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राजपाट: ईमानदारी का सिला

जिन पांच आइपीएस अफसरों के भ्रष्टतंत्र और लखनऊ के सत्ता गलियारों में पहुंच का वैभव कृष्ण ने अरसे पूर्व गोपनीय पत्र लिख खुलासा किया था, उस तंत्र की चपेट में अपनी जगजाहिर ईमानदारी के बावजूद वैभव कृष्ण खुद आ गए।

एसएसपी वैभव कृष्ण, फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस

उत्तर प्रदेश में पुलिस के तंत्र में व्याप्त अराजकता, जातिवाद, गिरोहबंदी और भ्रष्टाचार के चर्चे गरम हैं। गुरुवार को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गौतम बुद्धनगर के एसएसपी वैभव कृष्ण को निलंबित कर इस विवाद का पटाक्षेप करने का उपक्रम किया। पर विवाद और उभर गया है। जिन पांच आइपीएस अफसरों के भ्रष्टतंत्र और लखनऊ के सत्ता गलियारों में पहुंच का वैभव कृष्ण ने अरसे पूर्व गोपनीय पत्र लिख खुलासा किया था, उस तंत्र की चपेट में अपनी जगजाहिर ईमानदारी के बावजूद वैभव कृष्ण खुद आ गए। जबकि जिनका उन्होंने भंडाफोड़ किया था, उनका कुछ नहीं बिगड़ा। कार्रवाई के नाम पर महज तबादले हो गए। इस बदनाम तंत्र पर सरकार की छवि धूमिल हुई तो इसी हफ्ते सूबे के अपर मुख्य सचिव अवनीश अवस्थी और पुलिस महानिदेशक ओपी सिंह मीडिया से रूबरू हुए। उनकी भाषा शैली से ही संकेत मिल गए थे कि कोपभाजन ईमानदार वैभव कृष्ण को ही होना पड़ेगा।

पुलिस महानिदेशक को भेजी अपनी चिट्ठी का खुलासा करने के गुनाह में। पर हकीकत एकदम उलट है। पुलिस महानिदेशक के चहेते अफसरों पर सवाल उठाने की सजा उन्हें मिलनी ही थी। पुलिस महानिदेशक ओपी सिंह सत्ताधीशों के अनुकूल आचरण के लिए जाने जाते हैं। 1995 में जब लखनऊ में चर्चित गेस्ट हाउस कांड में समाजवादी पार्टी के गुंडों ने मायावती पर हमला बोला था और बसपा के कई विधायकों को उठा ले गए थे। तब पुलिस ने खामोशी बरती थी। इसके लिए मायावती ने तबके एसएसपी ओपी सिंह को ही जिम्मेवार बताया था। पर अपनी इस वफादारी के लिए वे मुलायम सिंह यादव के भरोसेमंद बने रहे। यानी उन पर अरसे तक सपा का हिमायती होने का ठप्पा था।

केंद्र से सीआइएसएफ के मुखिया का पद छुड़ा कर जब योगी आदित्यनाथ ने उन्हें देश के सबसे बड़े सूबे की पुलिस की कमान सौंपी तो 1983 बैच के इस अफसर का अतीत विरोधियों ने याद दिलाया। पर मुख्यमंत्री का स्वजातीय होना उनके लिए वरदान बना। इसी महीने वे रिटायर होने वाले हैं पर चर्चा है कि मुख्यमंत्री उन्हें सेवा विस्तार दिलाना चाहेंगे। यूपी में शासन-प्रशासन एक तरह से भगवान भरोसे है। तभी तो पिछले चार महीने से भी ज्यादा वक्त से सूबे में नियमित मुख्य सचिव की नियुक्ति भी नहीं हो पा रही।

मौतों पर सियासत

मुद्दा तो था राजस्थान में कोटा के सरकारी अस्पताल में एक के बाद एक हुई सौ से ज्यादा शिशुओं की मौत का। बदल गया सत्तारूढ़ कांग्रेस की आपसी गुटबाजी में। देशभर में गहलोत सरकार की लापरवाही को लेकर कांग्रेस की भाजपा ने खूब लानत-मलानत की। और तो और बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी प्रियंका गांधी को मिसेज वाड्रा संबोधित कर खूब कटाक्ष किया। यूपी में दलितों के नाम पर घड़ियाली आंसू बहाने का आरोप लगाया और साथ ही राजस्थान में जाने का समय नहीं निकाल पाने के बहाने प्रियंका का असली चेहरा बेनकाब हो जाने जैसे तीखे तंज कसे। लेकिन विपक्ष के निशाने पर आने के बाद गहलोत सरकार ने संभलने की कोशिश नहीं की। अलबत्ता सूबे के चिकित्सा मंत्री रघु शर्मा इन मौतों का ठीकरा भी पुरानी सरकार पर फोड़ने लगे तो उन्हीं के सहयोगी उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट ने उन्हें आईना दिखाया। पायलट बोले- एक साल से ज्यादा समय से सरकार हमारी है तो हमें जिम्मेदारी तय कर दोषी के खिलाफ कार्रवाई भी करनी चाहिए। शर्मा को यह नसीहत इस कदर अखरी कि वे सचिन पायलट के खिलाफ ही मोर्चा खोल बैठे। सरकार के गठन से पहले रघु शर्मा को सचिन पायलट खेमे में गिना जाता था। पर मंत्री बनने के बाद पाला बदल कर वे गहलोत की शरण में आ गए। यही वजह है कि मौका मिलते ही सचिन पायलट ने उन्हें घेर लिया। पर घाघ शर्मा पलटवार से चूके नहीं।

