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सेवानिवृत्त साहित्य

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की बेटी और दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास की प्रोफेसर उपिंदर सिंह ने किताब का विरोध करते हुए कहा था, 'जिस वक्त पर ये किताब आई है और उसमें जो कथ्य है, दोनों प्रधानमंत्री के भरोसे के साथ दगाबाजी है। यह पीठ में छुरा घोंपने जैसा है। लेखक ने अपनी पहुंच का फायदा उठाया है। किताब में लेखक ने चीजों को बढ़ा-चढ़ा कर लिखा है।"

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की जिंदगी पर बनी फिल्म ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ का एक दृश्य।

मेरा मकसद समाज को बदलना नहीं था। मैं समाज को मौका देना चाहता था कि वो तय करे कि क्या वो बदलना चाहता है?
-एडवर्ड स्नोडेन
अमेरिकी सरकार की राष्ट्रीय सुरक्षा एजंसी (एनएसए) के पूर्व उप-संचालक एडवर्ड स्नोडेन उन बागियों में जाने जाते हैं जो सत्ता के साथ रह, उसका सच चुरा कर समाज के हवाले कर देते हैं। अमेरिका से गुप्त दस्तावेज लेकर भागे स्नोडेन ने बराक ओबामा की सरकार पर जासूसी का आरोप लगा अमेरिका की वैश्विक छवि पर संकट खड़ा कर दिया था। एक तरफ तो स्नोडेन जैसे लोग हैं जो नौकरी में रहते हुए खुद के जीवन पर खतरा उठा दुनिया को बेहतर बनाने के लिए खुलासा करते हैं। दूसरी तरफ वैसे अधिकारी हैं जो सत्ता से निजी रिश्ते का खुलासा निजी फायदे के लिए करते हैं। सच उघाड़ने के इस विरोधाभास पर बेबाक बोल

‘जिस वक्त पर ये किताब आई है और उसमें जो कथ्य है, दोनों प्रधानमंत्री के भरोसे के साथ दगाबाजी है। यह पीठ में छुरा घोंपने जैसा है। लेखक ने अपनी पहुंच का फायदा उठाया है। किताब में लेखक ने चीजों को बढ़ा-चढ़ा कर लिखा है। गपशप और असत्यापित कोट्स को बयान की तरह पेश किया गया है। क्या यह सही है?’

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की बेटी और दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास की प्रोफेसर उपिंदर सिंह ने ये बातें तब कहीं थीं जब लोकसभा चुनाव के पहले अचानक उनके पिता पर आधारित किताब ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ को बाजार में उछाल दिया गया। ऐन चुनाव के वक्त आई इस किताब के आधार पर आनन-फानन में एक फिल्म भी बना ली गई। पिछले दिनों केंद्र सरकार ने खुफिया और सुरक्षा संबंधी संगठनों में काम कर चुके सेवानिवृत्त अधिकारियों को संवेदनशील जानकारी प्रकाशित करने से रोकने संबंधी अपने नियमों में संशोधन कर नए उपनियम में कहा कि अधिकारी संगठन के कार्यक्षेत्र या किसी कर्मी संबंधी कोई सामग्री साझा नहीं कर सकते हैं। ऐसा करने पर उनकी पेंशन रोक ली जाएगी।

खुफिया सेवाओं के अधिकारियों पर इस तरह की गोपनीयता के नियम हर तरह की सरकारें लगाती हैं। खुफिया और सुरक्षा संबंधी संगठनों के अधिकारी पद ग्रहण के दौरान गोपनीयता की शपथ पर दस्तखत करते हैं। सेवाकाल के दौरान उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संकुचित की जाती है। अब सरकार ने गोपनीयता की इस शपथ को सेवानिवृत्ति के बाद भी विस्तार दे दिया है तो इसका असर आने वाले समय में क्या पड़ेगा? पश्चिमी देशों में इस तरह की बहुत सी किताबें लिखी गईं जिसने सत्ता के कई रहस्यों को आम लोगों के लिए बेनकाब किया। ये किताबें नहीं आतीं तो हमें पता भी नहीं चलता कि सत्ता का असली चेहरा कैसा होता है। हमारे देश के इतिहास में खुफिया और सुरक्षा तंत्र से जुड़े नौकरशाहों द्वारा तंत्र की पोल खोलती कुछ चुनिंदा किताबें ही हैं। निश्चित तौर पर इस तरह के कानून के बाद यह और कम हो सकती हैं।

