ताज़ा खबर
 

बेबाक बोल: दिल्लीनामा-2020

पूर्ण राज्य और अन्य केंद्रीय मुद्दों को छोड़ बिजली-पानी और शिक्षा पर बात हो रही है। एक-दूसरे के खिलाफ आक्रामक खेल को छोड़ अब दोस्ताना मैच सा दिख रहा है। दिल्ली विधानसभा चुनाव में दलों के बदले बोल पर बेबाक बोल।

Delhi Elections 2020: दिल्ली सीएम अरविंद केजरीवाल, फोटो सोर्स – indian Express

‘लगे रहो केजरीवाल’ गाने पर आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता और समर्थक झूम रहे हैं। लेकिन याद रखिए कि जिस फिल्म से यह बोल लिया गया है उसके किरदार मुन्ना भाई की तरह आपके प्रमाणपत्र भी जाली न हों। अब इस ‘बाजीगरी’ पर तो सवाल उठ ही सकते हैं कि बिजली, पानी और महिलाओं की मुफ्त यात्रा पर काम चुनावों के चंद महीने पहले क्यों पूरे पांच साल क्यों नहीं हुए। पहले जो काम केंद्र और उपराज्यपाल नहीं करने दे रहे थे वही अब आपकी इच्छाशक्ति से हो गए। हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड में मतदाताओं का गरम मिजाज देख दिल्ली में पक्ष और विपक्षी दल नरम पड़ चुके हैं। पूर्ण राज्य और अन्य केंद्रीय मुद्दों को छोड़ बिजली-पानी और शिक्षा पर बात हो रही है। एक-दूसरे के खिलाफ आक्रामक खेल को छोड़ अब दोस्ताना मैच सा दिख रहा है। दिल्ली विधानसभा चुनाव में दलों के बदले बोल पर बेबाक बोल।

‘चमन में इख्तिलात-ए-रंग-ओ-बू से बात बनती है
हम ही हम हैं तो क्या हम हैं तुम ही तुम हो तो क्या तुम हो’

केंद्र में सत्ताधारी भाजपा और हाशिए पर धकेली गई कांग्रेस मुख्य विपक्षी दल और इन दोनों के खिलाफ विकल्प में उठी आम आदमी पार्टी की मौजूदा सरकार। दिल्ली विधानसभा चुनाव पर पूरे देश की नजर है। 2014 के पहले से ही दिल्ली के मैदान नए सामाजिक और राजनीतिक कथ्य का निर्माण कर रहे हैं। जो दिल्ली कभी अण्णा आंदोलन, राष्ट्रीय गान, तिरंगा झंडा और भ्रष्टाचार विरोधी नारों के साथ पूरे देश में गूंज रही थी, आज वह पूरी दुनिया में शाहीन बाग के लिए जानी जा रही है। तिरंगा और राष्टÑीय गान के साथ एक नई चीज जुड़ी है भारत का संविधान। पिछले साल पंद्रह दिसंबर से दिल्ली में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ शुरू हुए विरोध प्रदर्शन ने पूरा परिदृश्य ही बदल दिया है। कुछ महीनों पहले जहां तीनों दल एक-दूसरे पर आक्रामक थे, जनता की चीख गूंजते ही गरम दल से नरम दल में तब्दील हो गए हैं। दिल्ली के चुनाव में जब केंद्रीय मुद्दों के हावी होने की उम्मीद थी तो अब निकाय चुनाव जैसे बिजली-पानी और सड़क के मुद्दे ही हावी हैं। पिछले पांच सालों से चल रही आक्रामक राजनीतिक पारी अचानक दोस्ताना मैच में तब्दील दिख रही है।

