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बेबाक बोल: गिद्ध गाथा

उत्तर प्रदेश का गोरखपुर हो या बिहार का मुजफ्फरपुर, दिमागी बुखार को लेकर गरीब तबके के बच्चों की ही जान जा रही है। इसका मतलब साफ है कि बीमारी की वजह लीची नहीं गरीबी है।

डॉक्टरों का कहना है कि लीची का बुरा असर तब होता है जब बच्चा खाली पेट सिर्फ लीची खा ले।

रूप बदल कर इतिहास खुद को दोहरा लेता है। मुजफ्फरपुर में 130 बच्चों की मौत के बाद मीडिया के नए सैरसपाटे की जगह को देख कर गिद्ध और बच्ची की तस्वीर लेने वाले छाया पत्रकार केविन कार्टर की दुखद कहानी लोगों को फिर से याद आ गई। सूडान की तस्वीर 21वीं सदी के मुजफ्फरपुर में दोहराई गई है। 130 बच्चों की मौत वाली जगह पर मुख्यमंत्री को पहुंचने में 17 दिन लगते हैं तो विपक्ष के पैरोकारों का कुतर्क मरी हुई जनता को ही और मार रहा कि उन्हें वोट क्यों दिया था। जिस बुखार का ठीकरा हिंदुस्तान के कई इलाकों में दो सौ सालों से खाई जा रही लीची पर फोड़ा जा रहा उसकी असली वजह फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ के अमर साहित्य ‘मैला आंचल’ में दर्ज है-गरीबी और जहालत। मुजफ्फरपुर में पूर्णिया के मेरीगंज से लेकर सूडान के गिद्ध तक की वापसी पर बेबाक बोल।

जब पारा 40 के पार हो तो बच्चों के पेट में अनाज हो। बच्चों के शरीर में इतनी ऊर्जा हो कि सौ से ज्यादा बुखार आ जाए तो वो उसे झेल लें। घर में थर्मामीटर हो, परिजनों को बुखार मापना आता हो और बीमार पड़ने पर उन्हें पारासिटामोल की सही खुराक मिलती रहे। इक्कीसवीं सदी के भारत में हम अपने बच्चों को इतनी बुनियादी चीजें भी मुहैया न करवा पाए, तो क्या पक्ष और क्या विपक्ष। बच्चा इसलिए मर गया क्योंकि उसका कुपोषित शरीर बुखार को नहीं झेल पा रहा था।

बजरिए मुजफ्फरपुर बिहार सरकार की पोस्टमार्टम रिपोर्ट बता रही है कि कमजोर तबके के बच्चे आज भी भूखे सो रहे हैं। अस्पतालों में इतने संसाधन नहीं हैं कि वे बुखार पर काबू पा सकें। एक बुखार की वजह से 130 बच्चों की मौत हो जाती है और बिहार के मुख्यमंत्री को पटना से मुजफ्फरपुर की 72 किलोमीटर की दूरी तय करने में 17 दिन लग जाते हैं। वैसे स्वयंभू ‘सुशासन बाबू’ को इससे पहले भी संवदेनशील मसलों पर सक्रिय होने में जरूरत से ज्यादा समय लगता रहा है। मुजफ्फरपुर की बच्चियों के यौन शोषण के मामले में इतनी देर से बोले थे कि उस बोलने का मतलब नहीं रह गया था, वह भी तब जबकि बच्चियों से बलात्कार और हत्या के आरोपी सत्ता के साथ चलने वाले चेहरे थे।

मुजफ्फरपुर के एसकेएमसीएच और केजरीवाल अस्पताल के बाहर हाहाकार मचा था। मां-बाप, दादा-दादी की गोद में सफेद कपड़ों में लिपटे बच्चों के शवों की तस्वीरें विचलित कर रही थीं। पटना से मुजफ्फरपुर के बीच की धरती और चांद जैसी दूरी तय कर पहुंचने वाले मुख्यमंत्री को जनता के गुस्से का सामना करना पड़ा। नीतीश कुमार वापस जाओ के नारों के बीच वही बहुत देर से बोली गई फुसफुसाती आवाज कि इस बार जागरूकता फैलाने में कमी रह गई थी। बच्चों की मौत के मातम के बीच केंद्रीय मंत्री बड़े आराम से कह बैठते हैं कि चुनावी व्यस्तताओं की वजह से अधिकारी इनसेफलाइटिस को लेकर जागरूकता का प्रसार नहीं कर पाए।

