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बेबाक बोल: गलियारे की गुगली

सात दशक पहले अंग्रेजों से मिली औपनिवेशिक आजादी भारत विभाजन की त्रासदी के साथ सामने आई। इस त्रासदी में लहूलुहान हुई पंजाब की मिट्टी। विभाजन की एक लकीर से गुरु नानक के दर से लेकर बुल्लेशाह की कर्मभूमि तक हमसे दूर हो गई। धर्म और संस्कृति के इस भाव और अभाव के बीच पंजाब ने जो जख्म सहे, उसका दर्द हमें आज भी आगाह कर रहा है। करतारपुर साहब गलियारा बुनियाद समारोह में इमरान खान कश्मीर और परमाणु शक्ति के घालमेल वाली फौज की पकड़ाई जो पटकथा पढ़ रहे थे उससे आगे का क्या दृश्य बनेगा। समारोह में जिस तरह से पाक फौज की ताकत का नूर चमक रहा था, उससे यही डर है कि आस्था का यह पुल कहीं पाक की नापाक हरकतों का गलियारा न बन जाए। आस्था, धर्म और संस्कृति के जरिए लोगों के बीच नफरत और दूरियां मिटाने के हर ऐसे कदम का स्वागत है, लेकिन भावुक पलों के बीच आतंकवाद का दर्द झेल चुके पंजाब की सुरक्षा की कड़वी हकीकत पर इस बार का बेबाक बोल।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान (फोटो सोर्स : Indian Express)

फ्रांस और जर्मनी जिन्होंने कितनी जंगें लड़ी हैं और फिर भी दोनों मुल्कों के बीच खुली हुई सीमाएं हैं, उनके बीच आज जंग की सोच भी नहीं है। फ्रांस और जर्मनी यूरोपीय यूनियन बनाकर आगे बढ़ सकते हैं तो हम क्यों नहीं। हम ये जंजीर तोड़ देंगे। दोनों मुल्क आगे बढ़ सकते हैं। मैं इस मौके का फायदा उठाते हुए कहता हूं कि हिंदुस्तान एक कदम आगे बढ़ाएगा तो हम दो कदम आगे बढ़ेंगे।’ ये बोल पाकिस्तान के वजीर-ए-आजम इमरान खान के हैं। यहीं पर नए-नए कांग्रेसी और बकौल इमरान खान पाकिस्तान में आम चुनाव जीतने की काबिलियत रखने वाले नवजोत सिंह सिद्धू कहते हैं, ‘मेरे यार दिलदार इमरान खान ने 70 साल के इंतजार का अंत कराया…मेरा यार जीवे।’

भारत-पाकिस्तान की सरहद और गुरु नानक के श्रद्धालुओं के बीच मिटाए जा रहे चंद किलोमीटर के फर्क पर बर्लिन की दीवार से लेकर फ्रांस का युद्ध तक आ गया। कहते हैं कि सार्वजनिक याद की उम्र बहुत छोटी होती है, लेकिन इतनी छोटी भी नहीं कि हम भूल जाएं कि भारत की ओर से शिखर वार्ता ठुकराने पर श्रीमान खान ने भारत को लक्षित कर जो ट्वीट किया था उसे किसी राष्टÑाध्यक्ष के किए गए अब तक के निकृष्टतम ट्वीट का खिताब मिला था।

