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बेबाक बोल: मुंतजिर-ए-वादा

भारत विभाजन के साथ ही अपने भौगोलिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक कारकों व सामरिक महत्त्व के कारण कश्मीर की स्थिति विशिष्ट हो गई। अपनी इसी विशिष्टता के कारण कश्मीर और वहां की जनता को भारतीयता और जनतांत्रिकता के साथ जोड़ने के लिए एक संवेदनशील राजनीति की जरूरत थी। लेकिन आजादी के बाद से ही दिल्ली दरबार वाली केंद्र सरकार ने वहां दांव-पेच और घुसपैठ की जो राजनीति शुरू की वह कांग्रेस व दिल्ली के स्वरूप के रूप में ‘भारत’ की राजनीति के तौर पर देखा गया और भारत का यह स्वर्ग भारतीयता और जनतांत्रिकता से दूर होता गया। शेख अब्दुल्ला की सरकार को भंग करने से लेकर आज के दौर में विधानसभा भंग करने के फैसले तक में हम देखते हैं कि येन-केन-प्रकारेण सत्ता हासिल करने की कवायद वहां लोकतंत्र को मजबूत होने नहीं दे रही। कांग्रेस और भाजपा की महत्त्वाकांक्षी राजनीति का जो असर आम कश्मीरियों को भुगतना पड़ रहा है उसकी पड़ताल करता बेबाक बोल।

जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक। (एक्सप्रेस फोटोः प्रवीण जैन)

सरकारें क्या सोशल मीडिया से बनती हैं? न ही मैं ट्वीट करता हूं और न देखता हूं। मैंने बुधवार का दिन विधानसभा भंग करने के लिए इसलिए चुना क्योंकि कल पवित्र दिन था, ईद थी’। पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती सईद के बाद पीपुल्स कांफ्रेंस के नेता सज्जाद लोन ने भी भाजपा के समर्थन से सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया तो जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल ने विधानसभा ही भंग कर दी। सत्यपाल मलिक ने उपर्युक्त शब्दों के साथ विधानसभा भंग करने के जो कारण दिए हैं वे शब्दश: सहेज कर रखने लायक हैं। इनका इस्तेमाल भारत के अन्य भूक्षेत्रों पर भी होना चाहिए जहां राजनीति तो बस दल-बदल ही है। विधानसभा भंग करने का कारण बताते हुए सत्यपाल मलिक कहते हैं, ‘ये वे बल हैं जो जमीनी लोकतंत्र बिल्कुल नहीं चाहते थे और अचानक यह देखकर कि उनके हाथ से चीजें निकल रही हैं एक अपवित्र गठबंधन करके मेरे सामने आ गए। मैंने किसी के साथ पक्षपात नहीं किया। मैंने जो जम्मू-कश्मीर की जनता के पक्ष में था वह काम किया’। नेकां और पीडीपी के प्रेम पर रस्मअदायगी के तौर पर पाकिस्तान को भी ले आया गया और जब दो प्रेमियों ने अपने पवित्र प्रेम पर पाक के दाग को साबित करने की चुनौती दी गई तो शब्द-वापसी का भी कार्यक्रम पेश हुआ।

सत्यपाल मलिक। जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल के रूप में यह नाम सामने आते ही राष्टीय मीडिया की सुर्खियां बना। मलिक जैसे राजनीतिक रूप से सुलझे हुए व्यक्ति को इस अहम सूबे का मुखिया बनाने को उम्मीद की किरण के रूप में देखा गया। जब तक किसी ने दावा पेश नहीं किया था, तब तक तो सब कुछ ठीक था। लेकिन दावेदारी सामने आते ही अपवित्रता, फैक्स मशीन और पता नहीं क्या-क्या सामने आ गए। चलिए हम मान लेते हैं कि आपने संविधान सम्मत फैसला लिया और हम संविधान के साथ चलने वालों में से हैं। लेकिन आपके इस फैसले और हर विरोधी पार्टी के साथ पाकिस्तान जोड़ देने के चलन का जो घातक परिणाम सामने आ सकता है, और आया भी है उस पर भी बात कर लें।

राज्यपाल ने जो फैसला किया और राज्य के मामलों से जुड़े नेता ने जो इस पूरी कवायद को पाकिस्तान से जोड़ दिया वह नया नहीं है। यह मामला अगर कर्नाटक का होता, बिहार का होता और मध्य प्रदेश का होता तो अन्य राजनीतिक विडंबनाओं की तरह इसे भी देख कर आगे की कार्रवाई पर नजर रखी जाती। लेकिन यह सब जहां हो रहा है वह कश्मीर है, और आज के समय का यह कड़वा सच है कि यह भारत के अन्य इलाकों की तरह सामान्य नहीं है। सामरिक दृष्टि से अहम इस इलाके की त्रासदी रही है कि इसे विशिष्ट बना कर रखा गया है, और भारत का लोकतंत्र वहां अभी भी एक भ्रम है। आज जब केंद्र में राजग की सरकार है और उसके द्वारा नियुक्त राज्यपाल ने जो वहां किया वह नया भी नहीं है। आजादी के बाद भारत की लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई कांग्रेस सरकार ने भी वहां यही किया था। आज नेशनल कांफ्रेंस ने अपना नाम पाकिस्तान से जोड़ने पर गहरी नाराजगी जताई और इसके सबूत मांगे। इसी नेशनल कांफ्रेंस का इतिहास कश्मीर में शेख अब्दुल्ला के साथ शुरू होता है। कश्मीर में किसान आंदोलन जैसी प्रगतिशील मुहिम शुरू करने वाले शेख अब्दुल्ला दिल्ली दरबार के द्वारा खलनायक बना दिए जाते हैं। शेख अब्दुल्ला की सरकार को भंग करने के साथ ही दिल्ली ने कश्मीर को विशिष्ट बनाने की जो नींव डाली आज उसपर अलगाववाद का भव्य किला बन गया है।