फरमाया कि कोटा के जेके लोन अस्पताल की ईमारत की बदइंतजामी के लिए जिम्मेवारी पीडब्लूडी की है। मजे की बात यह है कि पीडब्लूडी खुद सचिन पायलट के पास है। पायलट ने जवाब नहीं दिया। पर उनके विभाग ने सफाई दी कि चिकित्सा महकमे ने उन्हें अभी तक बजट ही आबंटित नहीं किया। राजस्थान में कांग्रेस की गुटबाजी कोई रहस्य की बात नहीं है। अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच खेमेबंदी कई बरस पुरानी है। मंत्री भी खेमों में बंटे हैं। एक-दूसरे के खिलाफ जब तक अनर्गल बयानबाजी करते रहते हैं। लेकिन रघु शर्मा ने पाला बदल सचिन पायलट को झटका क्या दिया, इस खेमे के और भी कुछ मंत्री गहलोत की तरफ झुक रहे हैं। गहलोत को सोनिया गांधी का तो पायलट को राहुल गांधी का वरदहस्त हासिल है। कांग्रेस की इस गुटबाजी का भला विपक्षी भाजपा क्यूं मजा न ले। वह तो गुटबाजी की आग में घी डालने से भी बाज नहीं आ रही।

लाबिंग-सेटिंग

उत्पल कुमार सिंह उत्तराखंड के मुख्य सचिव हैं। इसी महीने रिटायर होने वाले हैं। आमतौर पर रिटायर होने की उम्र साठ साल है। पर सरकारी महकमों में सेवानिवृत्ति का महीना पूरा मिलता है। भले जन्मतिथि कोई भी क्यों न हो। 31 जनवरी को उनकी जगह कोई और लेगा या उन्हें कुछ महीने का सेवा विस्तार मिलेगा, अभी साफ नहीं है। अलबत्ता सचिवालय के गलियारों में उनके उत्तराधिकारी को लेकर अटकलें भी लग रही हैं और माथापच्ची भी जारी है। त्रिवेंद्र सिंह रावत का सबसे भरोसेमंद तो अपर मुख्य सचिव ओम प्रकाश को माना जाता है। सो, उन्हें आलाकमान से फ्रीहैंड मिला तो ओम प्रकाश सूबे की नौकरशाही के सिरमौर बन सकते हैं। कभी त्रिवेंद्र सिंह रावत के कृषि मंत्री रहते ओम प्रकाश इस विभाग के सचिव थे। दोनों में तभी से अच्छी पटरी बैठती है।

मुख्यमंत्री सचिवालय का कामकाज भी आज कल ओम प्रकाश ही संभाल रहे हैं। नियोजन के विशेषज्ञ के रूप में उनकी छवि बनी है। मिजाज भी कड़क है। हवा तो यही बह रही है कि सूबे की सरकार को ओम प्रकाश चला रहे हैं। यानी मुख्यमंत्री उन्हीं से परामर्श करते हैं। पर उनके खिलाफ सक्रिय लाबी भी चैन से नहीं बैठी है। इस लाबी में कुछ अफसर और भाजपा नेता शामिल हैं। यह लाबी दिल्ली में आलाकमान को ओम प्रकाश के खिलाफ सूचनाएं दे रही है। अनूप वधावन के लिए पैरवी कर रही है यह लाबी। जबकि उत्तराखंड के ही कुछ भाजपा नेता अपर मुख्य सचिव राधा रतूड़ी को मुख्य सचिव की कुर्सी पर देखना चाहते हैं। इसके पक्ष में महिला सशक्तिकरण जैसी दलीलें दी जा रही हैं। राधा रतूड़ी की राह में अड़चन उनके पति का सूबे का पुलिस महानिदेशक होना बन गया है। अनिल रतूड़ी पुलिस सेवा में हैं। पति-पत्नी दोनों ही साखदार अफसरों में गिने जाते हैं।
(प्रस्तुति : अनिल बंसल)

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