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बेबाक बोल: गुबार देखते रहे…

उत्तर प्रदेश में भाजपा की प्रचंड बहुमत की सरकार बनने के बाद विपक्ष मैदान से बाहर था। कुछ प्रेस वार्ता और प्रेस विज्ञप्तियों के अलावा बहुजन और समाजवादी नेता की जमीन से जुड़ने की कोई कवायद नहीं दिखी।

सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव फोटो सोर्स- फाइनेंसियल एक्सप्रेस

उम्मीदों का अखिलेश हो जाना…

यह समाज और राजनीति पर नए मुहावरे गढ़ने का समय है। राजनीति के मंच से जब निजी संबंधों वाली संवाद अदायगी हो, बुआ-भतीजे का रिश्ता हो, बहू का चरण स्पर्श हो तो फिर स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से जैसे हालात में पहुंचे नायक के लिए और क्या कहा जा सकता है। उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा गठबंधन तोड़ने के बाद मायावती का फिर मिलेंगे अंदाज में अलविदा कहते ही अखिलेश की जो हालत हुई है, शायद उसे ही शब्दकोश में विडंबना का नाम दिया गया है।

ऊपरी तौर पर देखें तो लोकसभा चुनावों के नतीजों के बाद राहुल गांधी हार का सबसे बड़ा चेहरा लग रहे हैं। लेकिन दूरबीन को उत्तर प्रदेश की ओर ले जाने पर सामने अखिलेश यादव की हालत देख कर शायद राहुल गांधी गुनगुना दें कि दुनिया में कितना गम है, मेरा गम कितना गम है।  सास-बहू और बेटा की कहानी वाले इस राजनीतिक सोप ओपेरा को प्रधानमंत्री ने महामिलावट का नाम देकर कहा था कि यह नहीं चलेगा। इसके जवाब में सपा और बसपा के दोनों नेताओं ने कहा था कि यह सिर्फ राजनीतिक गठबंधन ही नहीं है, यह आगे भी चलेगा। लेकिन प्रधानमंत्री की कही बात सच साबित हुई और लोकसभा नतीजों में उम्मीदों की चिता की राख ठंडी होने के पहले ही मायावती ने एलान कर दिया कि बसपा अकेले लड़ेगी उपचुनाव। उन्होंने कहा, ‘बसपा उपचुनाव अकेले लड़ेगी, गठबंधन पर ब्रेक नहीं लगा है, हमारे रिश्ते कभी खत्म नहीं होंगे, अगर आगे अखिलेश पार्टी में सुधार करते हैं और बदलाव करते हैं तो हम आगे साथ रह सकते हैं’। मायावती ने कहा कि जब सपा को ही यादवों का वोट नहीं मिला तो बसपा को उनका वोट कैसे मिला होगा।

पिछले पांच सालों में राजनीति की जो दशा और दिशा तय हुई है उसने सबको उलझन में डाल दिया है। खासकर उत्तर प्रदेश के चुनावी नतीजों ने तो राजनीतिक पंडितों, टिप्पणीकारों और विश्लेषकों को दूसरी बार फेल करार दिया है। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों के नतीजों ने भाजपा के जयकारे के साथ हर जगह सन्नाटा पसरा दिया था। नोटबंदी जैसे कड़े फैसले के बाद भाजपा को उत्तर प्रदेश में हारी हुई पार्टी माना जा रहा था। लेकिन मोदी के नाम पर बंपर वोट पड़ने और योगी के मुख्यमंत्री बनते ही राजनीतिक टिप्पणीकार अवसाद में चले गए थे। लोकसभा चुनाव में गठबंधन की संजीवनी पा मूर्छा से बाहर आए और फिर फलां-फलां जाति के वोट गिन सपा-बसपा की सरकार बनवाने लगे। अब नतीजों के बाद दिल बहलाने के लिए बस ‘जीत का सन्नाटा’ बचा है।
दुखद यह रहा कि उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में फेल होने के बाद भी न तो नेता और न बुद्धिजीवियों ने अपने ज्ञान चक्षु खोलने के लिए मेहनत की। बस जाति के समीकरण के रट्टे लगाए। मंडल बनाम कमंडल के खारिज पाठ्यक्रम को मुख्यधारा में लाने की कोशिश करते रहे। हां, इस बार खामोश मतदाता और अंडर करंट का जुमला जरूर उछला। लेकिन मतदाता खामोशी से अंडर करंट का 440 वोल्ट का झटका देंगे ऐसा किसी ने भी नहीं सोचा था।
इन सबके बाद भी मायावती के विश्लेषण में वही जाति पुराण और हारे को हरिनाम के लिए ईवीएम तो है ही। अखिलेश यादव से शिकायत कि यादवों का वोट नहीं दिला पाए। मायावती इस बार दस सीटों से लाभ में हैं इसलिए उन्हें अभी भी जाति में ही उम्मीद दिख रही है। लेकिन सब कुछ लुटाए बैठे अफसोस कर रहे अखिलेश को बदली राजनीति का ककहरा समझ में आ रहा होगा।

