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बेबाक बोल: कुनबा क्रांति

हाल ही में करुणानिधि की मौत के बाद वारिसों के सत्ता संघर्ष ने दक्षिण की उस शक्तिशाली पार्टी की नींव हिला दी जो उत्तर में केंद्र की सरकार के लिए किंग मेकर की भूमिका निभा चुकी थी। एनटी रामाराव की मौत के बाद टीडीपी का पारिवारिक संघर्ष राजनीतिक विचारधारा को ध्वस्त कर गया। बिहार में राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद के जेल जाने के बाद दोनों बेटों की खींचतान और उसका पार्टी पर पड़ रहा नकारात्मक असर सामने आ ही जाता है। वहीं हरियाणा में पिछले डेढ़ दशक से सत्ताहीन पारिवारिक भावनात्मक लड़ाई में उलझा इनेलो क्षेत्रीय क्षत्रपों के अवसान की अपने हिस्से की गाथा लिख रहा है। इनेलो का गृहयुद्ध एक बार फिर यही साबित कर रहा कि किसानी और जाति आधारित समाजवादी वैकल्पिक लड़ाई गृह युद्ध के राजनीतिक युद्ध में तब्दील हो जाती है। क्षेत्रीय क्षत्रपों का खानदान जितना बड़ा, विकल्प की राजनीति कितनी छोटी हो जाती है इसी की पड़ताल करता बेबाक बोल।

हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला की फाइल फोटो। (Express File Photo)

मुझे यकीन नहीं होता कि ओम प्रकाश चौटाला ने मेरे निष्कासन पर हस्ताक्षर किए होंगे…। हिसार के सांसद दुष्यंत सिंह चौटाला का यह बयान भारतीय वैकल्पिक राजनीति की विडंबना है। दोनों बेटों के बाद पिता अजय चौटाला को भी पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। इससे पहले अजय के दोनों बेटे दुष्यंत और दिग्विजय को पार्टी से निकाला जा चुका है। चौटाला के छोटे बेटे अभय को दुख है कि भाई ने उन्हें दुर्योधन और भतीजे ने जयचंद कहा। जनता ने तो यह भी याद रखना छोड़ दिया कि कौन कब जेल में है और कब जेल से बाहर। इस पारिवारिक गृहयुद्ध के बीच तथ्य यह है कि 2014 के हरियाणा विधानसभा चुनाव में इनेलो को महज 24 फीसद वोट मिले थे। हरियाणा की 90 सीटों वाली विधानसभा में 19 सीटों पर ही पार्टी अपना झंडा गाड़ पाई थी।

इंडियन नेशनल लोकदल। कभी यह नाम हरियाणा की पहचान बना था। दिल्ली से सटे सूबे हरियाणा के इस छोटे दल ने एक समय में इतना बड़ा कारनामा किया था कि वीपी सिंह की सत्ता का मजबूत खंभा बना था। हरी पगड़ी, हरियाणवी भाषा बोलने वाले किसान नेता राष्टÑीय स्तर पर छा गए थे और भारतीय राजनीति में नया विकल्प बनकर उभरे थे।
वही हरियाणा और वही इनेलो, लेकिन आज समर्थकों को यही याद करने में दिमाग उलझाना पड़ जाएगा कि इस परिवार का कौन सा सदस्य किसके साथ है। पिछले पंद्रह सालों से सत्ताहीन पारिवारिक भावनात्मक लड़ाई में उलझा हरियाणा का यह राजनीतिक दल क्षेत्रीय क्षत्रपों के अवसान की अपने हिस्से की गाथा लिख रहा है।

इंडियन नेशनल लोकदल की बात हमें उस दौर से करने होगी जब कांग्रेस के विकल्प में समाजवाद का नारा दिया गया था। जयप्रकाश नारायण जैसे नेताओं ने यूरोपीय समाजवाद से भिन्न समाजवाद का भारतीय संस्करण निकाला था। इस भारतीयकरण का संदर्भ था खेती-किसानी और जाति आधारित राजनीति। गांवों में बसा भारत और जाति का कड़वा सच। इस भारतीय समाजवाद का निशाना थीं मध्यवर्गीय खेती पर आधारित जातियां। यह राजनीति हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार से लेकर कर्नाटक यानी उत्तर से दक्षिण तक फैली और क्षेत्रीय क्षत्रपों का नया मुहावरा गढ़ा गया। हरियाणा में जाट, उत्तर प्रदेश और बिहार में यादव जाति आधारित ताकत बनकर उभरे। दक्षिण में देवगौड़ा यही मध्यवर्गीय किसानी की राजनीति कर रहे थे। इन क्षेत्रीय दलों की बुनियाद उन किसानों की गोलबंदी थी जो मध्यवर्गीय तबके के होने के कारण समाज और राजनीति पर पकड़ रखते थे। इनकी लामबंदी का नतीजा दिल्ली की सत्ता में मजबूत दखल के रूप में दिखा था।

मुश्किल यह रही कि उत्तर से दक्षिण तक जहां मध्यवर्गीय खेतिहरों का दखल था, वहां की राजनीति में विचारधारा गौण होकर पहले जाति और फिर परिवारवाद का खेल ही प्रमुख रह गया। मंडल बनाम कमंडल के दौर में ये क्षेत्रीय पार्टियां मजबूत तो हुर्इं लेकिन किसी ठोस विचारधारा के अभाव में इनका बिखराव भी तेजी से हुआ। सारी पार्टियां जातिगत अस्मिता से सिकुड़ कर खानदानी होकर रह गर्इं और सत्ता का संघर्ष बनाम कुनबे का कलह हो गया। अगली पीढ़ी में गद्दी किसे मिले की लड़ाई में ही सारी ऊर्जा खर्च होने लगी। पार्टी के संस्थापक की जितनी संतान आगे पार्टी के लिए उतना ही बड़ा घमासान तय है।

