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बेबाक बोल: जिंदा हैं हम

विद्यार्थी का कहना है कि यह सिर्फ जेएनयू नहीं दुनिया के हर शिक्षा संस्थान को बचाने की बात है।

Author Published on: November 16, 2019 3:16 AM
विद्यार्थियों के आंदोलन के बाद आंकड़े पेश किए गए कि लगभग चालीस फीसद ऐसे विद्यार्थी हैं जो इतनी बढ़ी फीस चुकाने में नाकाम हैं।

‘अभी गनीमत है सब्र मेरा
अभी लबालब भरा नहीं हूं…
वो मुझको मुर्दा समझ रहा है
उसे कहो…मैं मरा नहीं हूं…’
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों के विभिन्न वाट्सऐप समूहों में यह शेर अग्रेषित हुआ। वहां के हर विद्यार्थी के मोबाइल में ये पंक्तियां बता रही हैं कि जेएनयू का मतलब क्या होता है। युवा तुर्क चंद्रशेखर के साथ सक्रिय राजनीतिक जीवन बिताने वाले पत्रकार रामबहादुर राय अक्सर कहते हैं कि युवाओं की शक्ति को कभी अनदेखा नहीं करें। इस लेख के साथ संलग्न चित्र को ध्यान से देखें तो समझेंगे कि रामबहादुर राय नौजवानों के इंकलाबी नारों पर सजदा क्यों हैं। एकजुट युवाओं का असर है कि आंशिक ही सही सरकार को कदम पीछे करने पड़े हैं।

लेख के साथ तस्वीर में जेएनयू के विद्यार्थी तिरंगे झंडे के साथ हैं। इस प्रदर्शन में जेएनयू के हर रंग के विद्यार्थी हैं। अन्य मांगों के साथ फीस वृद्धि सबसे बड़ा मुद्दा है जो अचानक से कई गुना बढ़ा दी गई। विद्यार्थियों के आंदोलन के बाद आंकड़े पेश किए गए कि लगभग चालीस फीसद ऐसे विद्यार्थी हैं जो इतनी बढ़ी फीस चुकाने में नाकाम हैं। अहम तथ्य यह है कि साठ फीसद छात्र, इन चालीस फीसद विद्यार्थियों के साथ हैं और कुल मिलाकर यह मामला सौ फीसद का बन जाता है कि शिक्षा सबके लिए एक समान और सस्ती हो। चालीस और सौ फीसद के बीच की खाई ही न बने। यह जेएनयू जैसी संस्थाओं की चारदीवारी है जो चालीस और साठ को मिला कर पूरे सौ बना देती है। इस परिसर में विद्यार्थियों के हाथों में तिरंगे का तीन रंग चमक उठता है।

सस्ती शिक्षा की मांग कर रहे इन विद्यार्थियों में कल कोई अभिजीत बनर्जी बनेगा तो कोई निर्मला सीतारमण, एस जयशंकर, डीपी त्रिपाठी या कोई सीताराम येचुरी। जेएनयू में 2019 के प्रवेश परीक्षा परिणाम आने के बाद सुर्खियों में रहने वाला नाम रामजल मीणा का था। मीणा जेएनयू परिसर में सुरक्षकर्मी की नौकरी करते थे। नौकरी करते हुए ही उन्होंने रूसी भाषा के कोर्स के लिए परीक्षा दी और उसमें उत्तीर्ण हुए। मीणा के साथ बड़े नेता, वकील, डॉक्टर, लेखक से लेकर पत्रकार तक के बच्चे भी उत्तीर्ण हुए थे जिनके लिए कितनी भी ऊंची फीस देना कोई मुश्किल बात नहीं है। लेकिन देश के लोगों ने सबसे ज्यादा उम्मीद देखी रामजल मीणा में। जेएनयू ऐसी जगह है जहां हर आर्थिक तबके के विद्यार्थी एक हैसियत से पढ़ाई कर सकते हैं। अमीरों के बच्चे इस परिसर में आकर सबसे पहले जो चीज भुलाते हैं वो है आर्थिक हैसियत। आपके माता-पिता क्या हैं, यह कोई मायने नहीं रखता, मायने यह रखता है कि आपके पढ़ने और सीखने का जज्बा क्या है।

एक पत्रकार होने के नाते जेएनयू परिसर में आना-जाना लगा रहता है। मजबूत आर्थिक हैसियत वाले एक विद्यार्थी से पूछा कि तुमने यहां दाखिला क्यों लिया, तुम तो कहीं महंगी जगह भी पढ़ सकते हो। उसका जवाब था कि स्वपोषित संस्थान का विकल्प मेरे पास था। लेकिन अब लगता है कि मैंने जेएनयू आकर इंसान बनने का जो विकल्प चुना वह ज्यादा सही था। जेएनयू की विविधता का अंदाजा इसका हिस्सा बनकर ही लगाया जा सकता है। आज मैं कामगारों से लेकर किसान तक की संतान के साथ बराबरी से उठता-बैठता हूं। शारीरिक चुनौतियां झेल रहा विद्यार्थी मेरे लिए सामान्य है। मणिपुर से लेकर कश्मीर के विद्यार्थी मेरे दोस्त हैं। मैं भारत के अंदर एक छोटे भारत में रहकर देश और उसकी मिट्टी से ज्यादा जुड़ गया हूं। यह मेरी वर्गीय समस्या थी कि मैं विद्यार्थियों के संघर्ष को अच्छी नजर से नहीं देखता था। आज मुझे समझ आया कि यह संघर्ष तो अब तक के पढ़े-लिखे का प्रायोगिक अभ्यास है। अगर आज हम अपने सहपाठी के साथ खड़े होना नहीं सीख पाए तो कल देश के साथ कैसे खड़े होंगे?

