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दंडवत

भारतीय जनतंत्र महज 75 साल का है। हमारे लोकतंत्र के इतने छोटे अनुभव के बरक्स अन्य गैरलोकतांत्रिक व्यवस्थाएं अब भी हमारी चेतना का हिस्सा हैं। तभी तो हमारे लोकतंत्र के व्यवस्थापक ‘टू मच डेमोक्रेसी’ की भी बात बेहिचक कह देते हैं।

Election, Political Parties.भारत निर्वाचन आयोग।

दुनिया भर में विभिन्न तरह की शासन व्यवस्थाओं की तुलना करें तो जनता की भागीदारी के संदर्भ में सबसे बेहतर लोकशाही है। जिन देशों में लोकतंत्र की लंबी परंपरा रही है वे भी आज कई संकटों से जूझ रहे हैं। भारत जैसा देश जिसके लोकतंत्र की उम्र अभी सौ साल भी नहीं हुई है, वहां अगर व्यवस्थापक स्वायत्त संस्थाओं पर सत्ता के संग चलने और उसके अनुकूल फैसले लेने के आरोप लगने लगें तो यह चेतने का समय है। भारत जैसे जवां देश में भी अगर व्यवस्था का हिस्सा बना आदमी ‘ज्यादा लोकतंत्र की बाधा’ की बात करने लगे तो उस खतरे को महसूस कर लेना चाहिए जब लोक का भरोसा इस तंत्र से उठने लगेगा। लोकतंत्र में सबसे अहम है जनता की आस्था। लेकिन लंबे समय से स्वायत्त संस्थाएं जिस तरह से सत्ता का दूत बनने की रवायत पर चल रही हैं वह लोकतंत्र को अचेत कर रहा है। जनतंत्र के ढांचे की बुनियाद स्वायत्त संस्थाओं की राख होती साख पर बेबाक बोल

कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग ने अपनी नियम संहिता से निष्पक्षता वाला पन्ना फाड़ कर फेंक दिया है। उन्होंने आयोग से पूछा कि आखिर किस दबाव में धमकी देने वाले भाजपा नेता पर प्रतिबंध को 48 घंटे से घटा कर 24 घंटे किया गया? कांग्रेस के ही रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा कि संसदीय लोकतंत्र के लिए काला दिन है। चुनाव आयोग के पास अपने आदेश पर कायम रहने की हिम्मत नहीं है। यह निंदनीय है कि चुनाव आयोग सरकार के दबाव में झुक गया और सरमा को चुनाव प्रचार से प्रतिबंधित करने का आदेश बदला। इतिहास इस पाप के लिए न तो चुनाव आयोग और न ही भाजपा को माफ करेगा।

जब भारतीय लोकतंत्र के पचहत्तर साला जश्न के लिए सरकारी स्तर पर ‘अमृत महोत्सव’ की तैयारी हो रही है तो चुनाव आयोग जैसी स्वायत्त संस्था पर ऐसे गंभीर आरोप लगे हैं। उस संस्था पर जिसे लोकतंत्र की रीढ़ कहा जा सकता है। सुरजेवाला का सवाल था, ‘सरमा की सजा घटाने का फैसला स्वत: लिया गया या फिर भाजपा या सरमा की तरफ से कोई नई याचिका दायर की गई? अगर ऐसा है, तो फिर इस मामले में शिकायत करने वाले दलों कांग्रेस और बीपीएफ को क्यों नहीं बुलाया गया? क्या यह दंड से मुक्ति के भाव के साथ धमकाने के लिए लाइसेंस देना है’?

ऐसा नहीं है कि इसके पहले के दशकों में हमारे यहां स्वायत्त संस्थाओं पर सवाल नहीं उठे। लेकिन इतना संतोष था कि सवालों से पूरी तरह मुंह नहीं फेर लिया जाता था। इसके पहले भी संस्थाओं पर खास दल और विचारधारा के दूत की तरह काम करने के आरोप थे। लेकिन वे अपने जनतंत्र के दूत होने का भी होश रख लेती थीं। अपनी बाहरी छवि राजदूत की नहीं बल्कि लोकदूत की ही बनाए रखती थी। लेकिन अब इस तरह की कई संस्थाएं एकतरफा राजदूत की तरह ही व्यवहार कर रही हैं।

मौजूदा विधानसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस के आरोप के जवाब में चुनाव आयोग के पास ऐसा कोई उदाहरण नहीं है कि देखिए, विपक्ष के किसी नेता के ऐसा बोलने पर हमने उनकी भी सजा समान भाव से कम कर दी थी। फिलहाल चुनाव आयोग के पास अपनी विश्वसनीयता को बहाल करने के लिए कोई सबूत नहीं है। इन सब के बावजूद देश का जनतंत्र खुद को ढाढस बंधा रहा है कि अभी हम मरे नहीं हैं बेहोश हुए हैं। लोक में उम्मीद है कि इन संस्थाओं में आत्ममंथन की घड़ी आएगी और लोकशाही की सौ फीसद बहाली हो जाएगी।