केंद्रीय मंत्री और मुख्यमंत्री उस बीमारी की जागरूकता के बारे में बात कर रहे हैं जिस पर 2015 में काबू पा लिया गया था। ‘स्टैंडर्ड आॅपरेटिंग प्रोसीजर’ ऐसा शब्द है जो मुजफ्फरपुर की घटना के बाद बहुत बार बोला गया है। दिमागी बुखार के खिलाफ कुछ बुनियादी मानक तय किए गए थे, जिसे अपनाया गया था और बच्चों के सिर से बुखार की वजह से मौत का खतरा टला था। एहतियाती उपायों में सबसे जरूरी है बच्चे को समय से अस्पताल पहुंचाना और ग्लूकोज चढ़ाना। ज्यादातर लोगों ने शिकायत की कि निजी अस्पतालों से बड़े सरकारी अस्पताल तक जाने में एंबुलेंस का खर्च ही इतना था जिसे गरीब परिवार के लोग वहन नहीं कर सकते।

शासन-प्रशासन इस बीमारी का ठीकरा उस लीची पर फोड़ रहा है जो मुजफ्फरपुर के किसानों की रीढ़ की हड्डी है। बिना किसी पर्याप्त शोध और सबूत के जिम्मेदार सरकारी अमलों द्वारा लीची को कठघरे में ला एक और नई समस्या पैदा कर दी गई है। दिल्ली, मुंबई तक पहुंची मुजफ्फरपुर की लीची को शक की निगाह से देखा जा रहा है। जिस मुजफ्फरपुर की लीची का साल भर इंतजार रहता था, लोग उसे खरीदने से डर रहे हैं। फिलहाल इस बीमारी की जद में एक साल के बच्चे भी आए हैं जो लीची नहीं खाते। डॉक्टरों का कहना है कि लीची का बुरा असर तब होता है जब बच्चा खाली पेट सिर्फ लीची खा ले। लीची इसलिए खतरनाक हो जाती है क्योंकि बच्चे के पेट में पर्याप्त पोषण देनेवाला अनाज नहीं है।

सौ से ज्यादा बच्चों की मौत के बाद कोई मंत्री कह रहा कि हम बारिश होने का इंतजार कर रहे तो कोई कह रहा गरीब के बच्चे थे, अभागे थे। लेकिन देश के भविष्य की इन मौतों का जिम्मेदार कौन है इस पर बात करने के लिए कोई तैयार नहीं है। बच्चों की मौत के बाद हाहाकार मचने पर केंद्रीय मंत्री अपनी कही गई बात को दुहराते हैं कि 100 बिस्तरों का अस्पताल बनवा देंगे। मुख्यमंत्री उससे ज्यादा आधुनिक अस्पताल की बात कह कर चले जाते हैं। लेकिन इनसे सवाल यह है कि आइसीयू तो छोड़िए अस्पतालों में पर्याप्त डॉक्टर और ग्लूकोज क्यों नहीं हैं। बच्चों को अस्पताल पहुंचाने के लिए नि:शुल्क एंबुलेंस क्यों नहीं है। जब बात पारासिटामोल, थर्मामीटर और ओआरएस की हो रही हो तो फिर सुपरस्पेशियलिटी अस्पताल का राग अलापने वालों की तो दिमागी जांच हो जानी चाहिए। सीतामढ़ी से लेकर वैशाली और पूर्वी चंपारण के जिलों में बुनियादी स्वास्थ्य सेवाएं क्यों चरमरा गई हैं कि बच्चों को बुखार के बाद मुजफ्फरपुर के एसकेएमसीएच में ही लाना पड़ता है। केंद्रीय मंत्री दिल्ली लौट चुके हैं और मुख्यमंत्री पटना। अब चुनाव पांच साल बाद है तो विपक्ष अपनी ऊर्जा अभी खर्च क्यों करे।

