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बेबाक बोल: दलदल

‘जैसे ही मंत्रिमंडल का गठन होगा, लगेगा कि बम धमाका हो गया है’। सदन में बहस के दौरान विश्वास मत में हारे कर्नाटक के एचडी कुमारस्वामी ने सरकार बनाने जा रहे भाजपा के नेताओं को चेतावनी के लहजे में जो बात कही, उससे अंदेशा है कि 14 महीनों से चल रहा नाटक अभी खत्म होने वाला नहीं है। दलबदल से जनता के वोट पर जो डाका पड़ रहा है उसका इलाज क्या है? चुनाव जब एक सार्वजनिक प्रक्रिया है, पार्टी के निशान पर वोट पड़ते हैं तो फिर दल बदलने के वक्त नेता को नागरिक के निजता का अधिकार नया सवाल उठा गया है। लोकतंत्र के पूरे ढांचे को ही अविश्वास में बदलने वाली इस कुरीति का इलाज क्या एक कानून के बदले दूसरा बना कर हो सकता है? जब गांधी के देश में ही ‘मजबूरी का नाम महात्मा गांधी’ जैसा भद्दा जुमला लोक की जुबान पर चढ़ा हो तो ऐसे दौर में राजनीतिक वैचारिकी को मजबूत करने की बात कहता बेबाक बोल।

‘अगर बिकने पे आ जाओ तो घट जाते हैं दाम अकसर

न बिकने का इरादा हो तो कीमत और बढ़ती है’

महीने पहले ही लग गया था कि राजनीतिक अरमानों के जरा सा ऊपर-नीचे होते ही सूबे के स्वामी बदल जाएंगे। कल तक जो अधूरा भाषण छोड़ कर आंसू पोछते हुए विधानसभा से निकले थे, अब दोबारा शपथ ग्रहण की तैयारी में हैं। ठगी हुई सी जनता नेता रूपी अपने वोटों का इस दल से उस दल में आने-जाने का नाटक देख रही है।
‘मैंने तो ईवीएम को वोट दे दिया है अब वो जिसे दे दे…’, चुनावों के समय सोशल मीडिया पर जब यह चुटकुला लोकप्रिय हो रहा था तो अंदाजा नहीं था कि कर्नाटक, गोवा, बंगाल, बिहार, ओड़ीशा, उत्तर प्रदेश से लेकर हिंदुस्तान के नक्शे पर मौजूद कई राज्यों के बहुत से नेता उस पार्टी में नहीं रह जाएंगे, जिसमें जनता ने उन्हें वोट दिया था। ईवीएम की गुणवत्ता पर जितने भी सवाल उठे हों लेकिन किसी भी दल ने ईवीएम को लेकर ऐसा विरोध-प्रदर्शन नहीं किया कि चुनाव आयोग या अन्य जिम्मेदार संस्थाएं उस पर सोचने को मजबूर हो जाएं। शायद इन दलों के नेता उस ‘जन्नत की हकीकत’ जानते हैं जिसे हम लोकतंत्र कहते हैं। इन्हें पता है कि ईवीएम की खराबी तो ठीक हो सकती है लेकिन सत्ता सुख भोगने की हमारी बीमारी तो लाइलाज है।

तीन दशक पहले भारत में दलबदल कानून लागू हुआ था। माना गया था कि इस कानून से राजनीतिक स्थिरता आएगी। लेकिन इसके ढीले-ढाले प्रावधानों का लाभ उठाकर पिछले तीन दशकों में जनता के मत को बेमानी साबित किया जाता रहा है। इतने लंबे समय में किसी भी दल ने इसमें संशोधन करने की पुरजोर मांग कभी नहीं की। राजीव गांधी पर आरोप लगे थे कि उन्होंने सत्ता पर अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए इस कानून को पास कराया था, लेकिन उसके बाद क्या कांग्रेस, क्या भाजपा, सपा, बसपा या कोई स्वघोषित क्रांतिकारी दल, किसी ने भी इसके खिलाफ बोलना शुरू नहीं किया क्योंकि सबको इसका फायदा लेना था।

दलबदल पर बहस के साथ ही इस गलत प्रवृत्ति की शुरुआत की गलती के लिए भी जवाहरलाल नेहरू को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। आजाद भारत के दूसरे लोकसभा चुनाव में ही अखिल भारतीय स्तर पर कांग्रेस को अपनी सत्ता डोलती नजर आई। खासकर केरल में कम्युनिस्ट पार्टी को जबरर्दस्त सफलता मिली थी। ईलमकुलम मनक्कल संकरन नंबूदरीपाद की सरकार को नेहरू की अगुआई वाली केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 356 का सहारा लेकर बर्खास्त कर दिया। नंबूदरीपाद से लेकर जम्मू कश्मीर में शेख अब्दुल्ला तक की सरकार, कांग्रेस को जब-जब अपने केंद्रीय वजूद पर खतरा महसूस हुआ उसने क्षेत्रीय शक्तियों को कुचलने में कोई हिचक नहीं दिखाई। उसके बाद मोरारजी देसाई की अगुआई वाली जनता पार्टी की सरकार का भी यही हश्र हुआ। राजीव गांधी पर तो इलजाम है कि वे सत्ता पर वर्चस्व रखने के लिए ही दलबदल कानून लेकर आए थे। राजीव के अनुवर्ती नरसिंह राव तो शिबू सोरेन के ‘इधर-उधर’ पर ही आश्रित रहे। उस समय हुआ सांसद रिश्वत कांड और झारखंड में शिबू सोरेन सरकार के गठन से लेकर पतन की कहानी भारतीय लोकतंत्र का काला अध्याय है। येन-केन प्रकारेण सरकार बनाने की राजनीतिक संभावनाएं तलाशने की कुरीति ने प्राकृतिक संभावनाओं से भरे झारखंड में विकास की उम्मीदों पर ग्रहण लगा दिया। सदन में विश्वासमत की परीक्षाओं का वह दौर शुरू हुआ जिसने लोकतंत्र के वर्तमान स्वरूप पर ही अविश्वास पैदा कर दिया। जनता से लिए मत को ‘विश्वास’ में बदलने के लिए नेता घोड़ा मंडी में बिकने और खरीदने वाले माल सरीखे हो गए।

