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बेबाक बोल: अंधा संघर्ष

दूरदराज के इलाकों में ‘विकास’ पर सवाल उठा कर लाल क्रांति का घेरा डाल दिया। जो सड़क, अस्पताल और स्कूल पहुंच सकते थे वंचित तबकों को उससे भी दूर कर दिया। एक दशक से लंबे समय में जहां लोगों ने मताधिकार का इस्तेमाल नहीं किया वहां लोकतांत्रिक सरकार पहुंचाने की कवायद के खिलाफ पत्रकार तक की हत्या कर दी। उसके बाद फतवा जारी कर दिया कि सुरक्षाबलों के साथ आने वाले सरकारी कर्मचारी और पत्रकार न आएं। भारत में नक्सली क्रांति के नाम पर अराजकता और हिंसा की आक्रामकता बढ़ती जा रही है। सौ साल पहले जब रूस में क्रांति हुई थी, तब से लेकर आज तक पूंजी और समाज का ढांचा पूरी तरह बदल चुका है। इस बदले समय में नक्सल आंदोलन के नाम पर दूरदराज के इलाकों में प्रभुत्व पाने की जंग चल रही है। नक्सल प्रभावित कई इलाकों में माओवादी तय करते हैं कि चुनाव होंगे या नहीं, अगर होंगे तो भाजपा या कांग्रेस में से किसका उम्मीदवार जीतेगा। संसद के खिलाफ जंग का एलान कर बंदूक के बल पर चुनाव प्रबंधन किया जा रहा है। इस अंधे संघर्ष पर बेबाक बोल।

पुलिसवालों की बर्बर हत्या पर किसी को क्यों जश्न मनाना चाहिए।

संघर्ष वाले इलाकों में पत्रकार और अलग-अलग कर्मचारी लोग पुलिस के साथ न आएं’। छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में माओवादियों के हमले में दूरदर्शन के कैमरामैन अच्युतानंद साहू की मौत पर कथित माओवादी कमांडर ने पत्रकार की मौत पर इस तरह की संवेदना जताई थी। यह संवेदना भी इसलिए भेजी गई थी क्योंकि मौत के पहले अच्युतानंद का ही बनाया वो वीडियो घर-घर पहुंच गया जिसमें उन्होंने अपनी मां को आखिरी संदेश दिया था। पूरा देश गुस्से में था तो अपनी छवि की सफाई जरूरी लगी और शोक संदेश जता दिया। ईमानदारी से अपना काम करने वाला पत्रकार शहीद हो जाता है और ‘लाल क्रांति’ की तरफ से चेतावनी आती है कि पुलिसवालों के साथ आओगे तो मारे जाओगे।

ये ‘पुलिसवाले’ कौन हैं जिन्हें माओवादी सरकारी कर्मचारियों और पत्रकारों के बरक्स अन्य में रख रहे हैं। पुलिसवालों की बर्बर हत्या पर किसी को क्यों जश्न मनाना चाहिए। हमारे और आपके बीच में कौन पुलिसवाला या सेना का जवान बनता है। क्या किसी बहुत बड़े पूंजीपति की संतान पुलिस में जाती है। क्या किसी बड़े राजनीतिक, डॉक्टर, वकील, पत्रकार, साहित्यकार, कलाकार, कंप्यूटर इंजीनियर की संतान को भारत के किसी भी राज्य की पुलिस के सामान्य ओहदे पर जाते सुना है?

जो सुरक्षा जवान नक्सली हिंसा में मारे जाते हैं उनकी पृष्ठभूमि देखिए। जवान का शव जब तिरंगे में लपेट कर आता है तो किसी खेती-किसानी करने वाले के आंगन में पहुंचता है या किसी सामान्य शहरी परिवार का छोटा सा घर होता है। बाप ने खेत बेच कर किसी तरह पढ़ा कर पुलिस या सेना में भर्ती करवाया था और वह कर्जदार बूढ़ा कंधा बेटे की लाश उठा रहा है। एक आम हिंदुस्तानी औरत का पुलिसवाला पति शहीद हो जाता है तो उसका दर्द फूटता है कि बच्चों का क्या होगा। छोटे बच्चे तो यह समझ ही नहीं पाते कि उनके पिता किसके लिए दुश्मन थे और किसके लिए शहीद हो गए।

इसी वर्ग के पुलिसवालों के साथ नहीं आने की धमकी नक्सलियों ने दी है। ये वो पुलिसवाले हैं जो खूंखार अपराधियों के साथ मुठभेड़ के लिए आम हथियारों के साथ जाते हैं और जब वो हथियार न चले तो मैदान छोड़ने के बजाय मुंह से ठांय ठांय की आवाज निकालते हैं। पहली नजर में वो ठांय ठांय का वीडियो देख कर हंसी आ सकती है, मजाक सूझ सकता है लेकिन जरा सोचिए कि वह ठांय ठांय किस भयावह हालात में किया गया। हमारे देश में पुलिसवालों के साधनों और प्रशिक्षण का हाल सबको पता है। इस माहौल में नक्सली वंचित तबकों की लड़ाई लड़ने का दावा करते हुए वंचितों से थोड़ा ऊपर उठे हुए तबके की हत्या कर रहे हैं। ये उनसे ऊपरी वर्ग के पत्रकार और सरकारी कर्मचारी को नहीं मारेंगे लेकिन पुलिस और सेना के जवान को मारेंगे।

