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बेबाक बोल: दुख है कयामत का

भारतीय स्वाधीनता संग्राम ने पूरे विश्व को अहिंसा का मूल्य दिया था, जिस पर चलने का दावा आज तक हमारी लोकतांत्रिक संस्थाएं करती आ रही हैं। अहिंसा के रास्ते पर वही चल सकता है जो मजबूत है। लेकिन आज झारखंड में मौत की सजा सुनाती भीड़ और विधायक आकाश विजयवर्गीय का कार्यपालिका पर वार करने के लिए उठा बल्ला हमारी सभी संस्थाओं को एक साथ ढहा रहा है। जब व्यवस्था की ही औकात खत्म हो जाती है तो हर कोई एक-दूसरे की औकात पूछने लगता है। लोकतंत्र के ढांचे पर काबिज होती वर्चस्व की हिंसा पर बेबाक बोल।

इंदौर में निगमकर्मी को बल्ले से पीटते हुए कैलाश विजयवर्गीय के बेटे आकाश।

हमें आपने वोट नहीं दिया तो फिर चुनाव के बाद हमारे पास अपने काम को लेकर नहीं आइएगा…जिन्हें मरने वालों पर सवाल करना है वो प्रेस कॉन्फ्रेंस से बाहर चले जाएं…आप जज हैं क्या? आप कौन हैं? आपकी हैसियत क्या है…?

इन तीन बिंदुओं और ऐसे उदाहरणों का कोई अंत नहीं। हमारा लोकतंत्र उन नेताओं से ये बातें सुनने का आदी हो गया है जो संवैधानिक तौर पर जनता के लिए चुने जाते हैं। बिहार के मुजफ्फरपुर में बच्चे इसलिए मर रहे हैं क्योंकि उनके पेट में पर्याप्त खाना नहीं पहुंच रहा है। एक मां के दो बच्चे थोड़ी देर के अंतराल पर बुखार की वजह से मर जाते हैं। जो बाप अपने बच्चे को अपनी खाली जेब के कारण खाना नहीं दे सका निजी एंबुलेंस वाले उससे बच्चे की लाश को ढोने के लिए चार हजार रुपए मांगते हैं। सरकारी एंबुलेंस का नंबर आते पता नहीं कितना समय लगेगा और रिश्वतखोरी वहां भी। कहते हैं कि बच्चों का जनाजा सबसे भारी होता है। लेकिन मां-बाप को उस वजन को ढोना है क्योंकि वो गरीब हैं। राज्य के मुख्यमंत्री सवाल करते लोगों को नफरत की निगाहों से देखते हुए सीट बेल्ट बांध कर जल्दी से निकल जाते हैं। उनके मन में तो होगा ही कि 34 बच्चियों के यौन उत्पीड़न के मामले में मेरी जिम्मेदारी तय नहीं हुई तो अब हमसे कौन सवाल पूछेगा। यूनानी विद्वान ने कहा था कि शांति काल में संतान पिता को दफन करती है लेकिन युद्ध के समय पिता संतान को दफन करता है। आज जब पिता अपने बच्चों का जनाजा उठा रहे हैं तो क्या हम बुनियादी सुविधाओं के मामले में युद्ध जैसी स्थिति से गुजर रहे हैं?

गोरखपुर से लेकर मुजफ्फरपुर तक गरीबी और जहालत की इन तस्वीरों के बीच एक विधायक जो इसलिए सत्ता की कुर्सी पर पहुंचे क्योंकि उनके पिता भाजपा के कद्दावर नेता हैं, अपने बल्ले से सरकारी अधिकारी को सरेआम पीटते हैं। इस शर्मनाक हरकत के बाद अपनी शिक्षा-दीक्षा के बारे में शान से कहते हैं-‘भाजपा में हमें सिखाया गया है पहले आवेदन, फिर निवेदन और फिर दनादन’। ऐसी शानदार शिक्षा वाले पुत्र के पिता पत्रकारों के सवालों पर पूछते हैं कि आप कौन हैं, आपकी हैसियत क्या है?

आकाश विजयवर्गीय का अधिकारियों पर चलता बल्ला हमारी सभी संस्थाओं को एक साथ ढहा रहा है। आज के दौर में सत्ता के इस अहंकार को किस तरह से देखा जाए? क्या यह एक नेता पुत्र को विरासत में मिले अहंकार का ही मसला है? और सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन सबके बीच जनता कहां खड़ी है?

आकाश विजयवर्गीय हिंसा और धौंस को जब जायज ठहराते हैं तो इस समस्या को सिर्फ उन तक ही केंद्रित नहीं किया जा सकता है। न ही सिर्फ उन पर अलग से बात करने का कोई फायदा है। सरकारी दस्ते की पिटाई करता आकाश का बल्ला उस बड़े खतरे की ओर इशारा कर रहा है, जहां लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए कोई जगह नहीं बच जाती है। सार्वजनिक तौर पर वर्चस्व का विचार कमजोर को ही डंडे से हांकता है। प्रेस कॉन्फ्रेंस में विधायक पर जूते बरसाते सांसद हों या आकाश, इन वायरल दृश्यों का सबसे बड़ा खतरा यह है कि अब किसी को भी राजनीतिक रूप से सही दिखने की जरूरत महसूस नहीं होती है।