पचास के दशक का केरल हो, नब्बे का झारखंड या आज का कर्नाटक। सत्ता के लिए कुछ भी करने और मंडी में बिकने को तैयार इन नेताओं का इलाज क्या हो? मांग उठ रही है कि दलबदल कानून को मजबूत किया जाए, इसकी कमियों को दूर किया जाए। तो क्या वाकई में एक कमजोर कानून का हल उससे मजबूत कानून है? अगर कानून ही हल होता तो बात पहले वाले से ही बन जानी चाहिए थी। हर दौर में एक कहावत अपने तरीके से कही जाती है कि चोर चोरी करने का रास्ता निकाल ही लेता है। पहले सोने-चांदी को दीवारों में चुनवा कर रखते थे तो चोर उसमें सेंध लगा लेते थे। फिर तिजोरी-ताले आए तो उसे तोड़ने के तरीके खोज लिए गए। आधुनिक लॉक को खोलना आसानी से सीख लिया तो बैंकों में सुरक्षित धन को इंटरनेट से ही हैकर उड़ाने लगे। लब्बोलुआब यह कि चोरी रोकने का हल ताला नहीं है।

कर्नाटक मामले में फिलहाल ताजा व्यवस्था यह बनाई गई कि इस्तीफा देनेवालों को सदन में मौजूद होना जरूरी नहीं है। यह फैसला दलदबदल कानून की उस मूल भावना के उलट है जिसमें सांसद या विधायक को सामूहिकता में देखा गया था। यह व्यवस्था हर सांसद को निजी इकाई मानती है और व्यक्ति के निजता के अधिकार की रक्षा की बात करती है। विधायक या सांसद स्वतंत्र है, उसकी पहचान नागरिक की है। संविधान उसकी निजता की रक्षा करेगा। दलदबदल कानून में इसी चीज का विरोध किया गया था। अब स्थिति यह है कि जब आप चुनाव लड़ रहे हैं तो पार्टी आपकी पहचान है, पार्टी का नेतृत्व आपका चेहरा है। यह वह दौर है जब भारतीय चुनाव अध्यक्षीय व्यवस्था का रूप लेता जा रहा है और जनता एक केंद्रीय चेहरे की अपील पर स्थानीय नेता चुन रही है। लेकिन जब वह जीत कर दूसरी पार्टी में जाना चाहेगा तो वहां उसके निजता के अधिकार की बात आ जाएगी।

दलबदल पर इन विरोधाभासी हालात के बीच हम बात फिर ताला बनाम चोरी की करते हैं। संविधान और कानून सत्ता चलाने वालों के हाथों में होता है। संविधान या कानून की किताबों में चाहे कितने भी अधिकार सुरक्षित कर दिए जाएं, कितने ही कर्तव्य दर्ज कर दिए जाएं लेकिन अगर उसे लागू करने वाले लोग ईमानदार नहीं होंगे तो फिर चोरी का रास्ता हर तरफ से खुलता है। अपने वोट पर पड़े डाके को देख जनता की तरफ से मांग उठ रही है कि उनके पास वोट वापसी का अधिकार होना चाहिए। एक मांग यह भी है कि दल बदलने के बाद नेताजी की विधायकी या सांसदी का तमगा कायम रहने दिया जाए, लेकिन उन्हें सदन में मत विभाजन में भागीदारी करने पर रोक लगानी चाहिए।

जब तक सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थाएं कमजोर होती रहेंगी, सत्ता के लालच में एक पार्टी के नेता पर दूसरी पार्टी का निशान चस्पा करने का तरीका खोजा ही जाता रहेगा। मौजूदा दलबदल कानून में अहम यह नहीं है कि दलबदल करने वालों पर लगाम कैसे लगानी है, इसका मकसद संविधान का पालन करवाना है। राजनीति में विचारधारा और नैतिकता को रौंदने वालों के खिलाफ जनता को ही उठ खड़ा होना होगा। जब तक परिवार से लेकर स्कूल और विश्वविद्यालय तक की इकाइयों में विचारधारा और नैतिकता के प्रति समर्पण मजबूत नहीं करवाया जाएगा, तब तक संसद में लोकतंत्र इसी तरह पलटी खाता रहेगा। जब गांधी के देश में ही ‘मजबूरी का नाम महात्मा गांधी’ वाला जुमला दोहराया जाएगा तो देश की वैचारिक विरासत कैसे बची रहेगी। वैचारिकता और नैतिकता को मजबूती मानने का दौर शुरू किए बिना लोकतंत्र को घोड़ा मंडी बनने से बचाना मुश्किल है।

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