तक अपनी बात पहुंचाई। इस एक शहर से लोकतंत्र बचाने के लिए सबसे ज्यादा कविताएं लिखी गर्इं और नारे लगाए गए। इन सबके बावजूद लोग मतदान केंद्र तक क्यों नहीं पहुंचे? इस बार राष्टÑीय राजधानी दिल्ली ही नहीं देश के कई इलाकों में मतदान फीसद गिरा है। इसका सबसे पहला कारण यह है कि 2014 में वैकल्पिक राजनीति की संभावना जो तलाश रहे थे पांच साल बाद उनमें निराशा का भाव जगा है। यूपीए और कांग्रेस के शासन के खिलाफ पूरे देश में वैकल्पिक राजनीति के लिए आंदोलन उठा। केंद्र से लेकर दिल्ली तक में उन्हीं वैकल्पिक ताकतों की सरकारें चुनी गर्इं। लेकिन दिल्ली विधानसभा में आम आदमी पार्टी और लोकसभा में भारतीय जनता पार्टी को चुनने वाली जनता ने इन दोनों की जंग देखी। पांच साल तक दोनों में जिस तरह जंग की स्थिति रही उससे लोगों में सबसे ज्यादा निराशा जगी। विधानसभा में आम आदमी पार्टी और लोकसभा में भाजपा को विकल्प बनाने वाली जनता को पता नहीं था कि दोनों विकल्प एक-दूसरे से ऐसे टकराएंगे।

सात सीटों में फैली दिल्ली वर्गीय आधार पर त्रिकोण बनाती है। यहां सबसे बड़ा तबका मध्य वर्ग का है। पिछली बार राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने इस वर्ग को घरों से निकाल कर आंदोलन की जमीन पर खड़ा किया। लेकिन आज यह वर्ग उदासनीता की इस स्थिति में पहुंच गया है कि सब एक जैसे हैं। यह वर्ग इस भाव का शिकार हो गया है कि हमारे वोट से कुछ फर्क नहीं पड़ता। सब एक ही थैली के चट्टेबट्टे हैं जैसे भाव वाले मतदाताओं के लिए नोटा का भी बखान किया गया। अगर किसी को वोट नहीं देना है तो नोटा को दीजिए। नोटा के जरिए राजनीतिक दलों से उदासीन लोगों को मतदान केंद्र तक लाने की कोशिश की गई। लेकिन यह सही विकल्प हो भी नहीं सकता। यह किसी का प्रतिनिधि नहीं हो सकता। संसद में यह न पक्ष में, न विपक्ष में बात कर सकता है। नोटा प्रतीक है उदासीनता का, नाउम्मीदी का। अब नाउम्मीदी के जरिए लोकतंत्र को बचाने का मुगालता पालने वालों से क्या उम्मीद की जाए।

मध्य वर्ग के बाद आता है दिल्ली का उच्च वर्गीय तबका। इसे मालूम है कि कोऊ नृप होऊ हमें का हानि, कोई भी आए-जाए हमारी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। अपने भविष्य को लेकर भरोसेमंद इस वर्ग को लेकर ही ज्यादा नीतियां बनती हैं। इसे पता है कि इसे बिना मांगे ही मिलना है तो फिर यह वोट देने क्यों जाए।

अब बच गया निम्न आर्थिक वर्ग और कामगारों का तबका। यह वैसा वर्ग है जिस पर हर तरह की मार पड़ती है। यही वर्ग महंगाई से लेकर भ्रष्टाचार तक को लेकर संवेदनशील है। यह वर्ग दिल्ली के खजाने से निकले एक रुपए में से 15 पैसे की हिस्सेदारी पाने के लिए जंग लड़ता है। जब यह शहर के हाशिए पर अपनी झोपड़ी बनाता है तो सरकारी अमला आंखें मूंदे रहता है, बीच में वह इन बस्तियों को अवैध मानकर तोड़ने आता है और चुनावी समय में नेता इन अवैध बस्तियों को बचाने का वादा लेकर आते हैं। एक यही वर्ग है जो जनतंत्र में अपनी जगह पाने के लिए जुटा है और वोट करने के लिए निकलता है। 2019 में आम चुनाव के नतीजों के पहले का चुनावी पाठ यही है कि भारत का लोकतंत्र अभी भी वंचितों के कुछ हासिल कर लेने के सपनों के संघर्ष से ही जूझ रहा है। जिन्हें सबसे कम मिला है, उन्हीं पर अब तक सब कुछ टिका है।

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