विधानसभा चुनाव जैसी अहम प्रक्रिया के दौरान भारतीय लोकतंत्र की संस्था पर सवाल उठ रहे हैं। अभी तक के वैश्विक सभ्यतागत विकास में हमने राजतंत्र से लेकर तानाशाही और कम्युनिस्ट शासन तक के रूप देखे हैं। अहम यह है कि सत्ता में जनता की भागीदारी किस रूप में तय होती है। अभी तक इसके लिए लोकतंत्र ही सबसे आजमाया हुआ नुस्खा है। बुनियादी बात यह है कि लोकतांत्रिक सत्ता में भी चंद लोग ही व्यवस्थापक होते हैं। यहां मायने रखती है उन व्यवस्थापकों के प्रति जनता की आस्था। अगर जनता की सत्ता से जुड़ी संस्थाओं में आस्था होगी तभी लोकतांत्रिक व्यवस्था सुचारू रूप से चल सकती है। लोकतंत्र से हमारे यहां पहले राजसत्ता थी। उसे बनाए रखने के लिए राजा को धर्म की सत्ता की जरूरत होती थी। मंदिर, मस्जिद और गिरजाघर राजसत्ता की आस्था की जरूरत पूरी करते थे। अगर जनता की आस्था ही नहीं है तो राजसत्ता भी बहुत दिनों तक ताकत के जोर से अपना नियंत्रण स्थापित नहीं कर सकती।

राजतंत्र में जो जगह धार्मिक संस्थाओं की थी जनतंत्र में वही जगह स्वायत्त संस्थाओं की है। हम भारतीय आज भी अदालत को न्याय का मंदिर कहते हैं। उसके घर में देर है, अंधेर नहीं जैसे भरोसेमंद शब्द सिर्फ भाग्यवादी होने भर के लिए नहीं बोले जाते। ये शब्द अदालत जैसी संस्थाओं पर भरोसे के लिए कहे जाते हैं। जिस दिन जनता की आस्था इन स्वायत्त संस्थाओं से खत्म हो जाएगी उस दिन जनतंत्र को बचाना संभव नहीं होगा।

चाहे वह चुनाव आयोग हो, सुप्रीम कोर्ट हो या अन्य सरकारी संस्थान, ये सभी जनतंत्र से जनता को जोड़े रखते हैं। इसलिए इन्हें स्वायत्त संस्थान का दर्जा दिया जाता है। यह स्वायत्तता सिर्फ संसद से नियंत्रित नहीं है। संसद को भी नियंत्रण की जरूरत होती है। ये जो संस्थाएं हैं एक-दूसरे से नियंत्रित होते हुए भी स्वायत्त हैं और इन्हीं पर लोकतंत्र का पूरा ढांचा टिका हुआ है। अगर इन संस्थाओं पर आरोप लगने लगे कि ये अपनी स्वायत्तता को खत्म कर किसी राजनीतिक दल की मान्यताओं व धारणाओं को लेकर चल रही हैं, फैसले दे रही हैं तो स्वाभाविक तौर पर उसकी जो विश्वसनीयता है, उसके प्रति जो आस्था है वह खत्म हो जाएगी।

तब ऐसी स्थिति में पैदा हुआ जो असंतोष है उसमें फिर से जनतंत्र के लिए संतोष दिला पाना, फिर उसमें आस्था पैदा कर पाना असंभव सा हो जाता है। तब अलग-अलग तरह की विभाजनकारी सत्ताएं काम करना शुरू कर देती हैं। उसके बाद वही स्थिति होती है जब धर्म-जाति-क्षेत्र, भाषा इन आधारों पर भेदभाव का मसला सामने आने लगता है और उसके आधार पर तमाम तरह के गैर लोकतांत्रिक, सांगठनिक ढांचे बनने लगते हैं जो आतंकवाद और तमाम तरह की विध्वंसक तथा राष्ट्र को तोड़ने वाली गतिविधियों को अंजाम देने लगते हैं।

पहले पाकिस्तान में हुआ और अभी जो म्यांमा में चल रहा है उसके पीछे इन्हीं स्वायत्त संस्थाओं का ढहना है। भारतीय जनतंत्र महज 75 साल का है। हमारे लोकतंत्र के इतने छोटे अनुभव के बरक्स अन्य गैरलोकतांत्रिक व्यवस्थाएं अब भी हमारी चेतना का हिस्सा हैं। तभी तो हमारे लोकतंत्र के व्यवस्थापक ‘टू मच डेमोक्रेसी’ की भी बात बेहिचक कह देते हैं। अभी आठ दशक भी नहीं बीते हैं कि ‘ज्यादा लोकतंत्र’ में कटौती की सिफारिश की जा रही है।
ऐसे में लोकतांत्रिक संस्थानों की जिम्मेदारी है कि वे नागरिकों में जनतंत्र के प्रति चेतना पैदा करें।

हमारे यहां लोकतंत्र की परंपरा अभी छोटी है, सीमित है। इसलिए खतरा भी बहुत अधिक है। अमेरिका जैसे देश में जहां लोकतंत्र की लंबी परंपरा है वहां इस तरह का खतरा अपेक्षाकृत कम होता है। जब वहां के राष्ट्रपति ने जनादेश के साथ खिलवाड़ किया तो लोकतंत्र की परंपरा के लंबे अध्याय के कारण ही इसे नियंत्रित किया गया। लेकिन भारत जैसे देश में जिसका एक बड़ा तबका अभी तक सामंती सोच से लैस है वहां अतिरिक्त सचेत रहने की जरूरत है। अभी तो एक बड़े तबके तक लोकशाही की चेतना पहुंची ही नहीं है और उसे अचेत करने की कवायद चल रही है। अगर अभी हमने इन स्वायत्त संस्थाओं को अचेतावस्था से बाहर लाने में देर कर दी तो आगे जनतंत्र के लिए अंधेर तय है।

पिछले दिनों इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा राष्टÑीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के इस्तेमाल पर आपत्ति जताई है। यह कानून राज्य को बिना औपचारिक आरोप या सुनवाई के गिरफ्तारी का अधिकार देता है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जनवरी 2018 और दिसंबर 2020 के बीच एनएसए के तहत निरोधात्मक डिटेंशन को चुनौती देने वाली 120 बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस) याचिकाओं में फैसला सुनाया।

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