भारत से पाकिस्तान विभाजन और अपने भौगोलिक कारण से कश्मीर नए आजाद भारत का नाजुक अंग बन चुका था। लेकिन इस नाजुक अंग की ठीक से देखभाल कर लोकतांत्रिक रूप से मजबूत बना अपने पैरों पर खड़ा करने के बजाए दिल्ली दरबार ने घुसपैठ की राजनीति का रास्ता चुना। इस घुसपैठ की अवसरवादी राजनीति का बुरा असर हुआ कि कश्मीर भौगोलिक रूप से दिल्ली से जितना दूर था उस दूरी को ‘भारत’ की दूरी बना दी गई। इस वजह से कश्मीर में वैधानिकता और जनतांत्रिक प्रक्रिया शुरू होने में भयानक रुकावट आई। मिलीजुली जनतांत्रिकता की सियासत करने के बजाए येन-केन-प्रकारेण सत्ता हासिल करो और साम-दाम-दंड-भेद में से कुछ भी नहीं छोड़ो का ही रास्ता चुना गया।

यह दांव-पेच की राजनीति ही कश्मीर का सबसे बड़ा जख्म बनी जो आज तक भरा नहीं गया। इस तरह की राजनीति तत्काल तो आपकी जगह बना देती है, आप मजबूत स्थिति में दिखते हैं लेकिन इसकी वजह से लोकशाही बेदखल कर दी जाती है। सामूहिकता की भावना अलगाव में बदल जाती है और लोकतंत्र प्रपंचतंत्र बनकर रह जाता है। आजादी के बाद से कांग्रेस या दिल्ली दरबार के इसी दांव-पेच को ‘भारत’ करार देकर कश्मीरियों का लोकतंत्र से अलगाव हुआ। राजनीति एक राजनीतिक दल कांग्रेस की थी और नुकसान एक भूगोल, एक संस्कृति, एक समाज और एक अर्थशास्त्र जिसे सामूहिक रूप से भारत कहते हैं उसका हो रहा था।

अगर हम अमेरिका जैसे देशों की तुलना करें जहां लोकतंत्र लंबी परंपरा का हिस्सा रहा है वहीं भारत में इसे अभी परंपरा के रूप में विकसित करना है। आजादी के बाद से अब तक के छोटे से समय में ही दांव-पेच की राजनीति की वजह से कई बार लोकतंत्र को कुचला गया। खासकर कश्मीर जैसे विशिष्ट स्थिति वाले राज्य में घोर लापरवाही बरती गई। जनतांत्रिकता के जरिए भारतीयता से जुड़ाव नहीं करवाया गया। कांग्रेस या दिल्ली की राजनीति से अलगाव लोकतंत्र की पहचान के खिलाफ खड़ा हो गया। जो पहचान खुद को भारतीयता के साथ देख सकती थी वह कांग्रेस और दिल्ली के खिलाफ व ‘भारत’ के खिलाफ दिखाई जाने लगी।

यह प्रमाणित तथ्य है कि भारत को परेशान करने के लिए पाकिस्तान कश्मीर को अशांत करने में जुटा रहता है। खास भौगोलिक कारणों के कारण अलगाववाद की वैचारिक घुसपैठ आजादी के बाद से ही शुरू है। इसके लिए जरूरी था कि कश्मीर में स्थानीय राजनीतिक दलों और जनता का जुड़ाव भारतीयता के साथ हो। लेकिन केंद्र सरकारों का रवैया उलटा ही रहा है और वे अपने दांव-पेच को स्थानीय दलों पर थोपते रहे हैं। पाकिस्तान, उसके आतंक और अलगाववादी घुसपैठ के खिलाफ बड़ी से बड़ी मुहिम शुरू की जाए। लेकिन स्थानीय दलों को खारिज करने की वही कांग्रेस के दिल्ली दरबार वाली गलती न की जाए जिसका नुकसान अंतत: पूरे देश को उठाना पड़ता है।

राज्यपाल साहब ने जिस सियासी पाकीजगी की बात की है हम उनके साथ हैं। उम्मीद है कि वे सीटों और दलों के दांव-पेच के उलट कश्मीर के दल और वहां की जनता को जनतांत्रिकता से जोड़ पाएं। उन्हें उन कारणों पर भी गौर करना होगा जिसकी वजह से कश्मीर के स्थानीय दल हाल में हुए निकाय चुनावों के खिलाफ खड़े हो गए थे। हर कीमत में वहां लोकतंत्र को बचाना चाहिए। आज के दौर में कश्मीर वैसी जगह नहीं है जहां प्रयोगधर्मिता दिखाई जाए। राज्यपाल का दावा है कि उन्होंने जो किया संविधानसम्मत किया और हमारी यही मांग है कि जितनी फौरी कार्रवाई राजनीतिक शुद्धता और नैतिकता को बचाने में दिखाई गई उतनी ही तेजी से वहां लोकतंत्र की बहाली भी की जाए। कश्मीर की जनता को भी भारत के अन्य भूगोल की तरह लोकतांत्रिक राजनीति का हक है। कश्मीर को भारतीयता से जोड़ने के लिए जल्द से जल्द यह हक दिया जाए, नहीं तो वाया दिल्ली उनके लिए ‘भारत’ ही भ्रम बन जाता है। वहां लोकशाही का मुंतजिर-ए-वादा है, जो जल्द से जल्द पूरा हो।

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