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क्षय का भय

किसान नेताओं की रणनीति है कि बिना किसी राजनीतिक नुकसान के केंद्र सरकार को संवाद की मेज पर नहीं बैठाया जा सकता है। दो ऐसे राज्य हैं जहां उसके राजनीतिक नुकसान की संभावना बन सकती है। इसी के तहत सबसे पहले बंगाल की जमीन को चुना गया है। बंगाल में किसान नेताओं का मकसद किसी खास दल को फायदा पहुंचाना नहीं है। वहां अहम है भाजपा को राजनीतिक नुकसान पहुंचाना।

farmer movement, farm lawsसंयुक्त किसान मोर्चा के धरना स्थल पर बीकेयू नेता राकेश टिकैत से मिलने पहुंची सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर।

पिछले चार महीनों से चल रहा किसान आंदोलन अपने अराजनीतिक होने की दावेदारी कर रहा था। लेकिन पांच राज्यों में चुनावों को लेकर किसान नेताओं ने अपनी रणनीति बदल दी और तय किया कि जहां-जहां चुनाव हो रहे हैं, वहां वे केंद्र के कृषि कानूनों के खिलाफ माहौल बनाने के लिए जाएंगे। किसान नेताओं ने भाजपा के खिलाफ वोटों के ध्रुवीकरण के लिए बंगाल जैसा राज्य चुना जहां भाजपा की साख दांव पर है। उन्हें उम्मीद है कि अगर बंगाल में क्षय हुआ तो वह उत्तर प्रदेश के भय से संवाद के मेज पर आएगी। लेकिन इसके साथ ही किसान आंदोलन का राजनीतिकरण भी हो गया। बंगाल में भाजपा कमजोर हुई तो किसानों को फायदा मिल सकता है। लेकिन अब बंगाल में भाजपा बेहतर करती है तो किसान आंदोलन का नुकसान तय है। भाजपा की बेहतरी के बाद इनके सत्ता बदलने वाले दावों का उपहास होगा। चुनावी मंच से राजनीतिकरण के बाद किसान आंदोलन के उत्तर कांड पर बेबाक बोल

ये मुलाकात मुलाकात नहीं होती है
बात होती है मगर बात नहीं होती है
-हफीज जालंधरी

‘भाजपा के नेता हर घर से एक मुट्ठी चावल मांगने आते हैं तो उनको ये बताया जाए कि जो चावल वह मांग रहे हैं, उस धान की क्या कीमत एमएसपी के रूप में सरकार ने तय कर रखी है? और बाजार में उन्हें उस धान की क्या कीमत मिल रही है? किसान को एमएसपी पर अपने अनाज की कीमत क्यों नहीं मिल रही है…’

दिल्ली की सीमाओं से उठे सवालों का जवाब राकेश टिकैत बंगाल की जमीन पर मांग रहे थे। जो नंदीग्राम बंगाल में बदलाव की बयार लेकर आया था आज वहां परिवर्तन की मांग कर रही भाजपा के नेताओं से सवाल करने के लिए किसान नेता पहुंच गए। सर्दी से शुरू हुआ यह आंदोलन अब प्रचंड गर्मी की ओर बढ़ने वाला है। जहां कल तक आंदोलनकारी ठंड और बारिश से बचने के लिए जलरोधी शिविर और अलाव लगा रहे थे अब वहां झुलसाने वाली लू से बचने की तैयारी हो रही है। दिल्ली की सीमा पर बन रहे स्थायी ढांचे को देख कर लगने लगा है कि मौसम बदलने के बाद भी इनका मिजाज नहीं बदला है बल्कि उन्होंने देश के हर उस कोने तक पहुंचने का फैसला किया है जहां केंद्र सरकार से जुड़े जनप्रतिनिधियों को वोट मांगने जाना है।

जहां तक भाजपा की बात है तो 2014 के बाद से वह पूरे आत्मविश्वास के साथ चुनाव मैदानों में उतरती है और अपना सर्वश्रेष्ठ देती है। मजबूत आर्थिक और राजनीतिक फैसलों के साथ देश का इतिहास और राजनीति बदल रही भाजपा अपने कदम वहीं थामती है जहां उसे राजनीतिक नुकसान होने की संभावना दिखती है। उसे पता है कि बिना राजनीतिक समझौते किए इतिहास नहीं बदला जा सकता। अभी तक किसान आंदोलन से उसे किसी तरह का राजनीतिक नुकसान नहीं दिख रहा था। इसलिए वह किसान नेताओं से मुलाकात तो करती थी पर वह बात नहीं करती थी जिससे किसी हल की तरफ बढ़ा जाए।

कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहे आंदोलन में केंद्र सरकार की संवादहीनता को लेकर किसान नेताओं ने फैसला किया है कि जहां-जहां चुनाव हो रहे हैं वहां-वहां केंद्र के तीन नए कानूनों को लेकर वे आवाज बुलंद करेंगे। जहां तक पंजाब की बात है तो वहां भाजपा की सरकार और पैठ नहीं थी इसलिए वहां उसके राजनीतिक नुकसान को रेखांकित नहीं किया जा सकता है। हरियाणा में भी पूरी तरह से आपदा प्रबंधन कर लिया गया है और वहां तत्काल चुनाव भी नहीं हैं।