आधुनिक भारत में हमारे मूल्यबोध का समय स्वाधीनता संग्राम से शुरू होता है। महात्मा गांधी की अगुआई में चले लंबे संघर्ष और आजादी के बाद हिंदुस्तान ने पूरी दुनिया को अहिंसा का मूल्य दिया। कमजोर लोग अहिंसा के रास्ते पर नहीं चल सकते। अहिंसा के रास्ते पर वही चल सकता जिसके पास ताकत है, और यह ताकत उसी के पास है जो लोकतांत्रिक मूल्यों को समझ और बरत सकता है।

अभी तक हमारी लोकतांत्रिक संस्थाएं इसी मूल्य को लेकर चलने का दावा करती रही हैं। पुलिस के पास ताकत है तो उसे सहनशील होना चाहिए, सेना ताकतवर है तो उसे कमजोर पर वार नहीं करना है। आज भी हमारी निंदा की जद में सबसे पहले पुलिस का लाठी चलाना ही आता है। हमारे मूल्य कहते हैं कि पुलिस और सेना की ताकत उसमें अंतर्निहित है तो उसे सहनशील होना ही होगा। पुलिस की लाठी और सेना की गोली कमजोर पर चलाने के लिए नहीं कमजोर की रक्षा के लिए है। आज भी अदालत हमारा अंतिम सहारा है जहां से न्याय पाकर कमजोर से कमजोर इंसान कहता है कि भगवान के घर में देर है अंधेर नहीं। अब इन्हीं लोकतांत्रिक संस्थाओं पर वर्चस्व का खतरा मंडरा रहा है।

आज जिसे भी ताकत मिल रही है वो खुद को सहनशील नहीं ताकतवर दिखाना चाह रहा है। हम सब यह जानते और मानते हैं कि ताकत अगर अनियंत्रित हो जाए तो लोकतांत्रिक संस्थाएं नहीं बचेंगी। आकाश विजयर्गीय का पिटाई के लिए उठा बल्ला विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और पत्रकारिता सब पर सवाल उठा रहा है। न्यायपालिका और कार्यपालिका के काम पर विधायिका का बल्ला चलता है और उनके पिता पत्रकारिता से पूछते हैं कि तुम्हारी औकात क्या है। इन सबके बीच जनता है जिसके राजनीतिकरण का सवाल है। जनता का राजनीतिकरण किन मूल्यों पर हो रहा है। यह अगर झारखंड जैसी घटनाओं की ओर जा रहा है तो कितनी देर तक और किसके बचने की उम्मीद करें। हमने चोर को पकड़ लिया और खुद ही सजा देने बैठ गए। विधायक निगम के दस्ते पर बल्ला चलाते हैं तो कहीं किसी दूर गांव में लोगों की भीड़ फैसला कर लेती है कि वह अपनी तरह से सजा देने के लिए किसी की जान भी ले सकती है। विधायक अपने स्तर पर हिंसा कर रहा है और जनता अपने स्तर पर।

किसी की जान लेने वाली झारखंड की भीड़ से लेकर हिंसा करता विधायक तक, आज राजनीतिकरण की पूरी प्रक्रिया पर ही सवाल है। हमने जीत लिया, हम बहुमत में हैं और हम ही मूल्य तय करेंगे। दूसरी अति यह कि आप बहुमत में हैं, सत्ता में हैं तो बुखार से मर रहे बच्चों के लिए या भीड़ की हिंसा में मर रहे लोगों के लिए हम क्यों बोलें। हिंदुस्तान के इतिहास में ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि लगातार दूसरी बार कोई एक ही पार्टी शासन में आई है। प्रचंड बहुमत से आए या सामान्य बहुमत से सत्ता तो सत्ता ही होती है। लेकिन हमारा विपक्ष यह इतिहास बनाने में जरूर लगा है कि बिना सत्ता हमें लोक के लिए खड़ा नहीं होना। वहीं सत्ता पक्ष का यह हाल है कि कोई अय्यर या थरूर बोलें तो तमाम भगवा कुनबा कांग्रेस नेतृत्व पर टूट पड़ता है कार्रवाई के लिए। लेकिन विजयवर्गीय को लेकर हर तरफ सन्नाटा है।

वर्चस्व और हिंसा का यह इल्जाम पूरी व्यवस्था पर है। तुम्हारी हैसियत क्या है, से पत्रकारिता के मूल्यों को खत्म मान लिया जा रहा है। हर तरफ से लोग मीडिया से उसकी औकात पूछ रहे हैं। मीडिया से उसकी औकात ऐसे पूछी जा रही है जैसे वह अन्य इकाइयों से अलग मंगल ग्रह पर स्थित कोई संस्था हो, उसका लोकतंत्र के अन्य खंभों से कोई अन्योन्याश्रित संबंध नहीं है। जब बाजारीकरण समाज और जीवन का मूल्य बन जाएगा तो पत्रकारिता कैसे बची रह सकती है। जब व्यवस्था ढह रही हो तो कोई एक नेता या एक पत्रकार उसे नहीं बचा सकता है। आज जरूरत है राजनीतिक व्यवस्था और मूल्यों को बचाने की। जब व्यवस्था की हैसियत खत्म हो जाती है तो हर कोई एक-दूसरे की हैसियत पूछने लगता है। बिना सामूहिक शोक के हम नवनिर्माण के जोश में नहीं आ सकते। अब नहीं तो कब। आज व्यवस्था वर्चस्व की हिंसा और मुजफ्फरपुर में मरते बच्चों पर चुप रहने का आसान विकल्प तलाश सकती है। लेकिन सनद रहे…

जब्त लाजिम है मगर दुख है कयामत का फराज
जालिम अब के भी न रोएगा तो मर जाएगा।

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