ताज़ा खबर
 

अमाननीय

भारत में लोकतंत्र की जड़ें बहुत गहरी हैं। मगर यहां सामंती सत्ता की भी लंबे समय तक पैठ रही है। जनता की चुनी हुई सत्ता ने लोकतंत्र की संस्कृति के विकास से ज्यादा उसे मारने का अभ्यास किया है। कांग्रेस की पुरानी गलतियों को आगे लाकर हर अलोकतांत्रिक गतिविधि वैधता पा रही है जो एक खतरनाक संकेत है।

Bebak bol-Politicsबिहार विधानसभा में हाल ही में हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान महिला विधायक को ले जातीं सुरक्षा गार्ड। (फाइल फोटो)

बिहार विधानसभा में लाए जा रहे कानून के खिलाफ जब राजद और अन्य विपक्षी दलों ने विरोध किया तो सदन परिसर में पुलिस बल ने उनसे अभद्रता और मारपीट की। वहीं बिहार के ही भागलपुर स्थित तिलका मांझी विश्वविद्यालय में राजद कार्यकर्ताओं को यह बात गंवारा नहीं हुई कि किसान आंदोलन के समर्थन में उनके बुलाए बिहार बंद के दिन कोई शिक्षक पठन-पाठन की बात करे। विद्यार्थियों के सामने जिनमें ज्यादातर लड़कियां थीं, कक्षा से खींच कर शिक्षक के साथ हाथापाई की गई। यह सब किया गया किसान आंदोलन के नाम पर। पंजाब में किसान आंदोलन के समर्थकों ने भाजपा नेता के साथ दुर्व्यवहार किया। भारत में लोकतंत्र अब संख्या बल का पर्याय हो गया है। सदन में सरकार विपक्ष की नहीं सुन रही तो जहां भी विपक्ष खुद को मजबूत पाता है वहां लोकतांत्रिक मूल्यों पर अपनी लाठी चलाता है। सदन से सड़क तक लोकतंत्र की संस्कृति को हाशिए पर ले जाने की प्रवृत्ति पर बेबाक बोल

बिहार विधानसभा में पुलिस बल ने राजद और विपक्ष के अन्य सदस्यों की पिटाई की। फिर दूसरी घटना में राजद से जुड़े लोगों ने भागलपुर में जेएनयू के छात्र रहे विश्वविद्यालय शिक्षक को पीटा। तीसरी घटना में पंजाब में भाजपा नेता की पिटाई कर उनके साथ घोर आपत्तिजनक व्यवहार किया गया। इन तीनों घटनाओं की समानता यह है कि पीड़ित पक्ष पर हंसते हुए जैसे को तैसा का उदाहरण दिया गया। हिंदी पट्टी की वैचारिक टिप्पणियों में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला वाक्य है-‘संसद से सड़क तक’। हिंदी जानने-समझने, लिखने वाले कभी न कभी इस वाक्य का इस्तेमाल कर ही लेते हैं। लेकिन ऊपर दिए तीनों उदाहरणों के बाद लगता है कि संसद से सड़क तक एक ऐसी शून्यता का दौर आ गया है जहां लोकतंत्र की कोई लाज नहीं बची। आखिर ऐसा क्यों है कि विधायक से लेकर प्रोफेसर तक की पिटाई पर सामूहिकता में कोई आवाज नहीं उठती है। यह सन्नाटा तब है जब दिल्ली की सीमा पर अभी तक किसान आंदोलन चल रहा है। वह आंदोलन जिसने अपने अभूतपूर्व चरित्र के कारण पूरी दुनिया का ध्यान खींचा।

हरियाणा से लेकर पंजाब तक में अगर राजनेताओं के साथ सार्वजनिक दुर्व्यव्हार और किसान आंदोलन के अराजक होने के कारणों पर गौर करेंगे तो उसकी पहली वजह दिखती है कि इस आंदोलन को निर्वात में छोड़ दिया गया है। इसी का नतीजा है कि आंदोलन केंद्रीय अगुआई से भटक कर अपनी-अपनी तरह से प्रतिक्रिया दे रहा है। अगर कोई आंदोलन है और यह बिखरा हुआ है तो हर तरह के संवाद से जुड़ाव ही उसे अराजक होने से बचा सकता है।

किसान आंदोलन को पहले खारिज किया गया और अब उसका अलगाव भी हो रहा है। इसी असफलता और अलगाव के कारण विभिन्न स्तरों पर असंतोष पैदा हो रहा है। हम ऐसे कई उदाहरण देख चुके हैं जब अपनी असफलताओं के कारण राज्य अवसाद में आता है तो वह भी हिंसक हो जाता है। बिहार विधानसभा की घटना को नीतीश कुमार की असफलता के इसी अवसाद के रूप में देखा जा सकता है। इसके साथ ही हालिया दिनों की घटनाएं इसी तरफ इशारा कर रही हैं कि किसान आंदोलन को अपनी मौत मरने देने की रणनीति पर ही भरोसा किया जा रहा है। स्वाभाविक है कि कोई भी आंदोलन अनंतकाल तक एकसमान ऊर्जा के साथ नहीं चल सकता। अब इस आंदोलन में अलग-अलग तरह का स्वर इतना बढ़ गया है कि यह शोर में तब्दील हो गया है। उसमें इतनी विविधता आ गई है कि अब केंद्रीय एकता की बात बेमानी है। यहां तक कि सिर्फ पंजाब में ही कई तरह के धड़े हैं।