ताजा आंदोलन के बाद उसी विद्यार्थी ने रोष में कहा कि हर जगह विश्वविद्यालय प्रशासन पुस्तकालय की अवधि को सीमित करना चाहता है, रात में अब पुस्तकालय में नहीं पढ़ सकते हैं। उसने कहा कि किताबें तो हमारा ओढ़ना-बिछौना, खाना-पीना है। हैरानी है कि किसी को किताबों और पुस्तकालय से क्या चिढ़ हो सकती है। पुस्तकालय के समय को सीमित करने को किस तरह से न्यायसंगत ठहराया जा सकता है?

इस विद्यार्थी के साथ संवाद रुचिकर हो रहा था और वह विद्यार्थी से शिक्षक की भूमिका में आ चुका था। उसने कहा कि यह फीस वृद्धि तो अनुदान आधारित उस वैश्विक शिक्षा नीति का हिस्सा है जो विद्यार्थियों को लोन (कर्ज) या छात्रवृत्ति के खांचों में बांध देती है। पूरी दुनिया में संस्थानों को मजबूत करने की सरकार की जिम्मेदारी को बाजार के सुपुर्द किया जा रहा है। शिक्षा हासिल करने के बाद विद्यार्थी अपने सपनों को भूल कर्ज अदायगी के पिंजरे में कैद हो जाता है। पश्चिमी देशों की हालत यह है कि कुछ सालों बाद ही कर्ज लेने वाला ज्यादातर व्यक्ति नाकाम होकर बाजार की ओर से दागी घोषित कर दिया जा रहा है। दिल्ली विश्वविद्यालय से लेकर आइआइटी तक विभिन्न तरह के समझौतों पर दस्तखत कर धीरे-धीरे शिक्षा को पूरी तरह बाजार के हवाले किया जा रहा है। आइआइटी में अचानक से फीस बढ़ा दी गई और छात्र संघों के अभाव में उसे कबूल भी कर लिया गया।

विद्यार्थी का कहना था कि जेएनयू के साथ भी वही हो रहा है जो आइआइटी या डीयू के साथ हुआ। फर्क बस इतना है कि यहां विद्यार्थियों के बीच जागरूकता और एकता है। हमें अपने अधिकारों के लिए बोलना सिखाया गया है। यह मामला सिर्फ इस बार की वृद्धि का नहीं है कि इसे तीस गुणा या उसे तीन सौ गुणा बढ़ा दिया गया है। एक बार बाजार की दर पर इजाफा शुरू होगा तो यह सालाना होगा। आप डीयू का उदाहरण देखिए। राष्टÑमंडल खेलों के वक्त यहां के हॉस्टल को उन्नत किया गया कि मेहमान ठहरेंगे। लेकिन उसके बाद हॉस्टलों की फीस काफी बढ़ा दी गई। आरोप है कि डीयू में जो नया पत्रकारिता संस्थान खुला है उसकी फीस कमजोर तबके के विद्यार्थियों के लिए कमरतोड़ है और सुविधाएं स्तरहीन। वहां के विद्यार्थी भी लंबे समय से इसका विरोध कर रहे हैं।

उस विद्यार्थी ने कहा कि प्रक्रिया शुरू होगी तो कहां तक जाएगी कहा नहीं जा सकता। यह फीस वृद्धि यहीं तक नहीं रुकनी है। जल्द ही आपको एक सेमेस्टर के लिए हजारों और पूरे कोर्स के लिए लाखों खर्च करने पड़ जाएंगे। अच्छी शिक्षा के लिए अच्छे प्रोफेसर, प्रयोगशाला, पुस्तकालय और काफी सारे संसाधनों की जरूरत पड़ती है तो गुणवत्ता का सारा बोझ विद्यार्थियों की जेब पर होगा। एक निजी अस्पताल में डॉक्टर इलाज के दौरान जितनी बार दस्ताने बदलता है उसे भी मुनाफे के साथ मरीज से वसूला जाता है। आज कितने लोग हैं जो अच्छे निजी अस्पताल में इलाज करवा सकते हैं तो कल कितने लोग होंगे जो जेएनयू की फीस देने में समर्थ होंगे। ओडिशा का एक आदिवासी समुदाय का विद्यार्थी क्या यहां आ पाएगा? क्या बहुरंगी भारत की तस्वीर रह जाएगी।

विद्यार्थी का कहना है कि यह सिर्फ जेएनयू नहीं दुनिया के हर शिक्षा संस्थान को बचाने की बात है। भारत के हर शिक्षा संस्थान को हर भारतीय तक पहुंचाने की लड़ाई है। यह विद्यार्थियों को उपभोक्ता बनाने की मुखालफत है। यानी हमें विद्यार्थी बनाने की कीमत हमीं से वसूली जाएगी। हम जितना खर्च करेंगे उतनी ही योग्यता अर्जित कर पाएंगे। समाज के हाशिए का तबका फिर कहां जाएगा? समाज का जब बड़ा हिस्सा जेएनयू में आने से महरूम होगा तो वह ढांचा कैसा होगा? समाज में बराबरी लाने के सपने का क्या होगा?

स्वपोषित शिक्षा का ढांचा आगे कैसा होगा अभी तो साफ-साफ दिख नहीं रहा है न ही इसके प्रभावों की कोई भविष्यवाणी की जा सकती है। हां, जेएनयू ने एक बार फिर जो बहस शुरू की है उसे और बेहतर समझने की कोशिश में इस संवाद को साझा करना जरूरी लगा। शिक्षा पर यह बहस बढ़े और बहुरंगी भारत को बुलंद करने वाली समझ बने, यही उम्मीद है।

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