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आईने के सामने

लोकतंत्र का यह दुर्भाग्य है कि यहां सारे लोकतांत्रिक फैसले वोट के लिए होते हैं। सभी बड़े फैसले चुनाव के लिए रोक कर रखे जाते हैं। चुनावों के पहले हजारों करोड़ों के पैकेज घोषित होते हैं जो चुनाव जीतने के बाद बड़ी आसानी से भुला दिए जाते हैं। पहले खबर छपती है कि उम्मीदवार ने इतने बड़े पैकेज का एलान किया। कुछ समय बाद खबर छपती है कि सांसद महोदय अपनी सांसद निधि का इस्तेमाल ही नहीं कर पाए।

कोरोना से बचाव के लिए टीका लगाने के लिए तैयारी करतीं हेल्थ वर्कर।

कोरोना संकट से पूरी दुनिया जूझ रही है और अपने-अपने तरीके से निपट भी रही है। लेकिन इस मामले में भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी समस्या है ‘असली समस्या’ से नागरिकों को भटका देना। टीकाकरण की नीति पर अदूरदर्शी कदम के लिए केंद्र सरकार सवालों के घेरे में है। आज जब असल समस्या टीके की कमी है तो कुछ राज्य सरकारें टीके के प्रमाणपत्र पर तस्वीर को मुद्दा बना रही हैं। चूंकि टीकाकरण का पूरा मामला पहले केंद्र के हाथों में था तो प्रमाणपत्र पर केंद्र के अगुआ की तस्वीर थी। टीके खरीदने के लिए राज्यों को अधिकार मिलते ही छत्तीसगढ़ में प्रधानमंत्री की तस्वीर की जगह मुख्यमंत्री की लगा दी गई। महामारी के वक्त भी राजनेता अपने छवि प्रबंधन में किस कदर व्यस्त हैं इसे समझा जा सकता है। वे जनता को चवन्नी भर सुविधा देते ही उसके प्रचार में खुद पर रुपया खर्च कर देते हैं। महामारी पर मचे हाहाकार के बीच नेताओं के चित्रहार पर बेबाक बोल

कितना आसां है तस्वीर बनाना औरों की
खुद को पस-ए-आईना रखना कितना
मुश्किल है
-इशरत आफरीन

भारत की सियासत में कोरोना का काल विडंबनाओं का भी काल है। सबसे बड़ी विडंबना है महामारी के समय भी नेताओं का अपना चेहरा चमकाने की कोशिश करना। आज जब हम बड़ी संख्या में मौतों के साथ टीकाकरण में विसंगतियों का सामना कर रहे हैं तो छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री कोरोना टीके के प्रमाणपत्र पर अपनी तस्वीर चस्पा कर रहे हैं। वे सोशल मीडिया के उन खातेदारों की तरह व्यवहार कर बैठे जो बड़ी से बड़ी आपदा को भी अपनी प्रोफाइल तस्वीर अद्यतन करने का अवसर बना बैठते हैं। इसके पहले झारखंड में टीका लेने के बाद लोगों को जो स्थानीय स्तर पर बना कटआउट दिया गया उसमें मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की तस्वीर थी।

पहले हम केंद्र की आलोचना कर रहे थे कि मौत के इस मंजर पर भी उसे अपने छविरंजन की चिंता है। लेकिन टीके की किल्लत सामने आते ही भूपेश बघेल जैसे मुख्यमंत्री भी उसी रंग में रंग गए कि कोरोना टीके के प्रमाणपत्र पर फोटो तो हमारी लगनी चाहिए। दरअसल, हमारे सियासतदानों को हर जगह अपनी फोटो चाहिए। अखबार से लेकर दीवार के हर इश्तहार तक उनकी संपादित तस्वीर हाथ जोड़ती नजर आती है। दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया जब महाराणा प्रताप की जयंती पर विज्ञापन देते हैं तो यह ज्ञान बांटना नहीं भूलते कि महाराणा प्रताप का कद कितना लंबा था और उनके भाले का वजन कितना था। जिले या कस्बे का उदीयमान नेता शिवरात्रि की बधाई देती बड़ी सी होर्डिंग लगाता है तो शिवजी से बड़ी अपनी तस्वीर छपवाता है।

हालांकि, कोरोना काल में गुम हुई सरकार और प्रशासन को खोजने की कोशिश में जनता उन कार्यकर्ताओं को भी अपनी मदद के लिए तलाश रही थी जो छठ से लेकर ईद तक की शुभकामना देने के लिए सड़कों पर अपनी विशालकाय तस्वीरें लगवाते हैं। कई जगहों पर विधायकों और सांसदों की तस्वीर लगा कर कोरोना काल में गुमशुदा नेताओं की तलाश की अपील की गई है।

यह हमारे लोकतंत्र का दुर्भाग्य है कि यहां सारे लोकतांत्रिक फैसले वोट के लिए होते हैं। सभी बड़े फैसले चुनाव के लिए रोक कर रखे जाते हैं। चुनावों के पहले हजारों करोड़ों के पैकेज घोषित होते हैं जो चुनाव जीतने के बाद बड़ी आसानी से भुला दिए जाते हैं। पहले खबर छपती है कि उम्मीदवार ने इतने बड़े पैकेज का एलान किया। कुछ समय बाद खबर छपती है कि सांसद महोदय अपनी सांसद निधि का इस्तेमाल ही नहीं कर पाए।