पूर्ण राज्य से लेकर मुफ्त बिजली और पानी तक। केंद्र के साथ रिश्ते बदलते ही दिल्ली के मैदान के खिलाड़ियों का मुद्दा भी पूरी तरह बदल जाता है। पूर्ण राज्य एक ऐसा मुद्दा है जिसे तीनों दलों ने बहुत जोर-शोर से उठाया। इनमें से दो दलों को मौका भी मिला इस वादे पर अमल करने का क्योंकि वे दोनों केंद्र की सत्ता में शक्तिशाली हुए। अब यह विडंबना ही है कि कांग्रेस ने पूर्ण राज्य का मुद्दा उठाया और केंद्र की सत्ता में आते ही इस पर बात करने से परहेज किया। भाजपा ने भी पूर्ण राज्य पर आंदोलनकारी रवैया अपनाया तो केंद्र में कमान मिलते ही इस पर आधे-अधूरे मन से बात करने लगी। अब रही बात आम आदमी पार्टी की जिसका केंद्र की सत्ता में अस्तित्व नहीं है। पिछली दो बार आम आदमी पार्टी ने पूर्ण राज्य के मुद्दे पर बहुत शोर मचाया। दिल्ली मेट्रो से लेकर आॅटो और कोने-कोने तक इसके विज्ञापनों पर खर्च किया। यूं लगा कि दिल्ली की सारी समस्याओं की जड़ उसका पूर्ण राज्य नहीं होना है। लेकिन इस बार विधानसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल भी पूर्ण राज्य पर बात करने से परहेज कर रहे हैं। केंद्र ने जो नहीं करने दिया वह नहीं, बल्कि जो किया, कर सकते हैं और आगे करेंगे उसी का प्रचार कर रहे।

कांग्रेस और भाजपा के बाद केजरीवाल ने भी पूर्ण राज्य पर चुप्पी क्यों साधी? सबसे पहले तो एक चीज उन्हें समझ आ गई कि पूर्ण राज्य के दर्जे का मतलब है केंद्र सरकार से सीधी टकराहट। अपनी सत्ता के शुरुआती दिनों में अरविंद केजरीवाल ने केंद्र से पूरी तरह टकराव मोल कर जनता से सहानुभूति हासिल करने की रणनीति रखी। ‘काम नहीं करने देते हैं जी, हमारे पास कोई शक्ति ही नहीं है’ उनका प्रिय संवाद था। लेकिन विधानसभा चुनाव के छह महीने पहले वो सारे काम अचानक से होने लगे जो अब तक केंद्र सरकार उन्हें नहीं करने देती थी। खास कर प्रधानमंत्री को लेकर उनकी भाषा एकदम से बदल गई। अब अगर भाजपा ने दिल्ली के पानी की गुणवत्ता पर हमला बोला तो केजरीवाल ने बहुत नरम शब्दों में कह दिया कि हम मिल कर पानी की गुणवत्ता ठीक करेंगे और इसका श्रेय प्रधानमंत्री को दे देंगे।

तो कल तक पंगा करने वाले अब केंद्र के साथ सब कुछ चंगा वाली भाषा क्यों बोल रहे हैं? इसकी एक सबसे बड़ी और बुनियादी वजह है वह वोट बैंक जो आम आदमी पार्टी और भाजपा के बीच समान है। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से लेकर राष्टÑवाद तक के मुद्दे पर भाजपा और आम आदमी पार्टी के सुर एक थे तो मतदाता लक्ष्य भी एक है। आम आदमी पार्टी किसी भी तरह से मतदाताओं के इस वर्ग को खोना नहीं चाहती है। दूसरी तरफ अल्पसंख्यक समुदायों का वर्ग है जो अभी नागरिकता संशोधन कानून को लेकर भाजपा से खासा नाराज है। केजरीवाल इस वर्ग को भी अपने साथ रखना चाहते हैं।