इनेलो से लेकर जनता दल और राजद तक का गठन खेती, पशुपालन पर आधारित किसान नेताओं के तौर पर हुआ। लेकिन पहली पीढ़ी के बाद इन नेताओं की संतानें किसान नहीं रहीं। लालू, मुलायम या चौटाला की संतानों की पहचान खेती-किसानी वाली नहीं है। आधुनिक विकास की पहचान के साथ इनकी संतानों का संबंध जाति आधारित भी नहीं रहा। किसानी और जाति के इतर कंप्यूटर, साइबर, और इंटरनेट वाले विकास की परिभाषा में इनकी नई पहचान बन नहीं पाई और पुरानी पहचान के साथ आगे का रास्ता नजर नहीं आता है।

आज गुरुग्राम जैसी साइबर और मिलेनियम सिटी के बरक्स सोनीपत, सिरसा और हिसार का नजारा देखें। इन जगहों पर चौटाला परिवार का किला किसी राजा के किले से कम नहीं है। जहां तक आंख जाती है उस जगह तक को घेरती जमीन पर गगनचुंबी द्वार। ज्यादातर जगहों पर सारे के सारे पार्क देवीलाल के नाम से हो गए। गली से लेकर बाग तक का पूरा मामला खानदानी हो गया। किसानी से शुरू हुआ समाजवादी मॉडल भारत के प्राचीन राजतंत्र के मॉडल में बदल गया। जैसे राजतंत्र में कुरुक्षेत्र में पांडवों और कौरवों के बीच कौन बनेगा राजा जैसी लड़ाइयां होती थीं वैसी ही रणभेरी बजी है। दुर्योधन से लेकर जयचंद तक के पौराणिक और मध्यकालीन मुहावरे हैं। हरियाणा के नए बसे शहरों की ऊंची इमारतों के नाम फ्रांसीसी और स्पैनिश में रखे जा रहे हैं लेकिन नेता अपनी पुरानी छवि में ही सिमटे हुए हैं। किसानों की संतानें शॉपिंग मॉल खोल चुके हैं और आधुनिक गाड़ियां चला रहे हैं और आप जहां थे वहीं खड़े हैं। पार्टी के विरासती नेताओं की पहचान देवीलाल और ओपी चौटाला के कद तक नहीं पहुंच पा रही है।
यह सही है कि दुष्यंत चौटाला इंटरनेट और डाटा वाली नई पीढ़ी के बीच लोकप्रिय होने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन अब अगर इनेलो के युवा समर्थक दुष्यंत के साथ हैं तो उनके ताऊ चौटाला के साथ हैं। सबके घर के ताऊ कहेंगे कि बड़े चौटाला जो कह रहे, अंत में हमें वहीं करना है। अंत में सब वहीं जाएंगे जहां जेलयाफ्ता चौटाला बताएंगे। जेल से तो अपने किले में ही आएंगे।

खानदान, जेल और किसान। इनेलो का पारिवारिक टकराव किसान और जाति आधारित राजनीति की सीमा बता रहा है जो खानदान पर सिमट गई है। विचारधारा से शुरू हुई यह राजनीति अब परिवार के आगे नहीं जा पा रही है। यह विडंबना उत्तर प्रदेश से लेकर बिहार और हरियाणा तक की क्षेत्रीय पार्टियों की हो चुकी है। समाजवादी पार्टी, अकाली दल, तेलुगु देशम पार्टी, नेशनल कांफ्रेंस से लेकर डीएमके तक। कांग्रेस के विकल्प में बनी ये पार्टियां विकल्प और संकल्प के रूप में अपने कुनबे से बाहर नहीं निकल पा रही हैं। खानदान जितना बड़ा, विकल्प की राजनीति उतनी ही छोटी होती जा रही है। करुणानिधि, मुलायम के खानदान से लेकर चौटाला के खानदान सब एक-दूसरे की कब्र खोद रहे हैं। किसान और जाति आधारित ये क्षेत्रीय क्षत्रप आधुनिक मूल्यों के साथ विकल्प बनने में विफल हो रहे। भारत में खेती और मवेशी से निकला समाजवाद अब बस परिवारवाद है।

ये क्षेत्रीय क्षत्रप जो राजग के खिलाफ गठबंधन की उम्मीद थे अपने घर के अंदर ही टूट-फूट रहे हैं। इनके व्यक्तिगत उत्थान के संकल्प के सामने कोई शब्द बेसाख हुआ है तो वह विकल्प ही है। जब रजनीकांत कहते हैं, ‘दस व्यक्ति एक के खिलाफ हों, तब कौन ताकतवर होगा’ तो वो इस पूरे वैकल्पिक गान पर सवाल उठाते हैं। आपकी राजनीति, रणनीति क्या है? इसका-उसका मौखिक विरोध और अपने परिवार का साथ। जनता तो आपके साथ आई लेकिन आपने जनता के साथ आना नहीं सीखा।

विकल्प के नाम पर विचारधारा की राजनीति पहले जाति और उसके बाद परिवार पर सिकुड़ी और वारिस को सत्ता हस्तांतरण के नाम पर चला गृह यद्ध राजनीतिक युद्ध में बदल गया। जो वारिस हैं वे न तो एनटी रामाराव हैं और करुणानिधि हैं, न लालू यादव, मुलायम सिंह यादव और न देवीलाल जो कैडर खड़ा रखने की क्षमता रखते थे। एक से ज्यादा संतान के बाद हुआ परिवार विभाजन विकल्प के संकल्प को खंडित कर चुका है। और इसके बाद तैयार होता है वही भाजपा और कांग्रेस आधारित दो धु्रवीय राजनीति का रास्ता।

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