इस समय पूरे देश की सियासत सिर्फ छवि प्रबंधन पर टिकी है। यहां तक कि क्रांति की आंधी से निकले अरविंद केजरीवाल जैसे मुख्यमंत्री भी जनता के पैसे जनता को भरमाने के इश्तहार में झोंक देते हैं। दुखद यह है कि जब जनता महामारी में मर रही है तब भी नेताओं को सिर्फ अपनी छवि बनाने की चिंता है।
कोरोना से मौतों के बीच टीकों की कमी मूल समस्या है। जो टीके पर्याप्त मात्रा में हैं ही नहीं उसका श्रेय लेने की होड़ है। शुरू में टीकाकरण की पूरी प्रक्रिया केंद्र के हाथों में थी। केंद्र की योजना थी कि वह चरणबद्ध तरीके से विभिन्न राज्यों को टीका मुहैया कराएगा। इसके लिए केंद्रीय बजट में 35 हजार करोड़ आबंटित किए गए। स्वाभाविक था कि टीका प्रमाणपत्र पर केंद्र के प्रतिनिधि का ही चेहरा रहता। लेकिन टीकाकरण शुरू होते ही कोरोना की दूसरी घातक लहर आ गई। दूसरी लहर में ज्यादा प्रभावित राज्यों को भी पर्याप्त संख्या में टीके नहीं मिल पाए तो मांग उठी कि राज्यों को दवा कंपनियों से खुद ही टीके खरीदने का अधिकार दिया जाए।

टीकाकरण जैसे जनस्वास्थ्य अभियान की एक पूरी कार्ययोजना होती है। मगर इसमें आगे के हालात का अनुमान नहीं लगाया गया। शायद नीति निर्धारकों को लगा कि 45 वर्ष से नीचे वालों को टीके की जरूरत नहीं पड़ेगी और उसी हिसाब से टीकों के लिए करार किया गया। लेकिन दूसरी लहर ने जब युवाओं को चपेट में लेना शुरू किया तो उनके लिए भी टीकाकरण खोलने का दबाव पड़ा। टीके का निर्माण वैश्विक मामला है। कई देशों ने टीके के अनुसंधान के समय से ही अपने लिए ज्यादा मांग रखी और कंपनियों में ज्यादा उत्पादन के लिए निवेश किया। जाहिर है कि उन्हें ही प्राथमिकता मिलनी थी।

इसी दूरदृष्टि के अभाव के कारण सिथति बिगड़ी। तब युवाओं के टीकाकरण के लिए राज्यों को कहा गया कि वे कंपनियों से खुद टीके खरीद सकते हैं। लेकिन जब अलग-अलग राज्य सरकारों ने कोशिश की तो कंपनियों ने कहा कि वे सिर्फ केंद्र सरकार के साथ करार करेंगी। टीका कंपनियों को किसी आपात स्थिति में भारत सरकार के कानूनों के तहत काम करना होगा तो वो सिर्फ केंद्र के साथ ही किसी करार पर दस्तखत कर सकती हैं। इसके बाद दवा कंपनियों से राज्यों की सीधी खरीद पर गतिरोध खड़ा हो गया है।

लेकिन टीकाकरण की सुई केंद्र पर अटकने के पहले ही एक राज्य के मुख्यमंत्री ने तस्वीर ही बदल दी, जैसे महामारी के इतने भयावह समय का यह अनिवार्य समाधान हो। उत्तर प्रदेश में एक ही व्यक्ति को दो अलग-अलग कंपनियों के टीके लगने की शिकायत आई तो पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की सबसे पहली चिंता यही थी कि ऐसी गड़बड़ी वाले टीके के प्रमाणपत्र पर तस्वीर किसकी लगेगी। पंजाब सरकार ने भी आम लोगों की राहत के लिए जो कोरोना किट जारी किया उसमें मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह अपनी तस्वीर लगाना नहीं भूले ताकि संक्रमित मरीज स्वस्थ होने के बाद वोट देते समय उन्हें याद रखें।

देश में नागरिकों के स्वास्थ्य की किसी को चिंता नहीं। टीके का यही संकट रहा तो इसका चक्र पूरा करने में 2022 के दिसंबर तक का समय खिंच सकता है। इसका बुरा असर पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ने के आसार हैं। स्कूल और कॉलेज भी पूरी कार्यक्षमता के साथ नहीं खुल सकेंगे जो बच्चों और युवाओं के भविष्य के लिए बेहद बुरा साबित होगा।

कोरोना को लेकर केंद्र से लेकर राज्य सरकारों तक पर सवाल है। यही वजह है कि असल समस्या पर बात करने के बजाय भूपेश बघेल टीका प्रमाणपत्र पर तस्वीर बदलने की होड़ कर बैठे। कोरोना से लड़ने और लोगों को मरने से बचाने के बजाए अपनी-अपनी तस्वीर डाल कर विज्ञापनों का जो खेल चल रहा है वह दिखाता है कि गंभीर समय में भी हमारे नेता आत्मप्रचार से ऊपर नहीं उठ पाए हैं। वे अब तक टीकाकरण में केंद्र सरकार की आलोचना सिर्फ इसलिए कर रहे थे कि उनके पास केंद्र जैसा व्यवहार करने का अधिकार नहीं है। टीके की खरीद का अधिकार मिलते ही कुछ राज्य सरकारों ने सबसे पहले खुद को केंद्र जैसा ही साबित किया। उनके व्यवहार से यही लगा कि जनता की जान जाए पर प्रचार का मौका न जाए।

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