कंधार्थी

महामारी की दूसरी लहर ने दिल्ली की ध्वस्त व्यवस्था की असलियत सामने रख दी। जब तक व्यवस्था चल रही होती है तब तक उसका श्रेय लेना आसान होता है। लेकिन असल परीक्षा संकट के समय होती है। महामारी वैसा ही संकट है जिसके लिए बाजार पर आधारित व्यवस्था और सरकार कभी तैयार नहीं होती है।

Bebak bol-Corona Virusदिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल (इंडियन एक्सप्रेस फाइल तस्वीर: अरुष चोपड़ा)।

मुकेश भारद्वाज
आपदा और महामारी वह समय होता है जब सरकारों की असली परीक्षा होती है। जब तक सब कुछ ठीक चलता रहता है तो उस स्वत: सही का श्रेय हर सरकार अपने नाम करती है। लेकिन संकट के समय अपनी जिम्मेदारियों की अर्थी दूसरे के कंधे पर रख देने वाले नेताओं से क्या उम्मीद की जा सकती है। जब देश की राजधानी दिल्ली अंतिम संस्कार स्थलों पर शवों की कतार को लेकर सवालों के घेरे में थी उसी वक्त दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल केंद्र के साथ बैठक के खास हिस्से का प्रसारण कर अपनी कमीज सबसे सफेद साबित करने की कोशिश करते हैं। दिल्ली में ऑक्सीजन और दवाओं की कालाबाजारी से लेकर अस्पताल के लिए दर-दर भटकते लोगों के लिए अगर कोई एक जिम्मेदार नहीं है तो वो है केजरीवाल सरकार। दिल्ली में श्मशान की कतार में लगे मुर्दों को जब कंधा देने वाले चार लोग भी मुश्किल से मिल रहे थे तब केजरीवाल सरकार की अपनी छवि निर्माण की कोशिशों पर सवाल उठाता बेबाक बोल

मरीज का नाम- डॉक्टर… उम्र- 55 साल। ढाई दशक से मरीजों की जान बचा रहे थे लेकिन कोरोना से पीड़ित होने के बाद इन्हें अस्पताल में जगह नहीं मिली। देश की राजधानी दिल्ली में जब चिकित्सक अस्पताल में इलाज मिले बिना मर रहे हैं तो आम लोगों की हालत अंतिम संस्कार स्थल पर रखे शवों की लंबी कतार बता रही है। आजादी के बाद हमने ऐसा मंजर पहली बार देखा है जब श्मशान गृह पूरी रात धधक रहे हैं, पार्क में भी शवदाह के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। देश की राजधानी में महामारी के इस भयावह दौर में अचानक एक वीडियो फुटेज सामने आ जाता है जिसमें दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल केंद्र के सामने हाथ जोड़ कर ऑक्सीजन देने की विनती कर रहे थे। जब इस बैठक को सार्वजनिक करने पर केंद्र की ओर से आपत्ति जताई गई तो केजरीवाल और उनके विभाग ने फौरी माफी भी मांग ली। खैर, केजरीवाल अपनी छवि चमकने के बाद माफी मांगों आंदोलन पहले भी करते रहे हैं।

दिल्ली में सरकार बनाने के पहले अपनी क्रांतिकारी छवि बनाने के लिए अरविंद केजरीवाल ने कांग्रेस से लेकर भाजपा नेताओं तक बहुत सख्त आरोप लगाए थे। इन्हीं आरोपों के कारण जनता उनकी मुरीद हुई और उन्हें कांग्रेस व भाजपा के विकल्प के तौर पर चुना था। लेकिन सरकार बनने और छवि बनने के बाद उन्होंने कई मामलों में आराम से माफी मांग मानहानि के मामले को आसानी से खत्म किया।

जब देश की राजधानी महामारी के सबसे वीभत्स रूप में सरकारी व्यवस्था का ‘मुर्दा प्रसारण’ कर रही थी तभी केजरीवाल केंद्र और मंत्रियों की बैठक के सिर्फ उस हिस्से का प्रसारण करते हैं जिसमें वे और सिर्फ वे जनता की फिक्र करते नजर आएं। भारत एक संघीय व्यवस्था के तहत चलता है।

ऐसे समय में केंद्र पर तो सवाल सबसे पहले उठते हैं और हम सब उठाते भी रहे हैं। लेकिन राज्यों के अगुआ की भूमिका को भी सवालों के घेरे में लाने की जरूरत है। केजरीवाल जी दिल्ली की सारी अच्छाई का श्रेय खुद ले अपनी नाकामी को केंद्र के मत्थे मढ़ने में हुनर हासिल कर चुके हैं। चलिए आप भाजपा शासित राज्यों की बात न भी करिए तो केरल और ओड़ीशा का उदाहरण देखिए। केरल में केंद्रीय सत्ता की विपरीत विचारधारा की सरकार है लेकिन वह कोरोना पर अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर चुकी है। ओड़ीशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक उन मुख्यमंत्रियों में से हैं जो केंद्र से उतना सहयोग करते हैं जितना उनके राज्य की जनता के लिए जरूरी है और समय आने पर राज्यों के अधिकार को लेकर अपनी आवाज भी बुलंद करते हैं। आज ओड़ीशा जैसा कम संसाधनों वाला राज्य कोरोना से निपटने में तुलनात्मक रूप से बेहतर है तो इसलिए कि वहां के मुख्यमंत्री जनता के लिए काम कर रहे हैं, अपनी छवि चमकाने के लिए नहीं।