पिछले सालों के दौरान नक्सली हिंसा में जो आक्रामकता आई है उसे आंध्र प्रदेश से आई खबर के संदर्भ में समझ सकते हैं। आंध्र की अराकू घाटी में माओवादियों द्वारा तेदेपा के विधायक और एक पूर्व विधायक की हत्या की तफ्तीश के दौरान सूबे की पुलिस इस नतीजे पर पहुंची कि नंबल्ला केशव राव के रूप में नक्सलियों ने नया नेतृत्व चुना है। 72 साल के मुप्पला लक्ष्मण राव उर्फ गणपति की जगह 63 साल के केशव राव उर्फ बासवाराज को नक्सली गतिविधियों का सरगना बनाया गया है। नक्सलियों का यह नया नेता वारंगल के एक इंजीनियरिंग कॉलेज से स्नातक है।

कल का भावी इंजीनियर आज नक्सलियों का सरगना बन बैठा है और सुरक्षा जवानों की हत्या कर रहा है। सवाल है कि इनकी वैचारिक पृष्ठभूमि क्या है और ये किसके खिलाफ क्रांति कर रहे हैं। ये उन जवानों को मार रहे हैं जो किसी किसान या आम नागरिक के बेटे हैं। ये खुद को आदिवासियों और अन्य वंचित तबकों का स्वयंभू रक्षक घोषित कर खुद की समानांतर सत्ता चला रहे हैं। नक्सलवादी खुद को कम्युनिस्ट कहते हैं। दावा करते हैं कि वे संसाधनों पर वर्चस्ववाद की मुखालफत में हैं। एक सदी पहले रूस में क्रांति हुई थी। संसाधनों पर मजदूरों के मालिकाना हक के नारे के सौ साल पूरे हो गए और भारत के संदर्भ में नक्सलबाड़ी आंदोलन के 50 साल पूरे हो गए हैं। लेनिन के दौर में जो अक्टूबर क्रांति आई थी वह आज के दौर में आंध्र प्रदेश में कितनी प्रासंगिक है।

भारत में 50 सालों के नक्सलबाड़ी आंदोलन की दशा और दिशा पर विशेषज्ञ अपनी बातें रख चुके हैं। आधे दशक में जितने लोगों की शहादत हुई है उसके बरक्स का हासिल क्या है? सौ साल पहले अक्टूबर क्रांति के समय जो पूंजी का स्वरूप था क्या आज भी वही है। आज जिस तरह से विकास हुआ है और वैश्विक पूंजी नया औजार है, वहां क्या लाल क्रांति किसी वैचारिक परिप्रेक्ष्य में है या एक संघर्षशील विरासत का रुमान जो उन्हीं लोगों के खिलाफ खड़ा हो जाता है, जिनके हक की लड़ाई की हुंकार भरता है। बंगाल से लेकर झारखंड व आंध्र से लेकर छत्तीसगढ़ तक में नक्सली आंदोलन का ढांचा देखिए। यह कोई ठोस परिवर्तन लाने के बजाए दुस्साहस ही साबित हुआ है जिसमें नुकसान कमजोर तबके का ही हुआ है। यहां सिर्फ जज्बातों को उभार कर कमजोर तबके के ऊपर समानांतर सत्ता स्थापित की गई और जनतांत्रिक तौर-तरीकों से बदलाव लाने की गुंजाइश ही खत्म कर दी गई। जो तबका लोकशाही में एक कदम आगे बढ़ सकता था उसे नक्सलियों की हिंसा में दो कदम पीछे कर दिया गया।

आंध्र में नया माओवादी नेतृत्व तैयार हो रहा है। किशनजी के मारे जाने के बाद जिस बंगाल में नक्सली नेस्तोनाबूत कर दिए गए थे वहां आज माओवादियों के फिर से मजबूत होने की खबरें हैं। जिन इलाकों में माओवादी मजबूत हैं तथ्य बताते हैं कि वे हिंसा के साये में चुनाव प्रबंधन की क्रांति कर रहे हैं। आरोप है कि छत्तीसगढ़ के कई इलाकों में नक्सली तय करते हैं कि वहां भाजपा जीतेगी या कांग्रेस। चुनाव बहिष्कार के नारे के बीच वे तय करते हैं कि कौन जीतेगा चुनाव। नक्सली संसद का अपमान कर चुनाव तो नहीं लड़ते लेकिन संगीनों के बल पर वहां अपना नियंत्रण चाहते हैं। लोकतांत्रिक चुनावों में इस तरह की लाल क्रांति किस मजदूर और आदिवासी का भला करेगी।

रूस में हुई अक्टूबर क्रांति के समय दुनिया का आर्थिक ढांचा अलग था। आज सौ साल बाद जब पूंजी, सेना, रक्षा से लेकर जनसंचार के तरीके बदल गए हैं तो आप किस तरह से नए ढांचे में पुराने समय की क्रांति खोज रहे हैं। भारत में नक्सली रॉबिनहुडनुमा क्रांति की छवि गढ़ने की कोशिश में लगे रहे हैं। सरकारी योजनाओं की असफलता है कि हरियाणा में कोई बाबा अपने डेरे में भक्तों का इलाज कराने लगता है और स्कूल चलाने लगता है तो सुदूर इलाके में नक्सली इंसाफ के देवता बन बैठते हैं, घूसखोर सरकारी अफसरों को सजा देने लगते हैं और जांबाज जवानों को गरीबों का दुश्मन बता उसकी हत्या कर क्रांति घोषित करते हैं। नक्सली हिंसा एक बर्बर अपराध है और हमारी लोकतांत्रिक सरकार की नाकामियों का सबूत। सरकार जब नाकाम होती है तो हरियाणा के किसी डेरे का बाबा सरकार की संप्रुभता को चुनौती दे बैठता है तो दुर्गम इलाकों में नक्सली सरकार के ढांचे को तहस-नहस कर अपनी संसद चलाने लगते हैं। यह फौरी जरूरत है कि सरकार देश के अंतिम आदमी तक लोकतांत्रिक ढांचे का विकास पहुंचाए और हत्यारों की सत्ता को बेदखल करे।

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