इमरान खान जिस सिद्धू को पाकिस्तान में चुनाव जितवाने की बात कर रहे हैं वे अभी तक नेता बन ही नहीं पाए हैं और एक मंचीय कलाकार की तरह अपने लिए वाहवाही और तालियों की दरकार ही रखते हैं। सिद्धू के बारे में इमरान कहते हैं, ‘दृढ़ निश्चय वाले नेता ही दोनों देशों के बीच तनावपूर्ण रिश्ते को सुधार सकते हैं’। उन्होंने कहा, ‘मुझे आशा है कि हमें इसके लिए सिद्धू के प्रधानमंत्री बनने तक का इंतजार नहीं करना पड़ेगा।’ खान और सिद्धू की क्रिकेट के मैदान वाली दोस्ती समझ में आती है। दोनों क्रिकेट के मैदान में लोकप्रिय रहे हैं और उनके लिए किसी फैसले और उसके नतीजे का आकलन लोकलुभावन के स्तर पर ही हो सकता है। लेकिन किसी देश की आंतरिक सुरक्षा किसी हास्य कार्यक्रम या क्रिकेट के मैदान वाले मनोरंजन के दायरे में नहीं आती है।

वैसे, इमरान खान की तारीफ इस मायने में तो बनती है कि उन्हें अंतरराष्टÑीय मीडिया की समझ है और वे जानते हैं कि वैश्विक मंच पर मीडिया का नायक बनने के लिए क्या और कैसे बोलना है। वैश्विक मीडिया को न तो नानक के श्रद्धालुओं से मतलब है और न बर्लिन की दीवार से। गुरु नानक को समर्पित समारोह में उन्हें एक शब्द ही सुनना था और वह है कश्मीर।

करतारपुर के गलियारे से कश्मीर पहुंचे इमरान फरमाते हैं, ‘70 साल से हम ऐसे ही हालात देख रहे हैं…हमारा मसला एक है, कश्मीर। इंसान चांद पर पहुंच चुका है तो क्या हम एक मसला हल नहीं कर सकते। मैं यकीन दिलाता हूं कि ये मसला हल हो जाएगा। बस इरादा चाहिए’। दो पड़ोसी देशों के आम नागरिकों के बीच दूरियां कम करने के मौके पर कश्मीर जैसा सामरिक और संवेदनशील मसला लाने वाले खान साहब के इरादों से कौन वाकिफ नहीं होगा। 70 साल आपके लिए जुमला हो सकता है। लेकिन पंजाब के सरहदी इलाकों के लिए यह जुमला नहीं है। पांच दरिया वाली फसलों के रूप में सोने-हीरे उगलने वाली इस धरती ने विभाजन और उसके बाद के आतंकवाद का जख्म अपने सीने पर झेला है।

खान साहब से गुजारिश है कि वे कश्मीर पहुंचने के बजाए चांद पर पहुंचने की राजनीति करें तो दोनों देशों के साथ पूरी दुनिया के लिए अच्छा होगा। चांद पर पहुंचने के लिए आपको स्कूल बनाने होंगे, अनुसंधान केंद्र बनाने होंगे और राजनीति के केंद्र में अपने नागरिकों को रखना होगा। लेकिन आप और आपके पूर्ववर्ती तो पाकिस्तानी अवाम के काम आने वाला बजट भारत के खिलाफ नफरत भड़काने में झोंक देते हैं। इसी नफरत और आतंकवाद की आग में आपके यहां स्कूली बच्चे गोलियों से भून दिए जाते हैं। वे स्कूली बच्चे जो चांद पर जाने का सपना संजोए स्कूल पहुंचते हैं, भारत विरोधी आग में झुलसा दिए जाते हैं।