हमने वो दौर भी देखा जब एडवर्ड स्नोडेन के खुलासों ने पूरी दुनिया में अमेरिका जैसी महाशक्ति की किरकिरी कर दी। खैर, इस तरह के खुलासे करने वाले लोग नौकरी या पेंशन की फिक्र नहीं करते हैं और सत्ता के अंदर रहते हुए ही उसे बेनकाब कर देते हैं।

स्नोडेन जैसे नागरिक पहरुए के इतर सत्ता से जुड़े एक और खुलासे की प्रवृत्ति है। यह है सेवानिवृत्त साहित्य की। सत्ता से जुड़े अफसर और सलाहकार पदमुक्त होने के बाद जब किताब लिखते हैं तो उसका मूल्यांकन किस तरह किया जा सकता है। इसी तरह के साहित्य पर बात करने के लिए लेख के शुरू में मनमोहन सिंह की बेटी का बयान उद्धृत किया गया है।

सरकारी अधिकारियों की लिखी किताब पर बात करने से पहले हमारे देश में नौकरशाही के ढांचे को देखना होगा। हमारी नौकरशाही अंग्रेजों की बनाई व्यवस्था से ही आई है। आजादी के बाद लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी बहुत दूर तक यह सामंती स्वरूप में ही रहा। अगर जनतांत्रिक रचना में नौकरशाही विधायिका से स्वतंत्र होती तो कहा जा सकता था कि इसमें उसकी व्यक्तिगत नैतिकता है, सेवा के प्रति निष्ठा है, राष्ट्र के प्रति निष्ठा है। लेकिन आपको जो मिल रहा है वो सबसे पहले इस बात पर टिका है कि किसकी सरकार है, उसके साथ आपके व्यक्तिगत संबंध कैसे हैं। ऐसे में स्वाभाविक है कि सत्ता बदलते ही इस चरित्र का बदलाव दिखना शुरू हो जाता है। आप उसके हिस्सा रहने को लोकप्रियता पाने का आधार बना सकते हैं। यहीं पर आपकी व्यक्तिवादिता का रूप सामने आता है और आपके लिखे पर कब, क्यों और कैसे जैसे सहज सवाल उठ ही जाते हैं।

नौकरशाहों के सेवानिवृत्त साहित्य पर सवाल का आधार यही है कि जो पद आपको मिल रहा है, आपकी स्वाभाविक योग्यता के रूप में नहीं मिल रहा है। यह एक निजी रिश्ते का आभार है। ऐसे में खुद को महत्त्वपूर्ण जताने के लिए किताब लिखने जैसा उद्यम व्यवस्था के खिलाफ कोई इंकलाब नहीं ला पाता है। वक्त गुजरने के बाद कोई भी संवेदनशील सूचना पाठकों को गल्प-कथा सा ही मजा दे सकती है। देश के शीर्ष पदों के साथ रहे नौकरशाहों की लिखी किताबों में हजार शब्द ही काम के होते हैं या कहें सनसनी के होते हैं। उन्हें ही बार-बार चुभलाया जाता है। आप किताब उस आदमी के बारे में लिख रहे हैं जिसने भरोसा करके आपको गले लगाया। जाहिर सी बात है कि ऐसी किताब छापी ही जाती है राजनीतिक इस्तेमाल के लिए। मनमोहन सिंह पर लिखी किताब के आधार पर बनी फिल्म को सत्ताधारी पार्टी के ट्वीटर हैंडल से ट्वीट किया गया। खास बात यह है कि इस फिल्म में मनमोहन सिंह का किरदार अनुपम खेर ने निभाया था जो मौजूदा सत्ता के पक्षकार बने रहते हैं। पहले नेताओं की शख्सियत अजीम होती थी तो उनके मरने के बाद किताब लिखी जाती थी। लेकिन अब तो बाजार इतना इंतजार भी नहीं कर पाता है।

