मानमर्दन

आजादी शब्द के मायने क्या हैं, कौन आजाद हुआ था। आजाद हुए थे भारत के नागरिक जिन्होंने अपना संविधान रचा। भारत के संविधान में अगर कोई सर्वोपरि है तो वो नागरिक है। आज इसी संप्रभु देश के नागरिक की गरिमा खतरे में है। इस नागरिक की सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक कहीं भी ‘लिंचिंग’ हो सकती है।

Bebak Bol, Special Story
केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता नारायण राणे एक कार्यक्रम में अपनी बात रखते हुए।

जनता और जनतंत्र का रिश्ता ही अच्छे दिनों की उम्मीद का रहा है। लेकिन कुछ बरसों में ‘अच्छे दिन’ ऐसा जुमला बन गया है जिसे सुन कर आंखों में उम्मीद की रोशनी नहीं, होठों पर व्यंग्य की टेढ़ी लकीर खिंचती है। लोगों को लगने लगा है कि हमारे लिए कोई खिड़की ऐसी नहीं रहने दी गई है जो सुबह की रोशनी से हमारे घर को नहला दे। ‘रामजादों’ से शुरू हुई राजनीतिक संस्कृति इस मोड़ पर पहुंच गई है कि एक केंद्रीय मंत्री एक राज्य के मुख्यमंत्री को थप्पड़ मारने की बात कह देते हैं। पंद्रह लाख की उम्मीद करने वाली जनता आज अपने खाते में पंद्रह सौ के लिए तरस रही है। केंद्र के पास सड़क पर निकले मजदूरों का आंकड़ा नहीं है, राज्यों के पास ऑक्सीजन की कमी से मरने वाले लोगों का आंकड़ा नहीं है। इस पर किसी सरकार, किसी मंत्री को शर्म नहीं आती। लेकिन सरकार के मंत्री जी को इस बात पर गुस्सा आ जाता है कि किसी राज्य के मुख्यमंत्री को यह बात याद नहीं रहती कि देश को आजाद हुए कितना समय हो गया है।

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की पंक्ति है-‘देश कागज पर बना नक्शा नहीं होता’। यह पंक्ति तब-तब दोहराई जाती रही है जब धर्म और राष्ट्र के नाम पर सबसे कमतर नागरिक और नागरिकता को मान लिया जाता है। आज हम ऐसी राजनीतिक संस्कृति में जी रहे हैं जहां देश के नाम पर गाली-गलौज और अन्य तरह के शाब्दिक व शारीरिक उत्पीड़न को भी जायज ठहरा देते हैं।
किसी भी देश की राजनीति बहुत दूर तक उसकी राजनीतिक संस्कृति से तय होती है। आज संसद से लेकर सड़क तक न सिर्फ गिरावट का दौर है बल्कि इस गिरावट को राजनीतिक उत्सव की तरह लिया जाता है। कुबोल का कुपाठ इतनी बार किया जाता है कि वही सही लगने लगता है। हमें इस गिरावट की छाया कभी-कभी संसद के अंदर मारपीट और माइक तोड़ने में दिखाई देती रही है। किसी भी तरह की गिरावट का प्रतिबिंब सबसे पहले भाषाई स्तर पर ही दिखता है।

हाल ही में दिल्ली की एक अदालत ने जंतर मंतर पर नफरती नारे लगाने वाले लोगों को जमानत देने से इनकार कर दिया। अदालत का तर्क था कि हम कोई तालिबान नहीं हैं। एक नजर में तो कहा जा सकता है कि थप्पड़ मारने की बात कहना अपराध की श्रेणी में नहीं आना चाहिए। यह तो मौखिक गाली भर है। लेकिन हमारे संविधान में सबसे अहम नागरिकों का सम्मान है। हर नागरिक को सम्मान के साथ जीवन जीने का अधिकार है। नागरिकों के मान को सुरक्षित रखने के लिए संवैधानिक प्रावधान हैं। संविधान कहता है कि हर नागरिक की अपनी गरिमा है जिसे ठेस नहीं पहुंचनी चाहिए। यह गरिमा सड़क पर चलते आम नागरिक से लेकर मुख्यमंत्री तक, सबके लिए बराबर है।

काफी समय से सोशल मीडिया और विभिन्न तरह के आइटी सेल ने एक तरह की ट्रोलिंग संस्कृति बना दी है। अब हम नागरिक नहीं भीड़ की तरह व्यवहार करने लगे हैं। एक ऐसा माहौल बना दिया गया है कि नागरिक के मान और अपमान व गरिमा जैसे सवालों को ताक पर रख दिया गया है। धर्म और राष्ट्रवाद को आगे करके किसी की भी गरिमा को आहत करने का मानो नैतिक अधिकार हो गया है। एक तरह का श्रेष्ठताबोध आ गया है कि हम सत्ता द्वारा मांजे गए राष्ट्र और धर्म के सवालों को अपना कर नागरिकों का मानमर्दन जायज करार देने लगे हैं।