खान साहब और उनके ‘यार’ सिद्धू जिन सात दशकों की बात कर रहे हैं, उनमें यूपीए सरकार के दौरान भारत की वाणिज्यिक राजधानी मुंबई के दिल पर किया गया आतंकवादी हमला भी है। इसी पंजाब में वह पठानकोट और वहां हुआ आतंकवादी हमला भी याद रखना चाहिए जो आपने नरेंद्र मोदी के दोस्ती के पैगाम के बदले दिया था। और उससे पहले अटल बिहारी वाजपेयी को करगिल की चोटी पर जंग लड़ने के लिए मजबूर कर दिया था। कश्मीर के आतंकवादी सरगना बुरहान वानी को संयुक्त राष्टÑ संघ में नवाज शरीफ फिलस्तीनियों की शहादत का प्रतीक ‘इंतिफादा’ बताते हैं तो हाल के दिनों में पाकिस्तानी डाक विभाग कश्मीरी आतंकवादियों को शहीद बताकर उनके सम्मान में डाक टिकट जारी करवा देता है।
पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह जिन्हें इस गलियारे से सबसे ज्यादा फायदा होना है, पाकिस्तान के शिलान्यास समारोह में जाने से परहेज करते हैं। यह उनकी दूरदरर्शिता ही थी क्योंकि उन्हें अंदाजा था कि इस मंच का इस्तेमाल इमरान खान अपने नायकत्व के लिए करेंगे। हालांकि भारत सरकार ने सिख समुदाय की धार्मिक भावनाओं से जुड़े समारोह में अवांछित रूप से कश्मीर मुद्दे को उठाने की कड़ी भर्त्सना की और पाकिस्तान को नसीहत दी कि वह अपने कब्जे वाले क्षेत्र में सीमापार आतंकवाद को सभी तरह का समर्थन और आश्रय देना बंद करने के लिए प्रभावी और विश्वसनीय कार्रवाई कर अपनी अंतरराष्टÑीय जवाबदेही पूरी करे।

यह तो सच है कि भारत-पाक सरहद पर बसे लोग दोनों देशों के बीच शांति चाहते हैं क्योंकि किसी भी तरह के तनाव का नतीजा सबसे पहले उन्हें ही भुगतना होता है। लोगों के बीच दूरियां कम करने वाली ऐसी सांस्कृतिक और धार्मिक पहल का हमेशा स्वागत होना चाहिए, लेकिन जब आस्था और भावुकता से परे जाकर कड़वी सच्चाई का सामना करते हैं तो हमारे सामने इस गलियारे को लेकर पहला पाठ यही है कि सुरक्षा को लेकर सतर्क रहा जाए।

आस्था और धर्म लोक से जुड़ा मसला है, लेकिन कभी-कभी लोकलुभावन फैसले उसी लोक पर भारी पड़ सकते हैं। यह लोक है पंजाब का, जिसने आतंकवाद का लंबा अंधकार काल देखा है। भारत के सेनाध्यक्ष वहां अलगाववादी ताकतों के सिर उठाने के बाबत आगाह कर चुके हैं। ब्रिटेन से लेकर कनाडा तक में खालिस्तानी नारों की गूंज उठ रही है। पाकिस्तान की जमीन पर हुए कार्यक्रम के दौरान इमरान खान और सिद्धू के याराने के साथ खालिस्तान समर्थक गोपाल चावला का होना क्या संदेश देता है?

अभी तक श्रद्धालु करतारपुर गुरुद्वारा साहब को भारत की सीमा पर दूरबीन से देखते थे। सिर ढके, हाथ जोड़े और दूरबीन के लेंस पर आंखें टिकाकर। अब वे अपने गुुरु के दर पर मत्था टेक सकेंगे। आस्था और भरोसे के इन भावुक पलों की कीमत समझी जा सकती है, लेकिन भारत और पाकिस्तान के रिश्तों का गलियारा इतना संकरा हो चुका है कि भरोसे के इस पुल पर सतर्कता का खंभा सबसे जरूरी लग रहा है। हम न फ्रांस हैं और न जर्मनी। हम भारत और पाकिस्तान हैं और बीच में हमारा पंजाब जो पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद से लहूलुहान हो चुका है। अभी इस गलियारे के पूरे ढांचे पर काम करना है और सबसे बड़ा सच यह है कि इतने छोटे दायरे में दोनों देश अपनी-अपनी तरह से काम करेंगे। भरोसे का यह जो नया गलियारा बन रहा है उस दौरान गलतियों और नुकसान के जिस गलियारे से हम पहले गुजर चुके हैं उसकी याद भी बनी रहनी चाहिए।

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