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बेबाक बोल: बुलंद भारत!

पहले अल्पसंख्यक तबके का शख्स भीड़ के हाथों मार दिया जाता है। फिर एक सफेदपोश नौकरी करने वाला मध्यवर्गीय इंसान सड़क पर सरेआम मार दिया जाता है और आरोप राज्य पुलिस पर आता है। अब थाने से कुछ ही दूरी पर गुस्साई और गाली देती हुई भीड़ एक पुलिस अधिकारी की हत्या कर देती है। एक युवक की भी जान जाती है। देश की सबसे ज्यादा लोकसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश में लगी आग की जद में सबके मकान आने लगे हैं। मारे गए अधिकारी का बेटा पूछता है कि अगली बारी किसकी? विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के खंभों पर टिके लोकतंत्र में किसी एक को भी ज्यादा ताकत मिलेगी तो बाकी दोनों लड़खड़ाएंगे ही। पुलिस अधिकारी आसमान में उड़कर कांवड़ियों पर फूल बरसाते हैं तो उनकी इस बेबसी से जमीन पर उगी दुस्साहस की फसल उनके सहयोगी की हत्या कर देती है। क्या शान-ए-हुकूमत अपने इकबाल की इस हत्या को लेकर परेशान है? देश की राजनीति की दिशा तय करने वाले इस सूबे को राजनीति क्या दे रही है यही सवाल पूछता बेबाक बोल।

बुलंदशहर हिंसा में शहीद हुए इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह (बाएं) की तस्वीर और उनके पार्थिव शरीर को कंधा देते पुलिस अधिकारी। (PTI/EXPRESS Photo)

यूपी कोई कश्मीर नहीं है कि कोई भी किसी को गोली मार दे…। निजी कंपनी में काम करने वाला मध्यवर्गीय तबके का नागरिक पुलिस के हाथों मारा जाता है तो पत्नी का दर्द ऐसे छलकता है। ‘मेरे पिता मुझे अच्छा नागरिक बनाना चाहते थे जो धर्म के नाम पर समाज में हिंसा न फैलाए, आज हिंदू-मुसलिम के झगड़े में मेरे पिता ने अपनी जान गंवाई, कल किसके पिता की जान जाएगी?’ पुलिस अधिकारी मारे जाते हैं तो उनके किशोर बेटे का दर्द इस कड़वे सवाल के साथ बाहर आता है कि अगली बारी किसकी? पुलिस अधिकारी का बेटा वही बोल रहा है जो हम बहुत पहले से बोल रहे हैं कि लगेगी आग तो आएंगे घर कई जद में, यहां पे सिर्फ हमारा मकान थोड़ी है। यह आग फैल चुकी है। बस्ती के कोने से जो धुआं उठा था उसका काला अंधेरा पूरे शहर पर छाने लगा है।

उत्तर प्रदेश में जगहों के नाम बदलने में अथक परिश्रम कर रहे मुख्यमंत्री अब बुलंदशहर का नाम क्या रखना पसंद करेंगे? आप केरल के विधानसभा चुनावों में स्टार प्रचारक थे और वहां की सरकार को स्वास्थ्य के मामले में बेहतर होने के नुस्खे दे रहे थे (गोरखपुर अस्पताल आॅक्सीजन कांड के बाद भी)। गुजरात से लेकर मध्य प्रदेश तक के मतदाताओं के बीच आपकी तूती बोल रही थी। जब उत्तर प्रदेश पर सवाल उठ रहे थे तो तेलंगाना में आप कह रहे थे, ‘अगर तेलंगाना में भाजपा सत्ता में आती है तो वह करीमनगर जिले का नाम बदलकर करीपुरम करने के लिए काम करेगी और आपकी भावनाओं का सम्मान करेगी।’
सबसे ज्यादा लोकसभा सीटों वाला राज्य है उत्तर प्रदेश। इस राज्य में मुंबई से ट्रेन भरवाकर और खुद विमान यात्रा कर शिवसेना सुप्रीमो मंदिर बनवाने पहुंचते हैं।

क्या शिवसेना को अपनी बुनियादी राजनीति याद है। उनकी राजनीति की बुनियाद थी महाराष्ट्र में दक्षिण भारतीयों से लेकर उत्तर प्रदेश और पूर्वांचल के लोगों का विरोध। इस खास इलाके के प्रवासियों की वहां नकारात्मक छवि बना दी गई थी क्योंकि ये मुंबई में रोजगार खोजने गए थे। और, कांवड़ियों पर विमान से फूल बरसवाने वाले सूबे में यह कहते भी सुना गया कि उत्तर प्रदेश में नौकरियां तो बहुत हैं लेकिन करने वाले योग्य लोग नहीं हैं। महाराष्ट्र में इस राज्य के लोगों का विरोध होता है कि हमारे हिस्से की नौकरी क्यों कर रहे हैं। उसी महाराष्ट्र के नेता उत्तर प्रदेश में मंदिर बनवाने के लिए आते हैं। काश, उन्होंने एक बार यह भी पूछ लिया होता कि यहां के युवाओं के रोजगार के क्या हालात हैं। कोई नहीं पूछ रहा कि हम तो कश्मीर में ही लहूलुहान थे, ये उत्तर प्रदेश में इतने सारे पत्थर कहां से आ गए?