इतने बड़े दायरे में चल रहे आंदोलन को केंद्रीय सूत्र से तोड़ कर अपनी-अपनी डफली से अपना राग अलापना उसे अराजकता की ओर धकेलना ही है। इसका एक परिणाम तो साफ-साफ दिख रहा है कि किसान आंदोलन नाकामी की ओर बढ़ सकता है। यह आंदोलन सामाजिकता और सामूहिकता की भावना के साथ शुरू हुआ था इसलिए इसकी नाकामी का असर सामाजिक तौर पर कितना भयानक होगा, इस बात का अनुमान लगाना अभी मुश्किल है। लेकिन हम उस असर को इन अराजकताओं में देख सकते हैं जब एक राजनीतिक दल के प्रतिनिधि को सरेआम पीट दिया जाए। हरियाणा में जिस तरह खास दल के नेताओं के साथ ऐसा-वैसा करने की घोषणाएं हो रही हैं उससे एक लोकतांत्रिक समाज को सजग जरूर रहना चाहिए।

लोक से तंत्र के जुड़ाव के दो ही औजार हैं, एक तो संसद और दूसरी सड़क। लोकतंत्र में संसद की यही पवित्रता है कि वह सिर्फ जीतने वालों की नहीं होती है। वैसे भी जो जीता वही सिकंदर वाली भावना लोकतांत्रिक व्यवस्था में नहीं चलती। जीतने वाले की जिम्मेदारी ज्यादा बड़ी है और उसे सबके साथ अपना जुड़ाव रखना होता है। लेकिन बिहार विधानसभा में सत्ता पक्ष के लाए कानून का विरोध भी बर्दाश्त नहीं हुआ। जब विधानसभा परिसर में जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों पर हिंसा होगी तो फिर सड़क पर किस व्यवहार की उम्मीद की जाए।
जनतंत्र में सबसे बड़ी बात है संवाद, जो अब नहीं दिख रहा है। खासकर जहां विपक्ष मजबूत होता दिखता है तो उसके खिलाफ पूरा माहौल तैयार कर लिया जाता है।

अदालत के कई निर्देशों के बाद भी दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र संशोधन विधेयक-2021 पारित कर दिया गया। इससे दिल्ली में जनता के चुने गए प्रतिनिधि को उपराज्यपाल का बंधक बना दिया गया है। लंबे समय से लगातार इसी तरह लोकतंत्र की जगह को सिकुड़ाना ही एक नई संस्कृति बनती जा रही है। खास बात यह है कि इस संस्कृति की बात करते ही एक दल दूसरे से कहता है कि तुम हमें जनतंत्र का पाठ न पढ़ाओ। आपातकाल के साथ कई बार अनुच्छेद-356 का प्रयोग करने वाली कांग्रेस को मुंह खोलते ही कह दिया जाता है कि और किसी ने तो अब तक ऐसा नहीं किया।

भारत में लोकतंत्र की जड़ें बहुत गहरी हैं। मगर यहां सामंती सत्ता की भी लंबे समय तक पैठ रही है। जनता की चुनी हुई सत्ता ने लोकतंत्र की संस्कृति के विकास से ज्यादा उसे मारने का अभ्यास किया है। कांग्रेस की पुरानी गलतियों को आगे लाकर हर अलोकतांत्रिक गतिविधि वैधता पा रही है जो एक खतरनाक संकेत है। यह अलोकतांत्रिक अभ्यास हमें कहां ले जाएगा इसका उदाहरण बिहार में सदन से लेकर पंजाब में सड़क तक दिखा है। उसी का नतीजा है कि विपक्ष भी वहां पर लोकतांत्रिक तरीकों को भूल जाता है जहां उसकी ताकत ज्यादा है। अपनी हड़ताल को सफल बनाने के लिए विश्वविद्यालय के अंदर शिक्षक की पिटाई को भी जायज ठहराता है।

आज सबसे बड़ा संकट इसी लोकतांत्रिक संस्कृति पर है। लोकतंत्र का मतलब महज संख्या बल हो गया है, यानी हम संख्या में ज्यादा हैं तो कुछ भी कर सकते हैं। यह भावना लोकतंत्र का अवमूल्यन करती है। राज्य, पुलिस और जनता सब हिंसा करते हैं। लेकिन यहां अहम सवाल यह है कि हिंसा का मकसद क्या है। इसका जवाब भगत सिंह ने दिया था-‘हमारे बम फेंकने का एकमात्र उद्देश्य था बहरों को सुनाना और उन पीड़ितों की मांग पर ध्यान न देनेवाली सरकार को समय रहते चेतावनी देना’। जब तक उद्देश्य स्पष्ट नहीं होगा तब तक आप हिंसा को संतुलित नहीं कह सकते हैं। किसान आंदोलन में भी हिंसा हो रही है। लेकिन उसका स्वरूप वह नहीं है जो बिहार विधानसभा के अंदर हुई हिंसा में है। दोनों के उद्देश्य में अंतर है। लेकिन दोनों का असर लोकतंत्र को लहूलुहान कर रहा है। संसद से सड़क तक को जितनी जल्दी हिंसा से मुक्त कर संवाद बहाली का रास्ता अपनाया जाए हमारे युवा लोकतंत्र के लिए उतना ही अच्छा होगा।

भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल 1929 को केंद्रीय असेंबली में बम फेंका था। इस मामले में चल रहे मुकदमे के दौरान भगत सिंह ने कहा कि ब्रितानी सरकार के औद्योगिक विवाद विधेयक की कार्रवाई को देखने के लिए वे असेंबली गए थे। बकौल भगत सिंह वहां हमारा यह भरोसा और भी मजबूत हो गया कि भारत की मेहनतकश जनता ऐसी संस्था से किसी बात की आशा नहीं कर सकती जो शोषकों की हानिकारक शक्ति की स्मृति है।

Next Stories
1 जन-संघ
2 क्षय का भय
3 भाजपालोक
ये पढ़ा क्या?
X