सत्ता के साथ जुड़ा रहा अधिकारी जब उससे अलग होने के बाद लिखता है तो जाहिर सी बात है, उसका मकसद व्यवस्था को उघाड़ना नहीं होता है। उसका मकसद उस किताब से अपनी पहचान बनाना और मुनाफा कमाना होता है क्योंकि उस किताब की बाजार में मांग होती है और बनाई जाती है। तुरंता लेखक के रूप में उन्हें एक नायकत्व का दर्जा प्राप्त होता है। सबसे अहम सवाल ये है कि आपने अपने पास महफूज सूचना को कब सार्वजनिक किया? क्या आपने संजीव चतुर्वेदी, अशोक खेमका की तरह व्यवस्था में रहते हुए सवाल उठाया है?

एक अंग्रेजी कहावत का तर्जुमा है कि जो किसी के लिए देशद्रोही है वो किसी और के लिए देशभक्त है। व्यवस्था के अंदर रहकर आवाज उठाने वाले व्यवस्थापकों के लिए देशद्रोही की तरह देखे जाते हैं। व्यवस्था के खिलाफ रहने वाले लोगों को व्यवस्था अपने करीबियों में शुमार करती ही नहीं है। इसके लिए अशोक खेमका के तबादलों की गिनती ही कर ली जाए तो अहसास हो जाएगा कि व्यवस्था पर सवाल उठाने वालों का क्या अंजाम होता है।

भारतीय वन सेवा के अधिकारी संजीव चतुर्वेदी ने बतौर सीवीओ एम्स के अपने दो साल के कार्यकाल में 150 से ज्यादा भ्रष्टाचार के मामले उजागर किए थे। सार्वजनिक क्षेत्र में भ्रष्टाचार के मामलों को उजागर करने के लिए संजीव चतुर्वेदी को रैमन मैग्सेसे पुरस्कार भी मिला। लेकिन वो कभी सत्ता के करीबी न हो पाए और अदालती लड़ाई के लिए मजबूर हुए। खेमका और चतुर्वेदी जैसे लोगों ने व्यवस्था में रहते हुए आवाज उठाई है। वे बाद में किताब भी लिखते हैं तो उनकी विश्वसनीयता पर किसी को संदेह नहीं होगा। लेकिन जो लोग व्यवस्था का हिस्सा रहते हुए चुप रहेंगे, अपनी उतनी ही बात कहेंगे जितनी से नौकरी पर आंच न आए और न उनमें माद्दा होगा उसूलों के लिए नौकरी छोड़ने का तो उनका किसी भी तरह का रहस्योद्घाटन संदेह के घेरे में ही रहेगा।

विरोध कोई सुविधा की चीज नहीं है कि आप सब कुछ अपने अनुकूल होने की प्रतीक्षा करते रहेंगे। खुफिया सुरक्षा से जुड़े लोगों के लिखे-कहे पर बहस होती रहेगी। लेकिन उसके अलावा जिस खुलासे से व्यवस्था को कोई परेशानी न हो, जिसका किसी विमर्श को खड़ा करने में कोई योगदान न हो, जिसे सिर्फ बाजार के लिए कलमबद्ध किया गया हो उस पर उठे भरोसे और नैतिकता के सवालों को भी अनुत्तरित नहीं छोड़ा जा सकता।

संजय बारू की किताब ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ के छपने के समय को लेकर मनमोहन सिंह की बेटी उपिंदर सिंह ने सवाल किए थे। उन्होंने आरोप लगाया कि जब देश में चुनाव हो रहे हैं तो इस तरह की पक्षपात से भरी किताब अच्छे इरादे से नहीं आ सकती है। कौर ने आरोप लगाया था कि बारू ने अपनी किताब में जिस तरह से तथ्यों को पेश किया है वह खुद को बड़ा दिखाने की कोशिश है।

Bebak bol-Congress Katha पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की बेटी उपिंदर सिंह।

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