उत्तर प्रदेश में भाजपा की प्रचंड बहुमत की सरकार बनने के बाद विपक्ष मैदान से बाहर था। कुछ प्रेस वार्ता और प्रेस विज्ञप्तियों के अलावा बहुजन और समाजवादी नेता की जमीन से जुड़ने की कोई कवायद नहीं दिखी। मायावती का राजनीतिक संघर्ष एक इतिहास है और महज जाति की जोड़तोड़ से प्रधानमंत्री बनने की महत्त्वाकांक्षा उनका वर्तमान। पिछले लोकसभा चुनाव में सपा परिवार के मुखिया और उनके सदस्यों को इतनी सीटें मिली थीं कि वे खाने की मेज पर संसदीय दल की बैठक कर सकें। लेकिन उसके बाद जनता ने चाचा-भतीजा की लड़ाई देखी, पिता का बेटे को दिया धोबी पछाड़ देखा। सत्ता के लिए सौतेली मां, भाइयों का झगड़ा देखा और अगर कुछ नहीं देखा तो वह थी जनता के बीच जाकर जमीनी लड़ाई।

लखनऊ में मायावती और अखिलेश यादव की साझा प्रेस वार्ता के पीछे दीवार पर लोहिया और आंबेडकर की तस्वीर और मायावती के पांव छूते हुए तेजस्वी यादव के पीछे आंबेडकर की तस्वीर का विश्लेषण कर सीटों की गिनती करने वाले विश्लेषक यह बताना भूल गए थे कि मुलायम सिंह यादव या लालू यादव के पुत्र होने के अलावा इन्होंने लोहिया और आंबेडकर के विचारों को आगे ले जाने के लिए किया क्या है। अब लोहिया और आंबेडकर की सिर्फ तस्वीरों से वोट आपके खाते में नहीं आने वाला है। मुलायम सिंह यादव और लालू यादव के संघर्ष का परिणाम वोटों के रूप में मिला था। लेकिन उनके संघर्षों का वोट उनके बेटों के खातों में हस्तांतरित करने से जनता साफ इनकार कर चुकी है।

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में सपा और कांग्रेस ‘यूपी को यह साथ पसंद है’ नारे के साथ आई, जिसे जनता ने खासा नापसंद किया था। गेस्ट हाउस कांड को भुला जब दो अलग-अलग जमीनों वाले लोग आ मिले तो मतदाताओं को इसमें मिलावट दिखी। बड़े समीक्षक तो ताड़ नहीं सके लेकिन आम जनता ने इस सुविधा की शादी में बाराती बनना पसंद नहीं किया।  यहां पर सवाल है कि क्या ऐसे चुनावी गठबंधन का समय उठ गया है? देश के लोकतंत्र ने एक रैखिक दिशा में चलना तय किया है। जनता राजनीतिक दलों से उम्मीद कर रही है कि जो भी करें ठोस करें। आज के दौर में भाजपा की पहचान यह है कि दो से लेकर तीन सौ पार तक के सफर में अपनी पहचान के साथ समझौता नहीं किया और फिलहाल जनता ने उसकी स्थिरता के साथ स्थिर रहना कबूल किया है।

कई खांचों में बंटे देश में भाजपा के लिए राष्टÑवाद पर टिकना आसान न था, पर उसने यह खतरा उठाया और प्रचंड जीत का लाभ लिया। भाजपा की यह राष्टÑवादी जीत ही सबसे बड़ा संदेश है। दीवारों पर सिर्फ लोहिया की तस्वीर लगाने से कुछ नहीं होगा, अगर आप समाजवादी हैं तो यह सिर्फ कहने से काम नहीं चलेगा आपको दिखना भी होगा। चुनावों के समय भले आप साइकिल निकाल लें पर जनता की आंखों में जगुआर और अन्य शाही कारों के काफिले की तस्वीरें कैद हैं। जनता किसी उद्योगपति के संघर्ष पर विश्वास कर लेती है कि कल तक उसका पिता केले बेच रहा था तो आज बेटा शेयर बाजार का बेताज बादशाह है।

पर नेताओं ने खुद को इतना अविश्वसनीय बना डाला है कि वे जलते अंगारों पर नंगे पांवों से चलकर भी बोलें कि विदेशी कारों का काफिला और ढेर सारे मकान या प्लॉट उनकी मेहनत की कमाई के हैं तो भी जनता विश्वास नहीं करेगी। महंगी कारें, सैफई में नाचते-गाते फिल्मी सितारे और थोक के भाव में यश भारती पुरस्कार आपको कोई यश नहीं दिला पाए। साइकिल सेहत के लिए अच्छी है, इसे सिर्फ चुनावों के समय नहीं निकालें। अब पिता की विरासत छोड़ अपना ‘जन-धन’ खाता खोलें। शून्य संचय के साथ शुरुआत ही आपको समाजवाद समझा पाएगा। सोशल इंजीनियरिंग में फेल हो चुके हैं इसलिए समाजशास्त्र का नया पाठ्यक्रम पढ़िए।

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