फिलहाल अरविंद केजरीवाल भाजपा विरोधी और कांग्रेस विरोधी दोनों वोटों पर नजर रखे हुए हैं। इसलिए उन्होंने नागरिकता संशोधन कानून पर चुप्पी सी साध ली है। आंदोलन से जन्मी और विकल्प की पहचान वाली पार्टी एक ऐतिहासिक आंदोलन पर चुप है। नागरिकता कानून पर कोई पक्ष लेने के बजाए आम आदमी पार्टी के नेता किंतु-परंतु की भाषा बोल रहे हैं। इस कानून के खिलाफ रणनीति को लेकर कांग्रेस की अगुआई में हुई विपक्षी दलों की बैठक से आम आदमी पार्टी ने खुद को दूर ही रखा। बैठक में नहीं शामिल होने पर संजय सिंह ने हास्यास्पद तर्क दिया कि उन्हें तो इसके बारे में पता ही नहीं था। अब यह तो साफ दिख रहा है कि वे जाना चाहते तो इस बैठक के बारे में पता भी होता और इसके लिए कुछ वक्त तो निकाल ही लिया जाता। लेकिन केजरीवाल किसी भी मंच पर कांग्रेस के हाथ मजबूत करते हुए नहीं दिखना चाहते हैं। साथ ही अल्पसंख्यक वोटों को भी पाना चाहते हैं। इसलिए उनकी नीति है कि पूर्ण राज्य और नागरिकता कानून जैसे मुद्दों के बजाए बिजली-पानी और शिक्षा को ही केंद्र में लाकर बहस का विषय बनाया जाए।

सत्ता पक्ष ने खुद को स्थानीय और जन से जुड़े मुद्दों पर जोड़ लिया तो उसका असर विपक्ष की रणनीति पर भी पड़ा। दिल्ली में सत्तासीन आम आदमी पार्टी ने केंद्र की सत्ता वाली भाजपा को एक बड़ी टक्कर सबसिडी के मुद्दे पर दी है। जहां केंद्र सरकार सबसिडी को कम से कम करने की वकालत कर रही है वहीं केजरीवाल ने बिजली-पानी के शून्य बिल का शोर मचा दिया। मेट्रो और डीटीसी बसों में महिलाओं की मुफ्त यात्रा के वादे ने पूरे देश का ध्यान खींचा, जिसमें सरकारी बसों में यह वादा पूरा भी किया गया।

विभिन्न मंचों पर जब भाजपा और आम आदमी पार्टी के मतदाता एक हैं तो वह सबसिडी का मुद्दा है जो भाजपा पर भारी पड़ रहा है। जनता को रियायत देने का मसला केंद्र में लाने का असर यह है कि लोग कह रहे हैं कि राष्टÑीय मुद्दा तो अलग है स्थानीय अलग। महिलाओं की मेट्रो और डीटीसी बसों में मुफ्त यात्रा के मुद्दे का पहले तो भाजपा के स्थानीय नेताओं ने जमकर मजाक उड़ाया और बाद में उसी को लेकर संवेदनशील हो गए। विपक्षी दल कहने लगे कि सिर्फ महिलाओं को क्यों मर्दों ने क्या कसूर किया है, बजुर्गों और छात्रों को क्यों नहीं? रियायती सेवा पर आम आदमी पार्टी इक्कीस तो साबित हो चुकी है क्योंकि अब भाजपा और कांग्रेस उसी के मुद्दे पर उन्नीस-बीस कर रहे हैं। पहले केजरीवाल की रियायती योजना का मजाक उड़ाने वाले भाजपा प्रदेश अध्यक्ष अब आंसू बहाते हुए ‘गरीबी’ का रोना रोते हुए एक समय वह था जब मैं भी गरीब था जैसी बात कहने के लिए मजबूर हो गए हैं। हरियाणा, महाराष्टÑ और झारखंड का सबक दिल्ली के दलों पर साफ दिख रहा है। स्थानीय मुद्दों के हावी होने के बाद कल तक एक-दूसरे के जानी दुश्मन अब दोस्ताना मैच खेलते दिख रहे हैं। जब जनता गरम होती है तो राजनीतिक दलों को नरम होना ही पड़ता है। अब देखना है गरम जनता का दिल किसके लिए नरम रहेगा।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories
1 राजपाट: ईमानदारी का सिला
2 बेबाक बोलः सर्द दर्द
3 बेबाक बोलः उन्नीस बीस
ये पढ़ा क्या?
X