उत्तर प्रदेश के युवाओं के लिए क्या आदर्श बनाया जा रहा है। बुलंदशहर में हिंसा की अगुआई करने के आरोपी युवक के घर के बाहर अखंड भारत का नक्शा है। अखंड भारत मतलब विभाजन के पहले का भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश। इस युवक के सपने में बुलंदशहर को बुलंद करने के बजाय भारत को अखंड करने का सपना किसने भरा। वह उत्तर प्रदेश के युवाओं के लिए बेहतरीन शिक्षा और रोजगार की मांग क्यों नहीं करता है। उसकी नजर सिर्फ बकरीद बनाम अन्य हिंदू त्योहारों पर क्यों है।

कंप्यूटर और साइबर तकनीक की बात कर रहे आधुनिक भारत के युवाओं की आंखों में अखंड भारत का सपना कैसे और कब तैरने लगा। याद आता है यूपीए शासन के विरोध में सजा आंदोलन का मंच। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के बीच पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे इतिहास बन चुके देशों का क्या काम। आज हम इक्कीसवीं सदी के भारत में हैं और पाकिस्तान-बांग्लादेश हमारे पड़ोसी हैं। इस जमीनी हकीकत के बरक्स जब आम अवाम के घर के दरवाजे से लेकर सोशल मीडिया के खाते तक अखंड भारत की बात हो तो समझा जा सकता है कि हम अपनी युवा शक्ति को किस सामंती मानसिकता की संस्कृति में झोंक रहे हैं।
भीड़ के साथ मार-काट के नारे लगाते इन युवाओं की छवि उस शहरी मध्यवर्ग से अलग है जो हम नब्बे के दशक के बाद देख चुके हैं। इतनी सारी प्रस्तावित स्मार्ट सिटी में इन सामंती परिवेश वाले युवाओं के लिए कितनी और कौन सी जगह बनेगी। क्या इन्हें अंदाजा है कि इनके गांवों के हजारों किसान दिल्ली जाकर क्यों प्रदर्शन कर रहे हैं। उनकी बेरोजगारी और बदहाल किसानी का कोई संबंध है? लेकिन किसानी और नौकरी की समस्याओं से इतर ये युवा जिस हिंसा के कारखाने की भट्टी में झोंक दिए गए हैं उसका मुनाफा कौन ले जाएगा।

सरकार से लेकर संविधान तक का इकबाल होता है। राष्ट्र राज्य का इकबाल होता है। इस इकबाल की अहम इकाई पुलिस है। पुलिस अधिकारी आसमान में उड़ कर कांवड़ियों पर फूल बरसाते हैं तो उनकी इस बेबसी से जमीन पर उगी दुस्साहस की फसल उनके सहयोगी की हत्या कर देती है। क्या शान-ए-हुकूमत अपनी इस हत्या को लेकर परेशान है, उसकी कोई प्रतिक्रिया दिख रही है?

उत्तर प्रदेश में पहली प्रतिक्रिया दिख रही है विधायिका के बीच से। वह विधायिका जिसमें अलग-अलग तरह की जमीन से उपजे नेता हैं। कुछ भाजपाई तो कुछ पूर्व कांग्रेसी, कुछ पूर्व समाजवादी तो कुछ बहुजनवादी। कई भाजपा नेता सबसे पहले इसे उनके खिलाफ साजिश बताते हैं। एक महिला सांसद को अहसास हो चुका है कि धु्रवीकरण की इस जमीन पर रहेंगे तो पहले की बनाई जमीन खिसक जाएगी और उन्होंने अपने अलगाव का एलान कर दिया। दूसरी जमीनों से सत्ता की अट्टालिका में खंभा बने बहुतों को अब ये अट्टालिका बोझ लग रही है।

लोकतंत्र की अट्टालिका विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के खंभों पर ही टिकी है। अब अगर इसका एक खंभा धु्रवीकरण की राजनीति करेगा तो दो खंभों पर क्या असर होगा। पिछले दिनों सीबीआइ से लेकर अदालती मामलों में भी ये टकराव मुखर होकर दिखा। इन टकरावों से तीनों खंभों के संगठित तालमेल का चेहरा टूट रहा है। पहले हाशिए के तबके के व्यक्ति की सरेआम हत्या होती है, फिर मध्यवर्गीय तबके का व्यक्ति सड़क पर मारा जाता है। अब पुलिस अधिकारी की हत्या कर दी जाती है। इस कोलाज को संगठित रूप से देखें तो साफ पता चलता है कि जनतंत्र पर एक खंभे का वर्चस्व बढ़ गया है जो बहुत ही खतरनाक है। सरकार तीन खंभों का मिला-जुला रूप होना चाहिए। अगर विधायिका को ज्यादा ताकत मिल रही है और उसकी वजह से बाकी के दो खंभे हावी होने की कोशिश करेंगे तो लोकतंत्र के ढांचे का ढह जाना तय है।

हिंदुस्तान के नक्शे पर उत्तर प्रदेश सबसे बड़ा राज्य है। भारतीय राजनीति में किसकी हुकूमत चलेगी यह तय करने का दमखम रखने वाला राज्य। यहां के राज और समाज ने भारत को सबसे ज्यादा प्रधानमंत्री दिए हैं, केंद्रीय हुकूमत को सबसे ज्यादा ताकत दी है। भारतीय राजनीति को सबसे ज्यादा ताकत देने वाले इस राज्य को राजनीति जो दे रही है, वह लोकतंत्र के लिए कहीं से भी अच्छा संकेत नहीं है। उत्तर प्रदेश के पाठ का असर पूरे हिंदुस्तान के लोकतांत्रिक पाठ्यक्रम पर पड़ता है। यहां के पाठ को जल्द से जल्द आधुनिक लोकतंत्र के साथ जोड़ना जरूरी है क्योंकि उत्तर प्रदेश की बात से समस्त भारत की बात बनती है।

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