आजादी शब्द के मायने क्या हैं, कौन आजाद हुआ था। आजाद हुए थे भारत के नागरिक जिन्होंने अपना संविधान रचा। भारत के संविधान में अगर कोई सर्वोपरि है तो वो नागरिक है। आज इसी संप्रभु देश के नागरिक की गरिमा खतरे में है। इस नागरिक की सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक कहीं भी ‘लिंचिंग’ हो सकती है। संसद से लेकर सड़क तक, हिंदी वालों की यह पसंदीदा पंक्ति है। लेकिन अब यह सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक हो गई है। यहां पर किसी का नाम या काम पूछ कर या किसी अन्य आधार पर अपमानित किया जा सकता है। और यह सब हो रहा है उस राष्ट्र के नाम पर जो देश के सभी नागरिकों को एक जैसा मान और अधिकार देता है।

नारायण राणे मामले का सबसे दुखद पहलू यह है कि वे अपने अपशब्दों को भी न्यायोचित ठहरा रहे हैं। पहले लोग इस तरह की गलती पर कहते थे कि जुबान फिसल गई, मेरा यह मतलब नहीं था। लेकिन अब तो लगता है कि ऐसे शब्द पटकथा के साथ बोले जाते हैं जिस पर हंगामा मचने के बाद पूरी राष्ट्रवादी कथा बांच दी जाती है। यह वैसा ही है जैसे किसी बच्चे को मार-पीट कर सिखाया जाता है। मानो राष्ट्रवाद आपको अभिभावकत्व दे रहा है कि अरे इसे इतना भी नहीं पता, चलो इसकी पिटाई करो।

भारत के संविधान में अंतत: राष्ट्र की निर्मिति इसी नागरिक से है। उस नागरिक को ही अगर अपमानित किया जाए तो फिर राष्ट्र की गरिमा का कोई मतलब नहीं है। सिर्फ नक्शा, झंडा या राष्ट्रगान की गरिमा ही राष्ट्र की गरिमा नहीं है। जाति के नाम पर, धर्म के नाम पर राष्ट्रवाद के नाम पर आज नागरिक की नागरिकता मुहाने पर है। सड़क पर उसकी चीड़फाड़ कहीं भी की जा सकती है। यह एक बहुत बड़ा संकट है। नारायण राणे हो या उद्धव ठाकरे, ये एक ही राजनीतिक संस्कृति से निकले हुए लोग हैं। मराठी अस्मिता के नाम पर दक्षिण भारत से लेकर उत्तर प्रदेश व बिहार के लोगों के लिए नफरत फैलाने वाले यही लोग रहे हैं। शायद यही कारण है कि लोग इस मामले को हल्के में ले रहे हैं। ऐसा बताया जा रहा है कि ये इनका आपसी और जैसे को तैसा वाला मामला है।

असल दिक्कत यह है कि देश में दूर बैठा आदमी इसे किस तरह से लेगा? वह किसी कथित मान-अपमान पर थप्पड़ से आगे लाठी-भाले तक चला जाएगा। आज मुख्यमंत्री तक केंद्रीय मंत्री के जरिए ट्रोलिंग का शिकार हैं। इसका एक असर यह भी है कि मंत्रियों व नेताओं को भद्दी गालियां देते हुए आम लोगों के वीडियो वायरल हो जाते हैं और लोग उसमें अपना सियासी सुकून ढूंढते हैं। दायित्वपूर्ण जगह पर बैठे नारायण राणे जैसे लोग थप्पड़ मारने जैसी भाषा का इस्तेमाल करते हैं तो सड़कछाप और सोशल मीडिया पर हम ‘लिंचिंग’ और ‘ट्रोलिंग’ को किस तरह से रोक पाएंगे। शाब्दिक हिंसा को सड़क पर शारीरिक हिंसा में बदलने में देर नहीं लगती।

जब राज्य के पास महंगाई और बेरोजगारी जैसे मुद्दों का जवाब नहीं होता तो वह उसे नक्शे और झंडे के प्रतीकों में उलझ देता है। कैंसर और बहुत सी ऐसी बीमारियां हैं जिसका चिकित्सा विज्ञान के पास मुकम्मल इलाज नहीं है। लेकिन चिकित्सा विज्ञान इतना जरूर करता है कि वह मरीजों के दर्द को कम कर सके, मौत के पहले उन्हें कुछ साल के लिए अच्छी जिंदगी दे सके। लेकिन सरकारों की रणनीति हो गई है कि जनता के दर्द को अनसुना कर उनके सामने ऐसी समस्या रख दो कि वह अपना दुखड़ा ही भूल जाए। प्रतीकों के गुणगान में वह सरकार से अपनी जिंदगी की बेहतरी के बारे में सवाल करना भूल जाए। प्रतीकों के मान में वह अपना मर्दन भूल जाए।

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