किसान नेताओं की रणनीति है कि बिना किसी राजनीतिक नुकसान के केंद्र सरकार को संवाद की मेज पर नहीं बैठाया जा सकता है। दो ऐसे राज्य हैं जहां उसके राजनीतिक नुकसान की संभावना बन सकती है। इसी के तहत सबसे पहले बंगाल की जमीन को चुना गया है। बंगाल में किसान नेताओं का मकसद किसी खास दल को फायदा पहुंचाना नहीं है। वहां अहम है भाजपा को राजनीतिक नुकसान पहुंचाना। उसी के तहत बंगाल में संग्राम के प्रतीक नंदीग्राम को चुना गया।

अब सवाल है कि बंगाल में किसान नेताओं के प्रतिरोध का क्या असर होगा? वहां तो मुख्य लड़ाई ममता बनर्जी और भाजपा के बीच है। ममता बनर्जी की यथास्थिति के खिलाफ माहौल बनेगा तो भाजपा को फायदा होगा। भाजपा की पूरी कोशिश चुनाव को स्थानीय मुद्दे पर केंद्रित रखना है। वह स्थानीय मुद्दों के आधार पर ही ममता बनर्जी की नाकामी को रेखांकित करना चाहती है। दूसरी तरफ जो अन्य राजनीतिक दल हैं उनकी कोशिश इसे वृहत्तर स्तर पर ले जाने की है। यही कोशिश किसान आंदोलन के रणनीतिकारों की भी है। उनका एजंडा है बंगाल चुनाव को राष्ट्रीय फलक से जोड़ना।

स्थानीय बनाम राष्ट्रीय एजंडा की रस्साकशी का परिणाम बंगाल में दिख रहा है। भाजपा की पूरी कोशिश है कि वह ममता बनर्जी सरकार की अराजकता वाली हालत और हिंसा को बड़े विकास के संदर्भ में ले जाए। दूसरी तरफ पेट्रोल की कीमत में बढ़ोतरी के साथ महंगाई, किसानों और मजदूरों के हितों के खिलाफ कानूनों को मुद्दा बनाया जा रहा है। किसानों से बातचीत से दूर रहने वाली सरकार के अहंकार को भी केंद्र में लाने पर जोर है।

किसान नेताओं की कोशिश केंद्रीय कथ्य तैयार करने की है। एक पारी पूरा करने के बाद राजग सरकार अपने सातवें साल में है। सात साल में इतनी मजबूत सरकार की क्या उपलब्धि रही है? बेरोजगारी समेत तमाम राष्ट्रीय सवालों से ही उसे असहज किया जा सकता है। अब देखना यह है कि इसमें कौन कितना सफल होता है। लेकिन इसमें बंगाल से आगे की भी बात है। अभी तो यह है कि सरकार किसानों से बात नहीं कर उसे लंबा टाल कर आंदोलन को अपनी मौत मरने के लिए मजबूर कर रही है। बिना संवाद की स्थिति बहाल हुए आंदोलन को लंबे समय तक चलाए रखना सचमुच मुश्किल होगा।

भाजपा के लिए बंगाल तो अहम है ही जहां उसे केंद्रीय मुद्दे का राजनीतिक नुकसान हो सकता है। लेकिन इससे भी अहम है उत्तर प्रदेश की जमीन। वही उत्तर प्रदेश जिसने 2014 में देश का राजनीतिक इतिहास बदल दिया। केंद्र सरकार अपनी सत्ता के इस प्रवेश द्वार को कभी कमजोर करना नहीं चाहेगी। अगर किसान नेताओं द्वारा बनाए केंद्रीय मुद्दों का जरा भी असर बंगाल में होता है तो स्वाभाविक है कि उसे उत्तर प्रदेश में राजनीतिक जमीन खोने का भय होगा। पंजाब और हरियाणा से शुरू हुए किसान आंदोलन की गोलबंदी उत्तर प्रदेश में हुई और राकेश टिकैत नायक बन कर उभरे। किसान नेताओं की समझ है कि बंगाल में अगर जरा भी भय हुआ तो उत्तर प्रदेश बचाने के लिए सरकार संवाद की मेज पर आने के लिए मजबूर होगी।

बंगाल के राजनीतिक मंच पर जाने का किसान नेताओं का फैसला उनके आंदोलन के लिए घातक भी साबित हो सकता है। अब किसान नेता सीना ठोक कर यह दावा नहीं कर सकेंगे कि हमारा आंदोलन राजनीतिक नहीं है। किसान नेता उस राज्य में पहुंचे हैं जहां भाजपा की साख दांव पर लगी है। उनकी मंशा वोटों के ध्रुवीकरण की है। लेकिन भाजपा ने बंगाल में अच्छा प्रदर्शन कर लिया तो यह किसानों के प्रदर्शन के लिए खतरे की घंटी होगी। भाजपा के नेता आपके सत्ता पलटने के दावों का उपहास करेंगे। भाजपा की बेहतरी के बाद किसान आंदोलन का नुकसान तयशुदा है क्योंकि आप पर राजनीति करने का ठप्पा लग जाएगा। अब देखना यह है कि बंगाल का चुनाव किसान नेताओं के लिए उत्तर कांड ला पाएगा या नहीं।

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