भारत का स्वास्थ्य बजट कुल जीडीपी का महज 1.15 फीसद क्यों है इसके लिए बार-बार सवाल क्यों करें। पूरे स्वास्थ्य क्षेत्र को बीमा कंपनियों के हवाले करने के खिलाफ जमीनी आंदोलन न तो पहले हुआ और न आगे होने की उम्मीद दिख रही है। सरकारें वैसे ही काम कर रही हैं जैसे करती हैं और विपक्ष के पैरोकारों के पास नया कुतर्क है कि इन्हें क्यों चुना, अब हम क्यों बोलें। जिन्हें वोट दिया है उनसे बात करो। सौ से ज्यादा बच्चों की मौत हो जाती है और विपक्ष के नेता ट्वीट कर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ले रहे हैं। वे यह भूल जाते हैं कि ये उस तबके के लोग हैं जिन तक इंटरनेट की पहुंच नहीं है। जो मां-बाप अपने बच्चों को भर पेट खाना नहीं दे पाते हैं वो इन नेताओं के ट्वीट से झलके दर्द को कैसे पढ़ें। पक्ष-विपक्ष और हमारा समाज सौ बच्चों की मौत पर बिना किसी की जिम्मेदारी तय किए आसानी से मान जाता है।

उत्तर प्रदेश का गोरखपुर हो या बिहार का मुजफ्फरपुर, दिमागी बुखार को लेकर गरीब तबके के बच्चों की ही जान जा रही है। इसका मतलब साफ है कि बीमारी की वजह लीची नहीं गरीबी है। जिस बीमारी को सिर्फ बच्चों को भरपेट पौष्टिक खाना देकर रोका जा सकता था उसका हल सुपरस्पेशयिलटी बिस्तर वाले अस्पताल के हवाई वादे में खोजा जा रहा। ऐसी बीमारी का विषाणु फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ के ‘मैला आंचल’ के किरदार डॉक्टर प्रशांत ने आजादी के बाद 1954 में ही खोज लिया था-गरीबी और जहालत। बच्चे मच्छर और लीची से नहीं बल्कि गरीबी और लापरवाही से मरते हैं। हमारे देश में लाइलाज गरीबी पर पड़े मैला आंचल को एक बार फिर से इन बच्चों की मौत ने उघाड़ दिया है। उनकी लाशों पर मीडिया के गिद्ध भी मंडरा रहे हैं।

जिस अपराध बोध (‘द वल्चर एंड द लिटिल गर्ल’ की तस्वीर की मानवीय दृष्टि से आलोचना) में कभी पुलित्जर पुरस्कार से पुरस्कृत पत्रकार केविन कार्टर ने 33 साल की उम्र में आत्महत्या कर ली थी वह अपराध बिना किसी बोध के हम बार-बार बड़े अहंकार के साथ कर रहे हैं। मौत के मंजर पर मीडिया का सैरसपाटा और सोशल मीडिया पर गरीब मांओं और बच्चों की अग्रेषित तस्वीरों पर तुरंता कविता। किसी एक पोस्ट की तस्वीर को आगे बढ़ा अपनी तुकबंदी करने वालों ने शायद ही यह जानने की कोशिश की होगी कि जिस तस्वीर पर वे बहुत सारी लाइक्स बटोर चुके हैं उस बच्चे का क्या हुआ? हम यह जाने बिना फिर से चुप हो जाएंगे कि कुपोषित मां के गर्भ से आए कुपोषित बच्चों का आगे क्या होगा? हम गिद्धों को अपनी खुराक मिल चुकी है और अगले हैशटैग के शिकार तक हम बहुत शांत रहेंगे।

 

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