महामारी की दूसरी लहर ने दिल्ली की ध्वस्त व्यवस्था की असलियत सामने रख दी। जब तक व्यवस्था चल रही होती है तब तक उसका श्रेय लेना आसान होता है। लेकिन असल परीक्षा संकट के समय होती है। महामारी वैसा ही संकट है जिसके लिए बाजार पर आधारित व्यवस्था और सरकार कभी तैयार नहीं होती है। बाजार को तो मुनाफा चाहिए होता है। इसलिए लोकतांत्रिक सरकारों की जिम्मेदारी होती है कि वह पंचायत से लेकर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक को दुरुस्त करे। यहां हम उस समय को भी याद कर सकते हैं जब आम आदमी पार्टी ने मोहल्ला क्लीनिक का दुनिया भर में प्रचार करने में अपनी पूरी ताकत लगा दी थी। विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ कई संस्थाएं तारीफ करके गई थीं। लेकिन शुरुआती प्रचार के बाद आप ने उन मोहल्ला क्लीनिकों के साथ क्या किया? आज महामारी के समय उसके योगदान का उल्लेख हम क्यों नहीं कर पा रहे हैं। क्योंकि सरकार का मकसद जनस्वास्थ्य नहीं, अपनी छवि बनाने का स्वांग भर था।

आम आदमी पार्टी ने मोहल्ला क्लीनिक और शिक्षा के मुद्दे को काफी भुनाया था। महामारी के समय में दिल्ली के सरकारी स्कूलों के हाल पर चर्चा फिर कभी। अभी तो सीधा सवाल यह कि कहां गई वह स्वास्थ्य सुविधा जिसका हर दीवार पर ‘कीमती प्रचार’ था। संकट के समय ही पता चलता है कि आपने जो निर्मित किया वह कितना खरा उतर रहा है। संकट के समय ही यह भी बात समझ आती है कि राजनीतिक नेतृत्व अपनी नाकामी को कितना कबूल कर पाता है, अपनी कमियों को खुद कितना इंगित कर पाता है। जब तक आप अपनी कमियों को कबूलते नहीं हैं तब तक कोई कंधा खोजते हैं जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने के लिए। केजरीवाल ने इसके लिए केंद्र को स्थायी कंधा बना ही लिया था। लेकिन इस बार जब मुर्दों को कंधा देने का वक्त था तो केजरीवाल ने उसके लिए भी अपना कंधा नहीं दिया।

वर्तमान संकट के लिए पहले ही आगाह कर दिया गया था। इतने समय में केंद्र हो या राज्य ये सभी अपनी कमियों को पहचानते हुए, राष्ट्रीय संसाधन का समुचित इस्तेमाल करने, नियंत्रित करने और उसे बढ़ाने का काम कर सकते थे। लेकिन दिल्ली सरकार इस पर कैसे आंखें मूंदे रही इसका उदाहरण ऑक्सीजन की कमी से टूटती सांसें हैं। महामारी से हुई मौतों की ऊंचाई पर पहुंचने पर भी दिल्ली सरकार ऑक्सीजन के परिवहन और कालाबाजारी रोकने के मसले पर आंखें मूंदे रही। उसे लगा ये सभी मौत केंद्र के खाते में जानी हैं। ऑक्सीजन पर हाहाकार मचने के बाद आम आदमी पार्टी की सरकार ने ऐसी छवि बनाई कि इसमें सारी भूमिका केंद्र की है। ‘आप’ के अगुआ को इंतजार था उस मौके का जब वह जनता के सामने हाथ जोड़ कर अपनी साफ-सुथरी छवि पेश कर देते और उन्होंने ऐसा किया भी।

इतनी बड़ी आपदा के समय जहां सभी सरकारों को मिलजुल कर सकारात्मक माहौल बनाना चाहिए, साझेदारी और भागीदारी की बात करनी चाहिए वहीं केजरीवाल अलग होकर अपनी कमीज को सबसे सफेद दिखाने में जुट जाते हैं। जिस दिल्ली सरकार के कागजी स्वास्थ्य बजट को दुनिया भर में प्रशंसा मिली वह आपदा के समय बस अपने प्रचार-प्रसार में मशगूल रही। इसी के तहत बैठक का सीधा प्रसारण जनता को दिखाते हुए कहा कि हम तो ऑक्सीजन मांग रहे हैं और केंद्र दे नहीं रहा है। जब केंद्र की ओर से कहा गया कि हम तो ऑक्सीजन दे रहे हैं उनके पास परिवहन और वितरण के साधन नहीं है तो फिर वही सब कि हमें हरियाणा नहीं सहयोग कर रहा, हम तो विदेश से मंगवा रहे हैं।

ऐसे गंभीर समय में केजरीवाल जिस तरह अगंभीर होकर अपनी छवि बनाने के लिए दूसरों का कंधा तलाश रहे थे उस समय दिल्ली में मर रहे लोग भी सोच रहे होंगे कि ये हमें क्या कंधा देंगे। कंधे की जरूरत मुर्दों को होती है और केजरीवाल सरकार आपदा के समय जिंदा होती तो जिम्मेदारियों की अर्थी उठाने के लिए केंद्र का कंधा न खोजती।

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